श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
- उत्तरकाण्ड *
१२५
मैं आपसे बार-बार यही वरदान माँगाता हूँ कि मुझे आपके चरणकमलोंकी अचलभक्ति और आपके भक्तोंका सत्सङ्ग सदा प्राप्त हो। हे लक्ष्मीपते! हर्षित होकर मुझे यही दीजिये ॥ १४ (क) ॥
बरनि उमापति राम गुन हरषि गए कैलास।
तब प्रभु कपिन्ह दिवाए सब बिधि सुखप्रद बास ॥ १४ (ख) ॥
श्रीरामचन्द्रजीके गुणोंका वर्णन करके उमापति महादेवजी हर्षित होकर कैलासको चले गये। तब प्रभुने वानरोंको सब प्रकारसे सुख देनेवाले डेरे दिलवाये ॥ १४ (ख) ॥
सुनु खगपति यह कथा पावनी । त्रिबिध ताप भव भय दावनी ॥ महाराज कर सुभ अभिषेका । सुनत लहहिं नर बिरति बिबेका ॥
हे गरुड़जी! सुनिये, यह कथा [सबको] पवित्र करनेवाली है, [दैहिक, दैविक, भौतिक] तीनों प्रकारके तापोंका और जन्म-मृत्युके भयका नाश करनेवाली है। महाराज श्रीरामचन्द्रजीके कल्याणमय राज्याभिषेकका चरित्र [निष्कामभावसे] सुनकर मनुष्य वैराग्य और ज्ञान प्राप्त करते हैं ॥ १ ॥
जे सकाम नर सुनहिं जे गावहिं । सुख संपति नाना बिधि पावहिं ॥ सुर दुर्लभ सुख करि जग माहीं । अंतकाल रघुपति पुर जाहीं ॥
और जो मनुष्य सकामभावसे सुनते और जो गाते हैं, वे अनेकों प्रकारके सुख और सम्पत्ति पाते हैं। वे जगत्में देवदुर्लभ सुखोंको भोगकर अन्तकालमें श्रीरघुनाथजीके परमधामको जाते हैं ॥ २ ॥
सुनहिं बिमुक्त बिरत अरु बिषई । लहहिं भगति गति संपति नई ॥ खगपति राम कथा मैं बरनी । स्वमति बिलास त्रास दुख हरनी ॥
इसे जो जीवनमुक्त, विरक्त और विषयी सुनते हैं, वे [क्रमशः] भक्ति, मुक्ति और नवीन सम्पत्ति (नित्य नये भोग) पाते हैं। हे पक्षिराज गरुड़जी! मैंने अपनी बुद्धिकी पहुँचके अनुसार रामकथा वर्णन की है, जो [जन्म-मरणके] भय और दुःखको हरनेवाली है ॥ ३ ॥
बिरति बिबेक भगति दृढ़ करनी । मोह नदी कहैं सुंदर तरनी ॥ नित नव मंगल कौसलपुरी । हरषित रहहिं लोग सब कुरी ॥
यह वैराग्य, विवेक और भक्तिको दृढ़ करनेवाली है तथा मोहरूपी नदीके [पार करनेके] लिये सुन्दर नाव है। अवधपुरीमें नित-नये मङ्गलोलोत्सव होते हैं। सभी वर्गोंके लोग हर्षित रहते हैं ॥ ४ ॥
नित नङ् प्रीति राम पद पंकज । सब कें जिन्हहि नमत सिव मुनि अज ॥ मंगन बहु प्रकार पहिराए । द्विजन्ह दान नाना बिधि पाए ॥
श्रीरामजीके चरणकमलोंमें—जिन्हें श्रीशिवजी, मुनिगण और ब्रह्माजी भी नमस्कार करते हैं—सबकी नित्य नवीन प्रीति है। भिक्षुओंको बहुत प्रकारके वस्त्राभूषण पहनाये गये और ब्राह्मणोंने नाना प्रकारके दान पाये ॥ ५ ॥
१२६
- रामचरितमानस *
दो०—ब्रह्मानंद मगन कपि सब कें प्रभु पद प्रीति। जात न जाने दिवस तिन्ह गए मास षट बीति ॥ १५ ॥
वानर सब ब्रह्मानन्दमें मग्न हैं। प्रभुके चरणोंमें सबका प्रेम है! उन्होंने दिन जाते जाने ही नहीं और [बात-की-बातमें] छः महीने बीत गये ॥ १५ ॥
बिसरे गृह सपनेहुँ सुधि नाहीं। जिमि परद्रोह संत मन माहीं॥ तब रघुपति सब सखा बोलाए। आइ सबन्हि सादर सिरु नाए॥
उन लोगोंको अपने घर भूल ही गये। [जाग्रतकी तो बात ही क्या] उन्हें स्वप्नमें भी घरकी सुध (याद) नहीं आती, जैसे संतोंके मनमें दूसरोंसे द्रोह करनेकी बात कभी नहीं आती। तब श्रीरघुनाथजीने सब सखाओंको बुलाया। सबने आकर आदरसहित सिर नवाया ॥ १ ॥
परम प्रीति समीप बैठारे। भगत सुखद मृदु बचन उचारे॥ तुम्ह अति कीन्हि मोरि सेवकाई। मुख पर केहि बिधि करौं बड़ाई॥
बड़े ही प्रेमसे श्रीरामजीने उनको अपने पास बैठाया और भक्तोंको सुख देनेवाले कोमल वचन कहे—तुमलोगोंने मेरी बड़ी सेवा की है। मुँहपर किस प्रकार तुम्हारी बड़ाई करूँ? ॥ २ ॥
ताते मोहि तुम्ह अति प्रिय लागे। मम हित लागि भवन सुख त्यागे॥ अनुज राज संपति बैदेही। देह गेह परिवार सनेही॥
मेरे हितके लिये तुमलोगोंने घरोंको तथा सब प्रकारके सुखोंको त्याग दिया। इससे तुम मुझे अत्यन्त ही प्रिय लग रहे हो। छोटे भाई, राज्य, सम्पत्ति, जानकी, अपना शरीर, घर, कुटुम्ब और मित्र— ॥ ३ ॥
सब मम प्रिय नहिं तुम्हहि समाना। मूषा न कहउँ मोर यह बाना॥ सब कें प्रिय सेवक यह नीती। मोरें अधिक दास पर प्रीती॥
ये सभी मुझे प्रिय हैं, परंतु तुम्हारे समान नहीं। मैं झूठ नहीं कहता, यह मेरा स्वभाव है। सेवक सभीको प्यारे लगते हैं, यह नीति (नियम) है। [पर] मेरा तो दासपर [स्वाभाविक ही] विशेष प्रेम है ॥ ४ ॥
दो०—अब गृह जाहु सखा सब भजेहु मोहि दृढ़ नेम। सदा सर्वगत सर्वहित जानि करेहु अति प्रेम ॥ १६ ॥
