श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 919, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- उत्तरकाण्ड *
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तेउ यह चरित देखि ठगि रहहीं । उमा तासु गुन नर किमि कहहीं ॥
परन्तु वे भी यह चरित्र देखकर ठगे-से रह जाते हैं (स्तम्भित हो रहते हैं) । [शिवजी कहते हैं—] हे उमा! तब भला मनुष्य उनके गुणोंको कैसे कह सकते हैं ॥५॥
दो०— नारि कुमुदिनीं अवध सर रघुपति बिरह दिनेस ।
अस्त भएँ बिगसत भई निरखि राम राकेस ॥ १ ( क ) ॥
स्त्रियाँ कुमुदिनी हैं, अयोध्या सरोवर है और श्रीरघुनाथजीका विरह सूर्य है [इस विरह-सूर्यके तापसे वे मुरझा गयी थीं] । अब उस विरहरूपी सूर्यके अस्त होनेपर श्रीरामरूपी पूर्णचन्द्रको निरखकर वे खिल उठीं ॥१ (क)॥
होहिं सगुन सुभ बिबिध बिधि बाजहिं गगन निसान ।
पुर नर नारि सनाथ करि भवन चले भगवान् ॥ १ ( ख ) ॥
अनेक प्रकारके शुभ शकुन हो रहे हैं, आकाशमें नगाड़े बज रहे हैं । नगरके पुरुषों और स्त्रियोंको सनाथ (दर्शनद्वारा कृतार्थ) करके भगवान् श्रीरामचन्द्रजी महलको चले ॥१ (ख)॥
प्रभु जानी कैकई लजानी । प्रथम तासु गूह गए भवानी ॥
ताहि प्रबोधि बहुत सुख दीन्हा । पुनि निज भवन गवन हरि कीन्हा ॥
[शिवजी कहते हैं—] हे भवानी! प्रभुने जान लिया कि माता कैकेयी लज्जित हो गयी हैं । [इसलिये] वे पहले उन्हींके महलको गये और उन्हें समझा-बुझाकर बहुत सुख दिया । फिर श्रीहरिने अपने महलको गमन किया ॥१॥
कृपासिंधु जब मंदिर गए । पुर नर नारि सुखी सब भए ॥
गुर बसिष्ठ द्विज लिए बुलाई । आजु सुधरी सुदिन समुदाई ॥
कृपाके समुद्र श्रीरामजी जब अपने महलको गये, तब नगरके स्त्री-पुरुष सब सुखी हुए । गुरु बसिष्ठजीने ब्राह्मणोंको बुला लिया [और कहा—] आज शुभ घड़ी, सुन्दर दिन आदि सभी शुभ योग हैं ॥२॥
सब द्विज देहु हरषि अनुसासन । रामचंद्र बैठहिं सिंघासन ॥
मुनि बसिष्ठ के बचन सुहाए । सुनत सकल बिप्रन्ह अति भाए ॥
आप सब ब्राह्मण हर्षित होकर आज्ञा दीजिये, जिसमें श्रीरामचन्द्रजी सिंहासनपर विराजमान हों । बसिष्ठ मुनिके सुहावने वचन सुनते ही सब ब्राह्मणोंको बहुत ही अच्छे लगे ॥३॥
कहहिं बचन मृदु बिप्र अनेका । जग अभिराम राम अभिषेका ॥
अब मुनिबर बिलंब नहिं कीजै । महाराज कहैं तिलक करीजै ॥
वे सब अनेकों ब्राह्मण कोमल वचन कहने लगे कि श्रीरामजीका राज्याभिषेक सम्पूर्ण जगत्को आनन्द देनेवाला है । हे मुनिश्रेष्ठ ! अब विलम्ब न कीजिये और महाराजका तिलक शीघ्र कीजिये ॥४॥