सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 921, कुल 1058 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 921
  • उत्तरकाण्ड *

१११

[इधर] सासुओंने जानकीजीको आदरके साथ तुरंत ही स्नान कराके उनके अङ्ग-अङ्गमें दिव्य वस्त्र और श्रेष्ठ आभूषण भलीभाँति सजा दिये (पहना दिये) ॥ ११ (क) ॥

राम बाम दिसि सोभति रमा रूप गुन खानि।

देखि मातु सब हरषीं जन्म सुफल निज जानि ॥ ११ (ख) ॥

श्रीरामके बार्थी ओर रूप और गुणोंकी खान रमा (श्रीजानकीजी) शोभित हो रही हैं। उन्हें देखकर सब माताएँ अपना जन्म (जीवन) सफल समझकर हर्षित हुईं ॥ ११ (ख) ॥

सुनु खगेस तेहि अवसर ब्रह्मा सिव मुनि बृंद।

चढ़ि बिमान आए सब सुर देखन सुखकंद ॥ ११ (ग) ॥

[काकभुशुण्डिजी कहते हैं—] हे पक्षिराज गरुड़जी! सुनिये; उस समय ब्रह्माजी, शिवजी और मुनियोंके समूह तथा विमानोंपर चढ़कर सब देवता आनन्दकन्द भगवान्के दर्शन करनेके लिये आये ॥ ११ (ग) ॥

प्रभु बिलोकि मुनि मन अनुरागा। तुरत दिव्य सिंधासन मागा ॥ रबि सम तेज सो बरनि न जाई। बैठे राम द्विजन्ह सिरु नाई ॥

प्रभुको देखकर मुनि वसिष्ठजीके मनमें प्रेम भर आया। उन्होंने तुरंत ही दिव्य सिंहासन माँगाया, जिसका तेज सूर्यके समान था। उसका सौन्दर्य वर्णन नहीं किया जा सकता। ब्राह्मणोंको सिर नवाकर श्रीरामचन्द्रजी उसपर विराज गये ॥ १ ॥

जनकसुता समेत रघुराई। पेखि प्रहरषे मुनि समुदाई ॥ वेद मंत्र तब द्विजन्ह उचारे। नभ सुर मुनि जय जयति पुकारे ॥

श्रीजानकीजीके सहित श्रीरघुनाथजीको देखकर मुनियोंका समुदाय अत्यन्त ही हर्षित हुआ। तब ब्राह्मणोंने वेदमन्त्रोंका उच्चारण किया। आकाशमें देवता और मुनि 'जय हो, जय हो' ऐसी पुकार करने लगे ॥ २ ॥

प्रथम तिलक बसिष्ठ मुनि कीन्हा। पुनि सब बिप्रन्ह आयसु दीन्हा ॥ सुत बिलोकि हरषीं महतारी। बार बार आरती उतारी ॥

[सबसे] पहले मुनि वसिष्ठजीने तिलक किया। फिर उन्होंने सब ब्राह्मणोंको [तिलक करनेकी] आज्ञा दी। पुत्रको राजसिंहासनपर देखकर माताएँ हर्षित हुईं और उन्होंने बार-बार आरती उतारी ॥ ३ ॥

बिप्रन्ह दान बिबिधि बिधि दीन्हे। जाचक सकल अजाचक कीन्हे ॥ सिंधासन पर त्रिभुअन साई। देखि सुरन्ह दुंदुभीं बजाई ॥