हे सखागण! अब सब लोग घर जाओ; वहाँ दृढ़ नियमसे मुझे भजते रहना। मुझे सदा सर्वव्यापक और सबका हित करनेवाला जानकर अत्यन्त प्रेम करना ॥ १६ ॥
सुनि प्रभु बचन मगन सब भए। को हम कहाँ बिसरि तन गए॥ एकटक रहे जोरि कर आगे। सकहिं न कछु कहि अति अनुरागे॥
- उत्तरकाण्ड *
१२७
प्रभुके वचन सुनकर सब-के-सब प्रेममग्न हो गये। हम कौन हैं और कहाँ हैं? यह देहकी सुध भी भूल गयी। वे प्रभुके सामने हाथ जोड़कर टकटकी लगाये देखते ही रह गये। अत्यन्त प्रेमके कारण कुछ कह नहीं सकते ॥ १ ॥
परम प्रेम तिन्ह कर प्रभु देखा । कहा बिबिधि बिधि ग्यान बिसेषा ॥ प्रभु सन्मुख कछु कहन न पारहिं । पुनि पुनि चरन सरोज निहारहिं ॥
प्रभुने उनका अत्यन्त प्रेम देखा, [तब] उन्हें अनेकों प्रकारसे विशेष ज्ञानका उपदेश दिया। प्रभुके सम्मुख वे कुछ कह नहीं सकते। बार-बार प्रभुके चरणकमलोंको देखते हैं ॥ २ ॥
तब प्रभु भूषन बसन मगाए । नाना रंग अनूप सुहाए ॥ सुग्रीवहि प्रथमहिं पहिराए । बसन भरत निज हाथ बनाए ॥
तब प्रभुने अनेक रंगोंके अनुपम और सुन्दर गहने-कपड़े मँगावाये। सबसे पहले भरतजीने अपने हाथसे सँवारकर सुग्रीवको वस्त्राभूषण पहनाये ॥ ३ ॥
प्रभु प्रेरित लछिमन पहिराए । लंकापति रघुपति मन भाए ॥ अंगद बैठ रहा नहिं डोला । प्रीति देखि प्रभु ताहि न बोला ॥
फिर प्रभुकी प्रेरणासे लक्ष्मणजीने विभीषणजीको गहने-कपड़े पहनाये, जो श्रीरघुनाथजीके मनको बहुत ही अच्छे लगे। अंगद बैठे ही रहे, वे अपनी जगहसे हिलेतक नहीं। उनका उत्कट प्रेम देखकर प्रभुने उनको नहीं बुलाया ॥ ४ ॥
दो०—जामवंत नीलादि सब पहिराए रघुनाथ ।
हिर्घ धरि राम रूप सब चले नाड़ पद माथ ॥ १७ (क) ॥
जाम्बवान् और नील आदि सबको श्रीरघुनाथजीने स्वयं भूषण-वस्त्र पहनाये। वे सब अपने हृदयोंमें श्रीरामचन्द्रजीके रूपको धारण करके उनके चरणोंमें मस्तक नवाकर चले ॥ १७ (क) ॥
तब अंगद उठि नाड़ सिरु सजल नयन कर जोरि ।
अति बिनीत बोलेउ बचन मनहुँ प्रेम रस बोरि ॥ १७ (ख) ॥
तब अंगद उठकर सिर नवाकर, नेत्रोंमें जल भरकर और हाथ जोड़कर अत्यन्त विनम्र तथा मानो प्रेमके रसमें डुबोये हुए (मधुर) वचन बोले ॥ १७ (ख) ॥
सुनु सर्बग्य कृपा सुख सिंधो । दीन दयाकर आरत बंधो ॥ मरती बेर नाथ मोहि बाली । गयउ तुम्हारेहि कोछें घाली ॥
हे सर्वज्ञ! हे कृपा और सुखके समुद्र! हे दीनोंपर दया करनेवाले! हे आर्तोंके बन्धु! सुनिये। हे नाथ! मरते समय मेरा पिता बालि मुझे आपकी ही गोदमें डाल गया था ॥ १ ॥
१२८
- रामचरितमानस *
असरन सरन बिरदु संभारी । मोहि जनि तजहु भगत हितकारी ॥ मोरें तुम्ह प्रभु गुर पितु माता । जाऊँ कहाँ तजि पद जलजाता ॥
अतः हे भक्तोंके हितकारी! अपना अशरण-शरण विरद (बाना) याद करके मुझे त्यागिये नहीं। मेरे तो स्वामी, गुरु, पिता और माता, सब कुछ आप ही हैं। आपके चरणकमलोंको छोड़कर मैं कहाँ जाऊँ? ॥ २ ॥
तुम्हहि बिचारि कहहु नरनाहा । प्रभु तजि भवन काज मम काहा ॥ बालक ग्यान बुद्धि बल हीना । राखहु सरन नाथ जन दीना ॥
हे महाराज! आप ही विचारकर कहिये, प्रभु (आप) को छोड़कर घरमें मेरा क्या काम है? हे नाथ! इस ज्ञान, बुद्धि और बलसे हीन बालक तथा दीन सेवकको शरणमें रखिये ॥ ३ ॥
नीचि टहल गृह कै सब करिहउँ । पद पंकज बिलोकि भव तरिहउँ ॥ अस कहि चरन परेउ प्रभु पाही । अब जनि नाथ कहहु गृह जाही ॥
मैं घरकी सब नीची-से-नीची सेवा करूँगा और आपके चरणकमलोंको देख-देखकर भवसागरसे तर जाऊँगा। ऐसा कहकर वे श्रीरामजीके चरणोंमें गिर पड़े [और बोले—] हे प्रभो! मेरी रक्षा कीजिये। हे नाथ! अब यह न कहिये कि तू घर जा ॥ ४ ॥
दो०—अंगद बचन बिनीत सुनि रघुपति करुना सींव।
प्रभु उठाइ उर लायउ सजल नयन राजीव ॥ १८ (क) ॥
अङ्गदके विनम्र वचन सुनकर करुणाकी सीमा प्रभु श्रीरघुनाथजीने उनको उठाकर हृदयसे लगा लिया। प्रभुके नेत्रकमलोंमें [प्रेमाश्रुओंका] जल भर आया ॥ १८ (क) ॥
निज उर माल बसन मनि बालितनय पहिराइ ॥
बिदा कीन्हि भगवान तब बहु प्रकार समुझाइ ॥ १८ (ख) ॥
तब भगवान्ने अपने हृदयकी माला, वस्त्र और मणि (रत्नोंके आभूषण) बालि-पुत्र अङ्गदको पहनाकर और बहुत प्रकारसे समझाकर उनकी विदाई की ॥ १८ (ख) ॥
भरत अनुज सौमित्रि समेता । पठवन चले भगत कृत चेता ॥ अंगद हृदयँ प्रेम नहीं थोरा । फिरि फिरि चितव राम कीँ ओरा ॥
भक्तकी करनीको याद करके भरतजी छोटे भाई शत्रुघ्मजी और लक्ष्मणजीसहित उनको पहुँचाने चले। अङ्गदके हृदयमें थोड़ा प्रेम नहीं है (अर्थात् बहुत अधिक प्रेम है)। वे फिर-फिरकर श्रीरामजीकी ओर देखते हैं, ॥ १ ॥
