श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 911, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- उत्तरकाण्ड *
१०१
तब हनुमान्जीने भरतजीके चरणोंमें मस्तक नवाकर श्रीरघुनाथजीकी सारी गुणगाथा कही। [भरतजीने पूछा—] हे हनुमान्! कहो, कृपालु स्वामी श्रीरामचन्द्रजी कभी मुझे अपने दासकी तरह याद भी करते हैं? ॥ ८ ॥
छं०—निज दास ज्यों रघुबंसभूषण कबहूँ मम सुमिरन कर्यो । सुनि भरत बचन बिनीत अति कपि पुलकि तन चरनन्हि पर्यो ॥ रघुबीर निज मुख जासु गुन गन कहत अग जग नाथ जो । काहे न होइ बिनीत परम पुनीत सदगुन सिंधु सो ॥
रघुवंशके भूषण श्रीरामजी क्या कभी अपने दासकी भाँति मेरा स्मरण करते रहे हैं? भरतजीके अत्यन्त नम्र वचन सुनकर हनुमान्जी पुलकित शरीर होकर उनके चरणोंपर गिर पड़े [और मनमें विचारने लगे कि] जो चराचरके स्वामी हैं वे श्रीरघुवीर अपने श्रीमुखसे जिनके गुणसमूहोंका वर्णन करते हैं, वे भरतजी ऐसे विनम्र, परम पवित्र और सदगुणोंके समुद्र क्यों न हों?
दो०—राम प्रान प्रिय नाथ तुम्ह सत्य बचन मम तात । पुनि पुनि मिलत भरत सुनि हरष न हृदयँ समात ॥ २ ( क ) ॥
[हनुमान्जीने कहा—] हे नाथ! आप श्रीरामजीको प्राणोंके समान प्रिय हैं, हे तात! मेरा वचन सत्य है। यह सुनकर भरतजी बार-बार मिलते हैं, हृदयमें हर्ष समाता नहीं है ॥ २ ( क ) ॥
सो०—भरत चरन सिरु नाड़ तुरित गयउ कपि राम पहँ । कही कुसल सब जाड़ हरषि चलेउ प्रभु जान चढ़ि ॥ २ ( ख ) ॥
फिर भरतजीके चरणोंमें सिर नवाकर हनुमान्जी तुरंत ही श्रीरामजीके पास [लौट] गये और जाकर उन्होंने सब कुशल कही। तब प्रभु हर्षित होकर विमानपर चढ़कर चले ॥ २ ( ख ) ॥
हरषि भरत कोसलपुर आए । समाचार सब गुरहि सुनाए ॥ पुनि मंदिर महँ बात जनाई । आवत नगर कुसल रघुराई ॥
इधर भरतजी भी हर्षित होकर अयोध्यापुरीमें आये और उन्होंने गुरुजीको सब समाचार सुनाया। फिर राजमहलमें खबर जनायी कि श्रीरघुनाथजी कुशलपूर्वक नगरको आ रहे हैं ॥ १ ॥
सुनत सकल जननीं उठि धाई । कहि प्रभु कुसल भरत समुझाई ॥ समाचार पुरबासिन्ह पाए । नर अरु नारि हरषि सब धाए ॥
खबर सुनते ही सब माताएँ उठ दीड़ीं। भरतजीने प्रभुकी कुशल कहकर सबको समझाया। नगरनिवासियोंने यह समाचार पाया, तो स्त्री-पुरुष सभी हर्षित होकर दौड़े ॥ २ ॥
दधि दुर्बा रोचन फल फूला । नव तुलसी दल मंगल मूला ॥ भरि भरि हेम थार भामिनी । गावत चर्लि सिंधुरगामिनी ॥