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भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 920, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 920

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  • रामचरितमानस *

दो०—तब मुनि कहेउ सुमंत्र सन सुनत चलेउ हरषाइ।

रथ अनेक बहु बाजि गज तुरत सँवारे जाइ॥ १० (क)॥

तब मुनिने सुमन्त्रजीसे कहा, वे सुनते ही हर्षित होकर चले। उन्होंने तुरंत ही जाकर अनेकों रथ, घोड़े और हाथी सजाये;॥ १० (क)॥

जहँ तहँ धावन पठइ पुनि मंगल द्रब्य मगाइ।

हरष समेत बसिष्ठ पद पुनि सिरु नायउ आइ॥ १० (ख)॥

और जहाँ-तहाँ [सूचना देनेवाले] दूतोंको भेजकर माङ्गलिक वस्तुएँ मँगाकर फिर हर्षके साथ आकर बसिष्ठजीके चरणोंमें सिर नवाया॥ १० (ख)॥

नवाह्वपारायण, आठवाँ विश्राम

अवधपुरी अति रुचिर बनाई। देवन्ह सुमन बृष्टि झरि लाई॥

राम कहा सेवकन्ह बुलाई। प्रथम सखन्ह अन्हवावहु जाई॥

अवधपुरी बहुत ही सुन्दर सजायी गयी। देवताओंने पुष्पोंकी वर्षाकी झड़ी लगा दी। श्रीरामचन्द्रजीने सेवकोंको बुलाकर कहा कि तुमलोग जाकर पहले मेरे सखाओंको स्नान कराओ॥ १॥

सुनत बचन जहँ तहँ जन धाए। सुग्रीवादि तुरत अन्हवाए॥

पुनि करुनानिधि भरतु हँकारे। निज कर राम जटा निरुअरे॥

भगवान्के वचन सुनते ही सेवक जहाँ-तहाँ दौड़े और तुरंत ही उन्होंने सुग्रीवादिको स्नान कराया। फिर करुणानिधान श्रीरामजीने भरतजीको बुलाया और उनकी जटाओंको अपने हाथोंसे सुलझाया॥ २॥

अन्हवाए प्रभु तीनिउ भाई। भगत बछल कृपाल रघुराई॥

भरत भाग्य प्रभु कोमलताई। सेष कोटि सत सकहिं न गाई॥

तदनन्तर भक्तवत्सल कृपालु प्रभु श्रीरघुनाथजीने तीनों भाइयोंको स्नान कराया। भरतजीका भाग्य और प्रभुकी कोमलताका वर्णन अरबों शेषजी भी नहीं कर सकते॥ ३॥

पुनि निज जटा राम बिबराए। गुर अनुसासन मागि नहाए॥

करि मज्जन प्रभु भूषन साजे। अंग अनंग देखि सत लाजे॥

फिर श्रीरामजीने अपनी जटाएँ खोलीं और गुरुजीकी आज्ञा माँगकर स्नान किया। स्नान करके प्रभुने आभूषण धारण किये। उनके [सुशोभित] अङ्गोंको देखकर सैकड़ों (असंख्य) कामदेव लजा गये॥ ४॥

दो०—सासुन्ह सादर जानकिहि मज्जन तुरत कराइ।

दिब्य बसन बर भूषन अँग अँग सजे बनाइ॥ ११ (क)॥