बार बार कर दंड प्रनामा । मन अस रहन कहहिं मोहि रामा ॥ राम बिलोकनि बोलनि चलनी । सुमिरि सुमिरि सोचत हँसि मिलनी ॥
- उत्तरकाण्ड *
१२१
और बार-बार दण्डवत्-प्रणाम करते हैं। मनमें ऐसा आता है कि श्रीरामजी मुझे रहनेको कह दें। वे श्रीरामजीके देखनेकी, बोलनेकी, चलनेकी तथा हँसकर मिलनेकी रीतिको याद कर-करके सोचते हैं (दुखी होते हैं) ॥ २ ॥
प्रभु रुख देखि बिनय बहु भाषी । चलेउ हृदयँ पद पंकज राखी ॥ अति आदर सब कपि पहुँचाए । भाइन्ह सहित भरत पुनि आए ॥
किन्तु प्रभुका रुख देखकर, बहुत-से विनयवचन कहकर तथा हृदयमें चरण-कमलोंको रखकर वे चले। अत्यन्त आदरके साथ सब वानरोंको पहुँचाकर भाइयोंसहित भरतजी लौट आये ॥ ३ ॥
तब सुग्रीव चरन गहि नाना । भाँति बिनय कीन्हे हनुमाना ॥ दिन दस करि रघुपति पद सेवा । पुनि तव चरन देखिहउँ देवा ॥
तब हनुमान्जीने सुग्रीवके चरण पकड़कर अनेक प्रकारसे विनती की और कहा—हे देव! दस (कुछ) दिन श्रीरघुनाथजीकी चरणसेवा करके फिर मैं आकर आपके चरणोंके दर्शन करूँगा ॥ ४ ॥
पुन्य पुंज तुम्ह पवनकुमारा । सेवहु जाइ कृपा आगारा ॥ अस कहि कपि सब चले तुरंता । अंगद कहइ सुनुहु हनुमंता ॥
[सुग्रीवने कहा—] हे पवनकुमार! तुम पुण्यकी राशि हो [जो भगवान्ने तुमको अपनी सेवामें रख लिया]। जाकर कृपाथाम श्रीरामजीकी सेवा करो। सब वानर ऐसा कहकर तुरंत चल पड़े। अङ्गदने कहा—हे हनुमान्! सुनो— ॥ ५ ॥
दो०—कहेहु दंडवत प्रभु सँ तुम्हहि कहउँ कर जोरि।
बार बार रघुनायकहि सुरति कराएहु मोरि ॥ १९ ( क ) ॥
मैं तुमसे हाथ जोड़कर कहता हूँ, प्रभुसे मेरी दण्डवत् कहना और श्रीरघुनाथजीको बार-बार मेरी याद कराते रहना ॥ १९ (क) ॥
अस कहि चलेउ बालिसुत फिरि आयउ हनुमंत।
तासु प्रीति प्रभु सन कही मगन भए भगवंत ॥ १९ ( ख ) ॥
ऐसा कहकर बालिपुत्र अङ्गद चले, तब हनुमान्जी लौट आये और आकर प्रभुसे उनका प्रेम वर्णन किया। उसे सुनकर भगवान् प्रेममग्न हो गये ॥ १९ (ख) ॥
कुलिसहु चाहि कठोर अति कोमल कुसुमहु चाहि।
चित्त खगेस राम कर समुझि परइ कहु काहि ॥ १९ ( ग ) ॥
[काकभुशुण्डिजी कहते हैं—] हे गरुड़जी! श्रीरामजीका चित्त वज्रसे भी अत्यन्त कठोर और फूलसे भी अत्यन्त कोमल है। तब कहिये, वह किसकी समझमें आ सकता है? ॥ १९ (ग) ॥
१३०
- रामचरितमानस *
पुनि कृपाल लियो बोलि निषादा । दीन्हे भूषण बसन प्रसादा ॥ जाहु भवन मम सुमिरन करेहू । मन क्रम बचन धर्म अनुसरेहू ॥
फिर कृपालु श्रीरामजीने निषादराजको बुला लिया और उसे भूषण, वस्त्र प्रसादमें दिये। [फिर कहा—] अब तुम भी घर जाओ, वहाँ मेरा स्मरण करते रहना और मन, वचन तथा कर्मसे धर्मके अनुसार चलना ॥ १ ॥
तुम्ह मम सखा भरत सम भ्राता । सदा रहेहु पुर आवत जाता ॥ बचन सुनत उपजा सुख भारी । परेउ चरन भरि लोचन बारी ॥
तुम मेरे मित्र हो और भरतके समान भाई हो। अयोध्यामें सदा आते-जाते रहना। यह वचन सुनते ही उसको भारी सुख उत्पन्न हुआ। नेत्रोंमें [आनन्द और प्रेमके आँसुओंका] जल भरकर वह चरणोंमें गिर पड़ा ॥ २ ॥
चरन नलिन उर धरि गूह आवा । प्रभु सुभाउ परिजनन्हि सुनावा ॥ रघुपति चरित देखि पुरबासी । पुनि पुनि कहहिं धन्य सुखरासी ॥
फिर भगवान्के चरणकमलोंको हृदयमें रखकर वह घर आया और आकर अपने कुटुम्बियोंको उसने प्रभुका स्वभाव सुनाया। श्रीरघुनाथजीका यह चरित्र देखकर अवधपुरवासी बार-बार कहते हैं कि सुखकी राशि श्रीरामचन्द्रजी धन्य हैं ॥ ३ ॥
राम राज बैठें त्रैलोक। हरषित भए गए सब सोका ॥ बयरु न कर काहू सन कोई । राम प्रताप बिषमता खोई ॥
श्रीरामचन्द्रजीके राज्यपर प्रतिष्ठित होनेपर तीनों लोक हर्षित हो गये, उनके सारे शोक जाते रहे। कोई किसीसे वैर नहीं करता। श्रीरामचन्द्रजीके प्रतापसे सबकी विषमता (आन्तरिक भेदभाव) मिट गयी ॥ ४ ॥
दो०—बरनाश्रम निज निज धरम निरत बेद पथ लोग।
चलहिं सदा पावहिं सुखहिं नहिं भय सोक न रोग ॥ २० ॥
सब लोग अपने-अपने वर्ण और आश्रमके अनुकूल धर्ममें तत्पर हुए सदा वेद-मार्गपर चलते हैं और सुख पाते हैं। उन्हें न किसी बातका भय है, न शोक है और न कोई रोग ही सताता है ॥ २० ॥
दैहिक दैविक भौतिक तापा । राम राज नहिं काहुहि व्यापा ॥ सब नर करहिं परस्पर प्रीती । चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती ॥
‘राम-राज्य’ में दैहिक, दैविक और भौतिक ताप किसीको नहीं व्यापते। सब मनुष्य परस्पर प्रेम करते हैं और वेदोंमें बतायी हुई नीति (मर्यादा) में तत्पर रहकर अपने-अपने धर्मका पालन करते हैं ॥ १ ॥
