श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 927, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- उत्तरकाण्ड *
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मैं आपसे बार-बार यही वरदान माँगाता हूँ कि मुझे आपके चरणकमलोंकी अचलभक्ति और आपके भक्तोंका सत्सङ्ग सदा प्राप्त हो। हे लक्ष्मीपते! हर्षित होकर मुझे यही दीजिये ॥ १४ (क) ॥
बरनि उमापति राम गुन हरषि गए कैलास।
तब प्रभु कपिन्ह दिवाए सब बिधि सुखप्रद बास ॥ १४ (ख) ॥
श्रीरामचन्द्रजीके गुणोंका वर्णन करके उमापति महादेवजी हर्षित होकर कैलासको चले गये। तब प्रभुने वानरोंको सब प्रकारसे सुख देनेवाले डेरे दिलवाये ॥ १४ (ख) ॥
सुनु खगपति यह कथा पावनी । त्रिबिध ताप भव भय दावनी ॥ महाराज कर सुभ अभिषेका । सुनत लहहिं नर बिरति बिबेका ॥
हे गरुड़जी! सुनिये, यह कथा [सबको] पवित्र करनेवाली है, [दैहिक, दैविक, भौतिक] तीनों प्रकारके तापोंका और जन्म-मृत्युके भयका नाश करनेवाली है। महाराज श्रीरामचन्द्रजीके कल्याणमय राज्याभिषेकका चरित्र [निष्कामभावसे] सुनकर मनुष्य वैराग्य और ज्ञान प्राप्त करते हैं ॥ १ ॥
जे सकाम नर सुनहिं जे गावहिं । सुख संपति नाना बिधि पावहिं ॥ सुर दुर्लभ सुख करि जग माहीं । अंतकाल रघुपति पुर जाहीं ॥
और जो मनुष्य सकामभावसे सुनते और जो गाते हैं, वे अनेकों प्रकारके सुख और सम्पत्ति पाते हैं। वे जगत्में देवदुर्लभ सुखोंको भोगकर अन्तकालमें श्रीरघुनाथजीके परमधामको जाते हैं ॥ २ ॥
सुनहिं बिमुक्त बिरत अरु बिषई । लहहिं भगति गति संपति नई ॥ खगपति राम कथा मैं बरनी । स्वमति बिलास त्रास दुख हरनी ॥
इसे जो जीवनमुक्त, विरक्त और विषयी सुनते हैं, वे [क्रमशः] भक्ति, मुक्ति और नवीन सम्पत्ति (नित्य नये भोग) पाते हैं। हे पक्षिराज गरुड़जी! मैंने अपनी बुद्धिकी पहुँचके अनुसार रामकथा वर्णन की है, जो [जन्म-मरणके] भय और दुःखको हरनेवाली है ॥ ३ ॥
बिरति बिबेक भगति दृढ़ करनी । मोह नदी कहैं सुंदर तरनी ॥ नित नव मंगल कौसलपुरी । हरषित रहहिं लोग सब कुरी ॥
यह वैराग्य, विवेक और भक्तिको दृढ़ करनेवाली है तथा मोहरूपी नदीके [पार करनेके] लिये सुन्दर नाव है। अवधपुरीमें नित-नये मङ्गलोलोत्सव होते हैं। सभी वर्गोंके लोग हर्षित रहते हैं ॥ ४ ॥
नित नङ् प्रीति राम पद पंकज । सब कें जिन्हहि नमत सिव मुनि अज ॥ मंगन बहु प्रकार पहिराए । द्विजन्ह दान नाना बिधि पाए ॥
श्रीरामजीके चरणकमलोंमें—जिन्हें श्रीशिवजी, मुनिगण और ब्रह्माजी भी नमस्कार करते हैं—सबकी नित्य नवीन प्रीति है। भिक्षुओंको बहुत प्रकारके वस्त्राभूषण पहनाये गये और ब्राह्मणोंने नाना प्रकारके दान पाये ॥ ५ ॥