श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 917, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- उत्तरकाण्ड *
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अनेकों प्रकारसे निछावरें करती हैं और हृदयमें परमानन्द तथा हर्ष भर रही हैं। कौसल्याजी बार-बार कृपाके समुद्र और रणधीर श्रीरघुवीरको देख रही हैं ॥ ३ ॥
हृदयं बिचारति बारहिं बारा। कवन भाँति लंकापति मारा ॥ अति सुकुमार जुगल मेरे बारे। निसिचर सुभट महाबल भारे ॥
वे बार-बार हृदयमें विचारती हैं कि इन्होंने लंकापति रावणको कैसे मारा? मेरे ये दोनों बच्चे बड़े ही सुकुमार हैं और राक्षस तो बड़े भारी योद्धा और महान् बली थे ॥ ४ ॥
दो०—लछिमन अरु सीता सहित प्रभुहि बिलोकति मातु।
परमानंद मगन मन पुनि पुनि पुलकित गातु ॥ ७ ॥
लक्ष्मणजी और सीताजीसहित प्रभु श्रीरामचन्द्रजीको माता देख रही हैं। उनका मन परमानन्दमें मग्न है और शरीर बार-बार पुलकित हो रहा है ॥ ७ ॥
लंकापति कपीस नल नीला। जामवंत अंगद सुभसीला ॥ हनुमदादि सब बानर बीरा। धरे मनोहर मनुज सरीरा ॥
लंकापति विभीषण, वानरराज सुग्रीव, नल, नील, जाम्बवान् और अंगद तथा हनुमान्जी आदि सभी उत्तम स्वभाववाले वीर वानरोंने मनुष्योंके मनोहर शरीर धारण कर लिये ॥ १ ॥
भरत सनेह सील व्रत नेमा। सादर सब बरनहिं अति प्रेमा ॥ देखि नगरवासिन्ह कै रीती। सकल सराहहिं प्रभु पद प्रीती ॥
वे सब भरतजीके प्रेम, सुन्दर स्वभाव, [त्यागके] व्रत और नियमोंकी अत्यन्त प्रेमसे आदरपूर्वक बड़ाई कर रहे हैं। और नगरनिवासियोंकी [प्रेम, शील और विनयसे पूर्ण] रीति देखकर वे सब प्रभुके चरणोंमें उनके प्रेमकी सराहना कर रहे हैं ॥ २ ॥
पुनि रघुपति सब सखा बोलाए। मुनि पद लागहु सकल सिखाए ॥ गुर बसिष्ठ कुलपूज्य हमारे। इन्ह की कृपाँ दनुज रन मारे ॥
फिर श्रीरघुनाथजीने सब सखाओंको बुलाया और सबको सिखाया कि मुनिके चरणोंमें लगे। ये गुरु बसिष्ठजी हमारे कुलभरके पूज्य हैं। इन्हींकी कृपासे रणमें राक्षस मारे गये हैं ॥ ३ ॥
ए सब सखा सुनहु मुनि मेरे। भए समर सागर कहँ बेरे ॥ मम हित लागि जन्म इन्ह हारे। भरतहु ते मोहि अधिक पिआरे ॥
[फिर गुरुजीसे कहा—] हे मुनि! सुनिये। ये सब मेरे सखा हैं। ये संग्रामरूपी समुद्रमें मेरे लिये बेड़े (जहाज) के समान हुए। मेरे हितके लिये इन्होंने अपने जन्मतक हार दिये (अपने प्राणोंतकको होम दिया)। ये मुझे भरतसे भी अधिक प्रिय हैं ॥ ४ ॥