- उत्तरकाण्ड *
१३१
चारिउ चरन धर्म जग माहीं। पूरि रहा सपनेहुँ अघ नाहीं॥ राम भगति रत नर अरु नारी। सकल परम गति के अधिकारी॥
धर्म अपने चारों चरणों (सत्य, शौच, दया और दान) से जगत्में परिपूर्ण हो रहा है; स्वप्नमें भी कहीं पाप नहीं है। पुरुष और स्त्री सभी रामभक्तिके परायण हैं और सभी परमगति (मोक्ष) के अधिकारी हैं ॥ २ ॥
अल्पमृत्यु नहिं कवनिउ पीरा। सब सुंदर सब बिरुज सरीरा॥ नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना। नहिं कोउ अबुध न लच्छन हीना॥
छोटी अवस्थामें मृत्यु नहीं होती, न किसीको कोई पीड़ा होती है। सभीके शरीर सुन्दर और नीरोग हैं। न कोई दरिद्र है, न दुखी है और न दीन ही है। न कोई मूर्ख है और न शुभ लक्षणोंसे हीन ही है ॥ ३ ॥
सब निर्दभ धर्मरत पुनी। नर अरु नारि चतुर सब गुनी॥ सब गुनगय पंडित सब ग्यानी। सब कृतगय नहिं कपट सयानी॥
सभी दम्भरहित हैं, धर्मपरायण हैं और पुण्यात्मा हैं। पुरुष और स्त्री सभी चतुर और गुणवान् हैं। सभी गुणोंका आदर करनेवाले और पण्डित हैं तथा सभी ज्ञानी हैं। सभी कृतज्ञ (दूसरेके किये हुए उपकारको माननेवाले) हैं, कपट-चतुराई (धूर्तता) किसीमें नहीं है ॥ ४ ॥
दो०— राम राज नभगेस सुनु सचराचर जग माहिं।
काल कर्म सुभाव गुन कृत दुख काहुहि नाहिं ॥ २१ ॥
[काकभुशुण्डिजी कहते हैं—] हे पक्षिराज गरुड़जी! सुनिये। श्रीरामके राज्यमें जड़, चेतन सारे जगत्में काल, कर्म, स्वभाव और गुणोंसे उत्पन्न हुए दुःख किसीको भी नहीं होते (अर्थात् इनके बन्धनमें कोई नहीं है) ॥ २१ ॥
भूमि सस सागर मेखला। एक भूप रघुपति कोसला॥ भुअन अनेक रोम प्रति जासू। यह प्रभुता कछु बहुत न तासू॥
अयोध्यामें श्रीरघुनाथजी सात समुद्रोंकी मेखला (करधनी)-वाली पृथ्वीके एकमात्र राजा हैं। जिनके एक-एक रोममें अनेकों ब्रह्माण्ड हैं, उनके लिये सात द्वीपोंकी यह प्रभुता कुछ अधिक नहीं है ॥ १ ॥
सो महिमा समुद्गत प्रभु केरी। यह बरनत हीनता घनेरी॥ सोउ महिमा खगेस जिन्ह जानी। फिरि एहिं चरित तिन्हहुँ रति मानी॥
बल्कि प्रभुकी उस महिमाको समझ लेनेपर तो यह कहनेमें [कि वे सात समुद्रोंसे घिरी हुई ससद्वीपमयी पृथ्वीके एकच्छत्र सम्राट् हैं] उनकी बड़ी हीनता होती है। परन्तु हे गरुड़जी! जिन्होंने वह महिमा जान भी ली है, वे भी फिर इस लीलामें बड़ा प्रेम मानते हैं ॥ २ ॥
१३२
- रामचरितमानस *
सोउ जाने कर फल यह लीला । कहहिं महा मुनिबर दमसीला ॥ राम राज कर सुख संपदा । बरनि न सकइ फनीस सारदा ॥
क्योंकि उस महिमाको भी जाननेका फल यह लीला (इस लीलाका अनुभव) ही है, इन्द्रियोंका दमन करनेवाले श्रेष्ठ महामुनि ऐसा कहते हैं। रामराज्यकी सुख-सम्पत्तिका वर्णन शेषजी और सरस्वतीजी भी नहीं कर सकते ॥ ३ ॥
सब उदार सब पर उपकारी । बिप्र चरन सेवक नर नारी ॥ एकनारि ब्रत रत सब झारी । ते मन बच क्रम पति हितकारी ॥
सभी नर-नारी उदार हैं, सभी परोपकारी हैं और सभी ब्राह्मणोंके चरणोंके सेवक हैं। सभी पुरुषमात्र एकपत्नीव्रती हैं। इसी प्रकार स्त्रियाँ भी मन, वचन और कर्मसे पतिका हित करनेवाली हैं ॥ ४ ॥
दो०—दंड जतिन्ह कर भेद जहँ नर्तक नृत्य समाज ।
जीतहु मनहि सुनिअ अस रामचंद्र कें राज ॥ २२ ॥
श्रीरामचन्द्रजीके राज्यमें दण्ड केवल संन्यासियोंके हाथोंमें है और भेद नाचनेवालोंके नृत्यसमाजमें है और 'जीतो' शब्द केवल मनके जीतनेके लिये ही सुनायी पड़ता है (अर्थात् राजनीतिमें शत्रुओंको जीतने तथा चोर-डाकुओं आदिको दमन करनेके लिये साम, दान, दण्ड और भेद—ये चार उपाय किये जाते हैं। रामराज्यमें कोई शत्रु है ही नहीं, इसलिये 'जीतो' शब्द केवल मनके जीतनेके लिये ही कहा जाता है। कोई अपराध करता ही नहीं, इसलिये दण्ड किसीको नहीं होता; 'दण्ड' शब्द केवल संन्यासियोंके हाथमें रहनेवाले दण्डके लिये ही रह गया है। तथा सभी अनुकूल होनेके कारण भेदनीतिकी आवश्यकता ही नहीं रह गयी; 'भेद' शब्द केवल सुर-तालके भेदके लिये ही कामोंमें आता है।) ॥ २२ ॥
फूलहिं फरहिं सदा तरु कानन । रहहिं एक सँग गज पंचानन ॥ खग मृग सहज बयरु बिसराई । सबन्हि परस्पर प्रीति बढ़ाई ॥
वनमें वृक्ष सदा फूलते और फलते हैं। हाथी और सिंह [वैर भूलकर] एक साथ रहते हैं। पक्षी और पशु सभीने स्वाभाविक वैर भुलाकर आपसमें प्रेम बढ़ा लिया है ॥ १ ॥
कूजहिं खग मृग नाना बृंदा । अभय चरहिं बन करहिं अनंदा ॥ सीतल सुरभि पवन बह मंदा । गुंजत अलि लै चलि मकरंदा ॥
