श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 916, कुल 1058 में से
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- रामचरितमानस *
छं०—जनु धेनु बालक बच्छ तजि गूहँ चरन बन परबस गई । दिन अंत पुर रुख स्वत थन हुंकार करि धावत भई ॥ अति प्रेम प्रभु सब मातु भेटीं बचन मृदु बहुबिधि कहे । गड़ बिषम बिपति बियोगभव तिन्ह हरष सुख अगनित लहे ॥
मानो नयी ब्यायी हुई गौएँ अपने छोटे बछड़ोंको घरपर छोड़ परवश होकर वनमें चरने गयीं हों और दिनका अन्त होनेपर [बछड़ोंसे मिलनेके लिये] हुंकार करके थनसे दूध गिराती हुई नगरकी ओर दौड़ी हों। प्रभुने अत्यन्त प्रेमसे सब माताओंसे मिलकर उनसे बहुत प्रकारके कोमल वचन कहे। वियोगसे उत्पन्न भयानक विपत्ति दूर हो गयी और सबने [भगवान्से मिलकर और उनके वचन सुनकर] अगणित सुख और हर्ष प्राप्त किये।
दो०—भेटेउ तनय सुमित्राँ राम चरन रति जानि । रामहि मिलत कैकई हृदयँ बहुत सकुचानि ॥ ६ ( क ) ॥
सुमित्राजी अपने पुत्र लक्ष्मणजीकी श्रीरामजीके चरणोंमें प्रीति जानकर उनसे मिलीं। श्रीरामजीसे मिलते समय कैकेयीजी हृदयमें बहुत सकुचार्यीं ॥ ६ ( क ) ॥
लछिमन सब मातन्ह मिलि हरषे आसिष पाइ ।
कैकड़ कहँ पुनि पुनि मिले मन कर छोभु न जाइ ॥ ६ ( ख ) ॥
लक्ष्मणजी भी सब माताओंसे मिलकर और आशीर्वाद पाकर हर्षित हुए। वे कैकेयीजीसे बार-बार मिले, परन्तु उनके मनका क्षोभ (रोष) नहीं जाता ॥ ६ (ख) ॥
सासुन्ह सबनि मिली बैदेही । चरनन्हि लागि हरषु अति तेही ॥ देहिं असीस बूझि कुसलाता । होइ अचल तुम्हार अहिवाता ॥
जानकीजी सब सासुओंसे मिलीं और उनके चरणों लगकर उन्हें अत्यन्त हर्ष हुआ। सासुएँ कुशल पूछकर आशिष दे रही हैं कि तुम्हारा सुहाग अचल हो ॥ १ ॥
सब रघुपति मुख कमल बिलोकहिं । मंगल जानि नयन जल रोकहिं ॥ कनक थार आरती उतारहिं । बार बार प्रभु गात निहारहिं ॥
सब माताएँ श्रीरघुनाथजीका कमल-सा मुखड़ा देख रही हैं। [नेत्रोंसे प्रेमके आँसू उमड़े आते हैं, परन्तु] मङ्गलका समय जानकर वे आँसुओंके जलको नेत्रोंमें ही रोक रखती हैं। सोनेके थालसे आरती उतारती हैं और बार-बार प्रभुके श्रीअङ्गोंकी ओर देखती हैं ॥ २ ॥
नाना भाँति निछावरि करहीं । परमानंद हरष उर भरहीं ॥ कौसल्या पुनि पुनि रघुबीरहि । चितवति कृपासिंधु रनधीरहि ॥