सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 919, कुल 1058 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 919
  • उत्तरकाण्ड *

११७

तेउ यह चरित देखि ठगि रहहीं । उमा तासु गुन नर किमि कहहीं ॥

परन्तु वे भी यह चरित्र देखकर ठगे-से रह जाते हैं (स्तम्भित हो रहते हैं) । [शिवजी कहते हैं—] हे उमा! तब भला मनुष्य उनके गुणोंको कैसे कह सकते हैं ॥५॥

दो०— नारि कुमुदिनीं अवध सर रघुपति बिरह दिनेस ।

अस्त भएँ बिगसत भई निरखि राम राकेस ॥ १ ( क ) ॥

स्त्रियाँ कुमुदिनी हैं, अयोध्या सरोवर है और श्रीरघुनाथजीका विरह सूर्य है [इस विरह-सूर्यके तापसे वे मुरझा गयी थीं] । अब उस विरहरूपी सूर्यके अस्त होनेपर श्रीरामरूपी पूर्णचन्द्रको निरखकर वे खिल उठीं ॥१ (क)॥

होहिं सगुन सुभ बिबिध बिधि बाजहिं गगन निसान ।

पुर नर नारि सनाथ करि भवन चले भगवान् ॥ १ ( ख ) ॥

अनेक प्रकारके शुभ शकुन हो रहे हैं, आकाशमें नगाड़े बज रहे हैं । नगरके पुरुषों और स्त्रियोंको सनाथ (दर्शनद्वारा कृतार्थ) करके भगवान् श्रीरामचन्द्रजी महलको चले ॥१ (ख)॥

प्रभु जानी कैकई लजानी । प्रथम तासु गूह गए भवानी ॥

ताहि प्रबोधि बहुत सुख दीन्हा । पुनि निज भवन गवन हरि कीन्हा ॥

[शिवजी कहते हैं—] हे भवानी! प्रभुने जान लिया कि माता कैकेयी लज्जित हो गयी हैं । [इसलिये] वे पहले उन्हींके महलको गये और उन्हें समझा-बुझाकर बहुत सुख दिया । फिर श्रीहरिने अपने महलको गमन किया ॥१॥

कृपासिंधु जब मंदिर गए । पुर नर नारि सुखी सब भए ॥

गुर बसिष्ठ द्विज लिए बुलाई । आजु सुधरी सुदिन समुदाई ॥

कृपाके समुद्र श्रीरामजी जब अपने महलको गये, तब नगरके स्त्री-पुरुष सब सुखी हुए । गुरु बसिष्ठजीने ब्राह्मणोंको बुला लिया [और कहा—] आज शुभ घड़ी, सुन्दर दिन आदि सभी शुभ योग हैं ॥२॥

सब द्विज देहु हरषि अनुसासन । रामचंद्र बैठहिं सिंघासन ॥

मुनि बसिष्ठ के बचन सुहाए । सुनत सकल बिप्रन्ह अति भाए ॥

आप सब ब्राह्मण हर्षित होकर आज्ञा दीजिये, जिसमें श्रीरामचन्द्रजी सिंहासनपर विराजमान हों । बसिष्ठ मुनिके सुहावने वचन सुनते ही सब ब्राह्मणोंको बहुत ही अच्छे लगे ॥३॥

कहहिं बचन मृदु बिप्र अनेका । जग अभिराम राम अभिषेका ॥

अब मुनिबर बिलंब नहिं कीजै । महाराज कहैं तिलक करीजै ॥

वे सब अनेकों ब्राह्मण कोमल वचन कहने लगे कि श्रीरामजीका राज्याभिषेक सम्पूर्ण जगत्को आनन्द देनेवाला है । हे मुनिश्रेष्ठ ! अब विलम्ब न कीजिये और महाराजका तिलक शीघ्र कीजिये ॥४॥