पक्षी कूजते (मीठी बोली बोलते) हैं, भाँति-भाँतिके पशुओंके समूह वनमें निभंय विचरते और आनन्द करते हैं। सीतल, मन्द, सुगन्धित पवन चलता रहता है। भौर पुष्पोंका रस लेकर चलते हुए गुंजार करते जाते हैं ॥ २ ॥
लता बिटप मागें मधु चवहीं । मनभावतो धेनु पय स्त्रवहीं ॥ ससि संपन्न सदा रह धरनी । त्रेतां भइ कृतजुग कै करनी ॥
- उत्तरकाण्ड *
१३३
बेलें और वृक्ष माँगनेसे ही मधु (मकरन्द) टपका देते हैं। गौएँ मनचाहा दूध देती हैं। धरती सदा खेतीसे भरी रहती है। त्रेतामें सत्ययुगकी करनी (स्थिति) हो गयी॥ ३ ॥
प्रगटों गिरिन्ह बिबिधि मनि खानी । जगदातमा भूप जग जानी॥ सरिता सकल बहहिं बर बारी । सीतल अमल स्वाद सुखकारी॥
समस्त जगत्के आत्मा भगवान्को जगत्का राजा जानकर पर्वतोंने अनेक प्रकारकी मणियोंकी खानें प्रकट कर दीं। सब नदियाँ श्रेष्ठ, शीतल, निर्मल और सुखप्रद स्वादिष्ट जल बहने लगीं॥ ४ ॥
सागर निज मरजादाँ रहहीं । डारहिं रत्न तटन्हि नर लहहीं॥ सरसिज संकुल सकल तड़ागा । अति प्रसन्न दस दिसा बिभागा॥
समुद्र अपनी मर्यादामें रहते हैं। वे लहरोंके द्वारा किनारोंपर रत्न डाल देते हैं, जिन्हें मनुष्य पा जाते हैं। सब तालाब कमलोंसे परिपूर्ण हैं। दसों दिशाओंके विभाग (अर्थात् सभी प्रदेश) अत्यन्त प्रसन्न हैं॥ ५ ॥
दो०—बिधु महि पूर मयूरखन्हि रबि तप जेतनेहि काज । मागें बारिद देहिं जल रामचंद्र कें राज॥ २३ ॥
श्रीरामचन्द्रजीके राज्यमें चन्द्रमा अपनी [अमृतमयी] किरणोंसे पृथ्वीको पूर्ण कर देते हैं। सूर्य उतना ही तपते हैं जितनेकी आवश्यकता होती है और मेघ माँगनेसे [जब जहाँ जितना चाहिये उतना ही] जल देते हैं॥ २३ ॥
कोटिन्ह बाजिमेध प्रभु कीन्हे । दान अनेक द्विजन्ह कहँ दीन्हे॥ श्रुति पथ पालक धर्म धुरंधर । गुनातीत अरु भोग पुरंदर॥
प्रभु श्रीरामजीने करोड़ों अश्वमेध यज्ञ किये और ब्राह्मणोंको अनेकों दान दिये। श्रीरामचन्द्रजी वेदमार्गके पालनेवाले, धर्मकी धुरीको धारण करनेवाले, [प्रकृतितज्ज् सत्त्व, रज और तम] तीनों गुणोंसे अतीत और भोगों (ऐश्वर्य) में इन्द्रके समान हैं॥ १ ॥
पति अनुकूल सदा रह सीता । सोभा खानि सुसील बिनीता॥ जानति कृपासिंधु प्रभुताई । सेवति चरन कमल मन लाई॥
शोभाकी खान, सुशील और विनम्र सीताजी सदा पतिके अनुकूल रहती हैं। वे कृपासागर श्रीरामजीकी प्रभुता (महिमा) को जानती हैं और मन लगाकर उनके चरणकमलोंकी सेवा करती हैं॥ २ ॥
जद्यपि गृहं सेवक सेवकिनी । बिपुल सदा सेवा बिधि गुनी॥ निज कर गृह परिचरजा करई । रामचंद्र आयसु अनुसरई॥
१३४
- रामचरितमानस *
यद्यपि घरमें बहुत-से (अपार) दास और दासियाँ हैं और वे सभी सेवाकी विधिमें कुशल हैं, तथापि [स्वामीकी सेवाका महत्त्व जाननेवाली] श्रीसीताजी घरकी सब सेवा अपने ही हाथोंसे करती हैं और श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञाका अनुसरण करती हैं ॥ ३ ॥
जेहि बिधि कृपासिंधु सुख मानइ । सोइ कर श्री सेवा बिधि जानइ ॥ कौसल्यादि सासु गृह माहीं । सेवइ सबन्हि मान मद नाहीं ॥
कृपासागर श्रीरामचन्द्रजी जिस प्रकारसे सुख मानते हैं, श्रीजी वही करती हैं; क्योंकि वे सेवाकी विधिको जाननेवाली हैं। घरमें कौसल्या आदि सभी सासुओंकी सीताजी सेवा करती हैं, उन्हें किसी बातका अभिमान और मद नहीं है ॥ ४ ॥
उमा रमा ब्रह्मादि बंदिता । जगदंबा संततमनिंदिता ॥
(शिवजी कहते हैं—) हे उमा! जगज्जननी रमा (सीताजी) ब्रह्मा आदि देवताओंसे वन्दित और सदा अनिन्दित (सर्वगुणसम्पन्न) हैं ॥ ५ ॥
दो०—जासु कृपा कटाच्छु सुर चाहत चितव न सोइ । राम पदारबिंद रति करति सुभावहि खोइ ॥ २४ ॥
देवता जिनका कृपाकटाक्ष चाहते हैं, परन्तु वे उनकी ओर देखतीं भी नहीं, वे ही लक्ष्मीजी (जानकीजी) अपने [महामहिम] स्वभावको छोड़कर श्रीरामचन्द्रजीके चरणारविन्दमें प्रीति करती हैं ॥ २४ ॥
सेवहिं सानकूल सब भाई । राम चरन रति अति अधिकाई ॥ प्रभु मुख कमल बिलोकत रहहीं । कबहुँ कृपाल हमहि कछु कहहीं ॥
सब भाई अनुकूल रहकर उनकी सेवा करते हैं। श्रीरामजीके चरणोंमें उनकी अत्यन्त अधिक प्रीति है। वे सदा प्रभुका मुखारविन्द ही देखते रहते हैं कि कृपालु श्रीरामजी कभी हमें कुछ सेवा करनेको कहें ॥ १ ॥
राम करहिं भ्रातन्ह पर प्रीती । नाना भाँति सिखावहिं नीती ॥ हरषित रहहिं नगर के लोगा । करहिं सकल सुर दुर्लभ भोगा ॥
श्रीरामचन्द्रजी भी भाइयोंपर प्रेम करते हैं और उन्हें नाना प्रकारकी नीतियाँ सिखलाते हैं। नगरके लोग हर्षित रहते हैं और सब प्रकारके देवदुर्लभ (देवताओंको भी कठिनासे प्राप्त होने योग्य) भोग भोगते हैं ॥ २ ॥
