श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 912, कुल 1058 में से
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- रामचरितमानस *
[श्रीरामजीके स्वागतके लिये] दही, दूब, गोरोचन, फल, फूल और मङ्गलके मूल नवीन तुलसीदल आदि वस्तुएँ सोनेके थालोंमें भर-भरकर हथिनीकी-सी चालवाली सौभाग्यवती स्त्रियाँ [उन्हें लेकर] गाती हुई चलीं ॥ ३ ॥
जे जैसेहिं तैसेहिं उठि धावहिं । बाल बूद्ध कहैं संग न लावहिं ॥ एक एकन्ह कहैं बूझहिं भाई । तुम्ह देखे दयाल रघुराई ॥
जो जैसे हैं (जहाँ जिस दशामें हैं) वे वैसे ही (वहींसे उसी दशामें) उठ दौड़ते हैं। [देर हो जानेके डरसे] बालकों और बूढ़ोंको कोई साथ नहीं लाते। एक दूसरेसे पूछते हैं—भाई! तुमने दयालु श्रीरघुनाथजीको देखा है? ॥ ४ ॥
अवधपुरी प्रभु आवत जानी। भई सकल सोभा कै खानी ॥ बहड़ सुहावन त्रिबिध समीरा। भड़ सरजू अति निर्मल नीरा ॥
प्रभुको आते जानकर अवधपुरी सम्पूर्ण शोभाओंकी खान हो गयी। तीनों प्रकारकी सुन्दर वायु बहने लगी। सरयूजी अति निर्मल जलवाली हो गयी (अर्थात् सरयूजीका जल अत्यन्त निर्मल हो गया) ॥ ५ ॥
दो०—हरषित गुर परिजन अनुज भूसुर बृंद समेत।
चले भरत मन प्रेम अति सम्मुख कृपानिकेत ॥ ३ ( क ) ॥
गुरु वसिष्ठजी, कुटुम्बी, छोटे भाई शत्रुघ्न तथा ब्राह्मणोंके समूहके साथ हर्षित होकर भरतजी अत्यन्त प्रेमपूर्ण मनसे कृपाधाम श्रीरामजीके सामने (अर्थात् उनकी अगवानीके लिये) चले ॥ ३ ( क ) ॥
बहुतक चढ़ीं अटारिन्ह निरखहिं गगन बिमान।
देखि मधुर सुर हरषित करहिं सुमंगल गान ॥ ३ ( ख ) ॥
बहुत-सी स्त्रियाँ अटारियोंपर चढ़ीं आकाशमें विमान देख रही हैं और उसे देखकर हर्षित होकर मीठे स्वरसे सुन्दर मङ्गलगीत गा रही हैं ॥ ३ ( ख ) ॥
राका ससि रघुपति पुर सिंधु देखि हरषान।
बढ़्यो कोलाहल करत जनु नारि तरंग समान ॥ ३ ( ग ) ॥
श्रीरघुनाथजी पूर्णिमाके चन्द्रमा हैं, तथा अवधपुर समुद्र है, जो उस पूर्णचन्द्रको देखकर हर्षित हो रहा है और शोर करता हुआ बढ़ रहा है [इधर-उधर दौड़ती हुई] स्त्रियाँ उसकी तरङ्गोंके समान लगती हैं ॥ ३ ( ग ) ॥
इहाँ भानुकुल कमल दिवाकर। कपिन्ह देखावत नगर मनोहर ॥
सुनु कपीस अंगद लंकेसा। पावन पुरी रुचिर यह देसा ॥