अहनिसि बिधिहि मनावत रहहीं । श्रीरघुबीर चरन रति चहहीं ॥ दुइ सुत सुंदर सीताँ जाए । लव कुस बेद पुरानन्ह गाए ॥
वे दिन-रात ब्रह्माजीको मनाते रहते हैं और [उनसे] श्रीरघुबीरके चरणोंमें प्रीति चाहते हैं। सीताजीके लव और कुश—ये दो पुत्र उत्पन्न हुए, जिनका वेद-पुराणोंने वर्णन किया है ॥ ३ ॥
- उत्तरकाण्ड *
१३५
दोउ बिजई बिनई गुन मंदिर । हरि प्रतिबिंब मनहुँ अति सुंदर ॥ दुइ दुइ सुत सब भ्रातन्ह केरे । भए रूप गुन सील घनरे ॥
वे दोनों ही विजयी (विख्यात योद्धा), नम्र और गुणोंके धाम हैं और अत्यन्त सुन्दर हैं, मानो श्रीहरिके प्रतिबिम्ब ही हों। दो-दो पुत्र सभी भाइयोंके हुए, जो बड़े ही सुन्दर, गुणवान् और सुशील थे ॥ ४ ॥
दो०—ग्यान गिरा गोतीत अज माया मन गुन पार।
सोइ सच्चिदानंद घन कर नर चरित उदार ॥ २५ ॥
जो [बौद्धिक] ज्ञान, वाणी और इन्द्रियोंसे परे और अजन्मा हैं तथा माया, मन और गुणोंके परे हैं, वही सच्चिदानन्दधन भगवान् श्रेष्ठ नरलीला करते हैं ॥ २५ ॥
प्रातकाल सरऊ करि मज्जन । बैठहिं सभों संग द्विज सज्जन ॥
बेद पुरान बसिष्ठ बखानहिं । सुनहिं राम जद्यपि सब जानहिं ॥
प्रातःकाल सरयूजीमें स्नान करके ब्राह्मणों और सज्जनोंके साथ सभामें बैठते हैं। बसिष्ठजी वेद और पुराणोंकी कथाएँ वर्णन करते हैं और श्रीरामजी सुनते हैं, यद्यपि वे सब जानते हैं ॥ १ ॥
अनुजन्ह संजुत भोजन करहीं । देखि सकल जननीं सुख भरहीं ॥
भरत सत्रुहन दोनउ भाई । सहित पवनसुत उपबन जाई ॥
वे भाइयोंको साथ लेकर भोजन करते हैं। उन्हें देखकर सभी माताएँ आनन्दसे भर जाती हैं। भरतजी और शत्रुघ्नजी दोनों भाई हनुमान्जीसहित उपवनमें जाकर, ॥ २ ॥
बूझहिं बैठि राम गुन गाहा । कह हनुमान सुमति अवगाहा ॥
सुनत बिमल गुन अति सुख पावहिं । बहुरि बहुरि करि बिनय कहावहिं ॥
वहाँ बैठकर श्रीरामजीके गुणोंकी कथाएँ पूछते हैं और हनुमान्जी अपनी सुन्दर बुद्धिसे उन गुणोंमें गोता लगाकर उनका वर्णन करते हैं। श्रीरामचन्द्रजीके निर्मल गुणोंको सुनकर दोनों भाई अत्यन्त सुख पाते हैं और विनय करके बार-बार कहलवाते हैं ॥ ३ ॥
सब कें गूह गूह होहिं पुराना । राम चरित पावन बिधि नाना ॥
नर अरु नारि राम गुन गानहिं । करहिं दिवस निसि जात न जानहिं ॥
सबके यहाँ घर-घरमें पुराणों और अनेक प्रकारके पवित्र रामचरित्रोंकी कथा होती है। पुरुष और स्त्री सभी श्रीरामचन्द्रजीका गुणगान करते हैं और इस आनन्दमें दिन-रातका बीतना भी नहीं जान पाते ॥ ४ ॥
दो०—अवधपुरी बासिन्ह कर सुख संपदा समाज।
सहस सेष नहिं कहि सकहिं जहँ नृप राम बिराज ॥ २६ ॥
१३६
- रामचरितमानस *
जहाँ भगवान् श्रीरामचन्द्रजी स्वयं राजा होकर विराजमान हैं, उस अवधपुरीके निवासियोंके सुख-सम्पत्तिके समुदायका वर्णन हजारों शेषजी भी नहीं कर सकते ॥ २६ ॥
नारदादि सनकादि मुनीसा । दरसन लागि कोसलाधीसा ॥ दिन प्रति सकल अजोध्या आवहिं । देखि नगरु बिरागु बिसरावहिं ॥
नारद आदि और सनक आदि मुनीश्वर सब कोसलराज श्रीरामजीके दर्शनके लिये प्रतिदिन अयोध्या आते हैं और उस [दिव्य] नगरको देखकर वैराग्य भुला देते हैं ॥ १ ॥
जातरूप मनि रचित अटारीं । नाना रंग रुचिर गच ठारीं ॥ पुर चहुँ पास कोट अति सुंदर । रचे कँगूरा रंग रंग बर ॥
[दिव्य] स्वर्ण और रत्नोंसे बनी हुई अटारियाँ हैं। उनमें [मणि-रत्नोंकी] अनेक रंगोंकी सुन्दर ढली हुई फर्शें हैं। नगरके चारों ओर अत्यन्त सुन्दर परकोटा बना है, जिसपर सुन्दर रंग-बिरंगे कँगूरे बने हैं ॥ २ ॥
नव ग्रह निकर अनीक बनाई । जनु घेरी अमरावति आई ॥ महि बहु रंग रचित गच काँचा । जो बिलोकि मुनिबर मन नाचा ॥
मानो नवग्रहोंने बड़ी भारी सेना बनाकर अमरावतीको आकर घेर लिया हो। पृथ्वी (सड़कों) पर अनेकों रंगोंके (दिव्य) काँचों (रत्नों) की गच बनायी (ढाली) गयी है, जिसे देखकर श्रेष्ठ मुनियोंके भी मन नाच उठते हैं ॥ ३ ॥
धवल धाम ऊपर नभ चुंबत । कलस मनहुँ रबि ससि दुति निंदत ॥ बहु मनि रचित झरोखा भ्राजहिं । गृह गृह प्रति मनि दीप बिराजहिं ॥
उज्ज्वल महल ऊपर आकाशको चूम (छू) रहे हैं। महलोंपरके कलश [अपने दिव्य प्रकाशसे] मानो सूर्य, चन्द्रमाके प्रकाशकी भी निन्दा (तिरस्कार) करते हैं। [महलोंमें] बहुत-सी मणियोंसे रचे हुए झरोखे सुशोभित हैं और घर-घरमें मणियोंके दीपक शोभा पा रहे हैं ॥ ४ ॥
छं०—मनि दीप राजहिं भवन भ्राजहिं देहरीं बिदुम रची । मनि खंभ भीति बिरंचि बिरची कनक मनि मरकत खची ॥ सुंदर मनोहर मंदिरायत अजिर रुचिर फटिक रचे । प्रति द्वार द्वार कपाट पुरट बनाइ बहु बन्नहि खचे ॥
घरोंमें मणियोंके दीपक शोभा दे रहे हैं। मूँगोंकी बनी हुई देहलियाँ चमक रही हैं। मणियों (रत्नों)के खम्भे हैं। मरकतमणियों (फलों) से जड़ी हुई सोनेकी दीवारें ऐसी सुन्दर हैं मानो ब्रह्माने खास तौरसे बनायी हों। महल सुन्दर, मनोहर और विशाल हैं। उनमें सुन्दर स्फटिकके आँगन बने हैं। प्रत्येक द्वारपर बहुत-से खरादे हुए हीरोंसे जड़े हुए सोनेके किंवाड़ हैं।
- उत्तरकाण्ड *
१३७
दो०—चारु चित्रशाला गृह गृह प्रति लिखे बनाइ।
राम चरित जे निरख मुनि ते मन लेहिं चोराइ ॥ २७ ॥
घर-घरमें सुन्दर चित्रशालाएँ हैं, जिनमें श्रीरामजीके चरित्र बड़ी सुन्दरताके साथ सँवारकर अङ्कित किये हुए हैं। जिन्हें मुनि देखते हैं, तो वे उनके भी चित्तको चुरा लेते हैं ॥ २७ ॥
सुमन बाटिका सबहिं लगाई। बिबिध भाँति करि जतन बनाई ॥
लता ललित बहु जाति सुहाई। फूलहिं सदा बसंत कि नाई ॥
सभी लोगोंने भिन्न-भिन्न प्रकारकी पुष्पोंकी वाटिकाएँ यत्न करके लगा रखी हैं, जिनमें बहुत जातियोंकी सुन्दर और ललित लताएँ सदा बसंतकी तरह फूलती रहती हैं ॥ १ ॥
गुंजत मधुकर मुखर मनोहर। मारुत त्रिबिधि सदा बह सुंदर ॥
नाना खग बालकन्हि जिआए। बोलत मधुर उड़ात सुहाए ॥
भौर मनोहर स्वरसे गुंजार करते हैं। सदा तीनों प्रकारकी सुन्दर वायु बहती रहती है। बालकोंने बहुत-से पक्षी पाल रखे हैं, जो मधुर बोली बोलते हैं और उड़नेमें सुन्दर लगते हैं ॥ २ ॥
मोर हंस सारस पारावत। भवननि पर सोभा अति पावत ॥
जहाँ तहाँ देखहिं निज परिछाहीं। बहु बिधि कूजहिं नृत्य कराहीं ॥
मोर, हंस, सारस और कबूतर घरोंके ऊपर बड़ी ही शोभा पाते हैं। वे पक्षी [मणियोंकी दीवारोंमें और छतमें] जहाँ-तहाँ अपनी परछाई देखकर [वहाँ दूसरे पक्षी समझकर] बहुत प्रकारसे मधुर बोली बोलते और नृत्य करते हैं ॥ ३ ॥
सुक सारिका पढ़ावहिं बालक। कहहु राम रघुपति जनपालक ॥
राज दुआर सकल बिधि चारु। बीथीं चौहट रुचिर बजारु ॥
बालक तोता-मैनाको पढ़ाते हैं कि कहो—‘राम’ ‘रघुपति’ ‘जनपालक’। राजद्वार सब प्रकारसे सुन्दर है। गलियाँ, चौराहे और बाजार सभी सुन्दर हैं ॥ ४ ॥
छं०—बाजार रुचिर न बनइ बरनत बस्तु बिनु गथ पाइए।
जहाँ भूप रमानिवास तहाँ की संपदा किमि गाइए ॥
बैठे बजाज सराफ बनिक अनेक मनहुँ कुबेर ते।
सब सुखी सब सच्चरित सुंदर नारि नर सिमु जरठ जे ॥
सुन्दर बाजार है, जो वर्णन करते नहीं बनता; वहाँ वस्तुएँ बिना ही मूल्य मिलती हैं। जहाँ स्वयं लक्ष्मीपति राजा हों, वहाँकी सम्पत्तिका वर्णन कैसे किया जाय? बजाज (कपड़ेका व्यापार करनेवाले), सराफ (रुपये-पैसेका लेन-देन करनेवाले) आदि वणिक् (व्यापारी) बैठे हुए ऐसे जान पड़ते हैं मानो अनेक कुबेर हों। स्त्री, पुरुष, बच्चे और बूढ़े जो भी हैं, सभी सुखी, सदाचारी और सुन्दर हैं।
१३८
- रामचरितमानस *
दो०—उत्तर दिसि सरजू बह निर्मल जल गंभीर। बाँधे घाट मनोहर स्वल्प पंक नहिं तीर॥ २८॥
नगरके उत्तर दिशामें सरयूजी बह रही हैं, जिनका जल निर्मल और गहरा है। मनोहर घाट बँधे हुए हैं, किनारेपर जरा भी कीचड़ नहीं है॥ २८॥
दूरि फराक रुचिर सो घाटा। जहाँ जल पिअहिं बाजि गज ठाटा॥ पनिघट परम मनोहर नाना। तहाँ न पुरुष करहिं अस्नाना॥
अलग कुछ दूरीपर वह सुन्दर घाट है, जहाँ घोड़ों और हाथियोंके ठट्ट-के-ठट्ट जल पिया करते हैं। पानी भरनेके लिये बहुत-से [जनाने] घाट हैं, जो बड़े ही मनोहर हैं। वहाँ पुरुष स्नान नहीं करते॥ १॥
राजघाट सब बिधि सुंदर बर। मज्जहिं तहाँ बरन चारिउ नर॥ तीर तीर देवन्ह के मंदिर। चहुँ दिसि तिन्ह के उपबन सुंदर॥
राजघाट सब प्रकारसे सुन्दर और श्रेष्ठ है, जहाँ चारों वर्णोंके पुरुष स्नान करते हैं। सरयूजीके किनारे-किनारे देवताओंके मन्दिर हैं, जिनके चारों ओर सुन्दर उपवन (बगीचे) हैं॥ २॥
कहुँ कहुँ सरिता तीर उदासी। बसहिं ग्यान रत मुनि संन्यासी॥ तीर तीर तुलसिका सुहाई। बूंद बूंद बहु मुनिन्ह लगाई॥
नदीके किनारे कहीं-कहीं विरक्त और ज्ञानपरायण मुनि और संन्यासी निवास करते हैं। सरयूजीके किनारे-किनारे सुन्दर तुलसीजीके झुंड-के-झुंड बहुत-से पेड़ मुनियोंने लगा रखे हैं॥ ३॥
पुर सोभा कछु बरनि न जाई। बाहेर नगर परम रुचिराई॥ देखत पुरी अखिल अघ भागा। बन उपबन बापिका तड़ागा॥
नगरकी शोभा तो कुछ कही नहीं जाती। नगरके बाहर भी परम सुन्दरता है। श्रीअयोध्यापुरीके दर्शन करते ही सम्पूर्ण पाप भाग जाते हैं। [वहाँ] वन, उपवन, बावलियाँ और तालाब सुशोभित हैं॥ ४॥
छं०—बापीं तड़ाग अनूप कूप मनोहरायत सोहहीं। सोपान सुंदर नीर निर्मल देखि सुर मुनि मोहहीं॥ बहु रंग कंज अनेक खग कूजहिं मधुप गुंजारहीं। आराम रम्य पिकादि खग रव जनु पथिक हंकारहीं॥
अनुपम बावलियाँ, तालाब और मनोहर तथा विशाल कुएँ शोभा दे रहे हैं, जिनकी सुन्दर [रबोंकी] सीढ़ियाँ और निर्मल जल देखकर देवता और मुनितक मोहित हो जाते हैं। [तालाबोंमें] अनेक रंगोंके कमल खिल रहे हैं, अनेकों पक्षी कूज रहे हैं और भौर गुंजार कर रहे हैं। [परम] रमणीय बगीचे कोयल आदि पक्षियोंकी [सुन्दर बोलीसे] मानो राह चलनेवालोंको बुला रहे हैं।
- उत्तरकाण्ड *
१३१
दो०—रमानाथ जहाँ राजा सो पुर बरनि कि जाइ। अनिमादिक सुख संपदा रहौँ अवध सब छाइ ॥ २९ ॥
स्वयं लक्ष्मीपति भगवान् जहाँ राजा हों, उस नगरका कहीं वर्णन किया जा सकता है? अणिमा आदि आठों सिद्धियों और समस्त सुख-सम्पत्तियाँ अयोध्यामें छा रही हैं ॥ २९ ॥
जहाँ तहाँ नर रघुपति गुन गावहिं। बैठि परसपर इहइ सिखावहिं ॥ भजहु प्रनत प्रतिपालक रामहि। सोभा सील रूप गुन धामहि ॥
लोग जहाँ-तहाँ श्रीरघुनाथजीके गुण गाते हैं और बैठकर एक-दूसरेको यही सीख देते हैं कि शरणागतका पालन करनेवाले श्रीरामजीको भजो; शोभा, शील, रूप और गुणोंके धाम श्रीरघुनाथजीको भजो ॥ १ ॥
जलज बिलोचन स्यामल गातहि। पलक नयन इव सेवक त्रातहि ॥ धृत सर रुचिर चाप तूनीरहि। संत कंज बन रबि रनधीरहि ॥
कमलनयन और साँवले शरीरवालेको भजो। पलक जिस प्रकार नेत्रोंकी रक्षा करते हैं उसी प्रकार अपने सेवकोंकी रक्षा करनेवालेको भजो। सुन्दर बाण, धनुष और तरकस धारण करनेवालेको भजो। संतरूपी कमलवनके [खिलानेके] लिये सूर्यरूप रणधीर श्रीरामजीको भजो ॥ २ ॥
काल कराल ब्याल खगराजहि। नमत राम अकाम ममता जहि ॥ लोभ मोह मृगजूथ किरातहि। मनसिज करि हरि जन सुखदातहि ॥
कालरूपी भयानक सर्पके भक्षण करनेवाले श्रीरामरूप गरुड़जीको भजो। निष्कामभावसे प्रणाम करते ही ममताका नाश कर देनेवाले श्रीरामजीको भजो। लोभ-मोहरूपी हरिनोंके समूहके नाश करनेवाले श्रीरामरूप किरातको भजो। कामदेवरूपी हाथीके लिये सिंहरूप तथा सेवकोंको सुख देनेवाले श्रीरामजीको भजो ॥ ३ ॥
संसय सोक निबिड़ तम भानुहि। दनुज गहन घन दहन कृसानुहि ॥ जनकसुता समेत रघुबीरहि। कस न भजहु भंजन भव भीरहि ॥
संशय और शोकरूपी घने अन्धकारके नाश करनेवाले श्रीरामरूप सूर्यको भजो। राक्षसरूपी घने वनको जलानेवाले श्रीरामरूप अग्निको भजो। जन्म-मृत्युके भयको नाश करनेवाले श्रीजानकीजीसमेत श्रीरघुवीरको क्यों नहीं भजते? ॥ ४ ॥
बहु बासना मसक हिम रासिहि। सदा एकरस अज अबिनासिहि ॥ मुनि रंजन भंजन महि भारहि। तुलसिदास के प्रभुहि उदारहि ॥
बहुत-सी वासनाओंरूपी मच्छरोंको नाश करनेवाले श्रीरामरूप हिमराशि (बर्फके ढेर) को भजो। नित्य एकरस, अजन्मा और अविनाशी श्रीरघुनाथजीको भजो। मुनियोंको आनन्द देनेवाले, पृथ्वीका भार उतारनेवाले और तुलसीदासके उदार (दयालु) स्वामी श्रीरामजीको भजो ॥ ५ ॥
१४०
- रामचरितमानस *
दो०—एहि बिधि नगर नारि नर करहिं राम गुन गान। सानुकूल सब पर रहहिं संतत कृपानिधान ॥ ३० ॥
इस प्रकार नगरके स्त्री-पुरुष श्रीरामजीका गुण-गान करते हैं और कृपानिधान श्रीरामजी सदा सबपर अत्यन्त प्रसन्न रहते हैं ॥ ३० ॥
जब ते राम प्रताप खगेसा। उदित भयउ अति प्रबल दिनेसा ॥ पूरि प्रकास रहेउ तिहुँ लोका। बहुतेन्ह सुख बहुतन मन सोका ॥
[काकभुशुण्डिजी कहते हैं—] हे पक्षिराज गरुड़जी! जबसे रामप्रतापरूपी अत्यन्त प्रचण्ड सूर्य उदित हुआ, तबसे तीनों लोकोंमें पूर्ण प्रकाश भर गया है। इससे बहुतोंको सुख और बहुतोंके मनमें शोक हुआ ॥ १ ॥
जिन्हहि सोक ते कहउँ बखानी। प्रथम अबिद्या निसा नसानी ॥ अघ उलूक जहाँ तहाँ लुकाने। काम क्रोध कैरव सकुचाने ॥
जिन-जिनको शोक हुआ, उन्हें मैं बखानकर कहता हूँ। [सर्वत्र प्रकाश छा जानेसे] पहले तो अविद्यारूपी रात्रि नष्ट हो गयी। पापरूपी उलू जहाँ-तहाँ छिप गये और काम-क्रोधरूपी कुमुद मुँद गये ॥ २ ॥
बिबिध कर्म गुन काल सुभाऊ। ए चकोर सुख लहहिं न काऊ ॥ मत्सर मान मोह मद चोरा। इन्ह कर हुनर न कवनहिँ ओरा ॥
भाँति-भाँतिके [बन्धनकारक] कर्म, गुण, काल और स्वभाव—ये चकोर हैं, जो [रामप्रतापरूपी सूर्यके प्रकाशमें] कभी सुख नहीं पाते। मत्सर (डाह), मान, मोह और मदरूपी जो चोर हैं, उनका हुनर (कला) भी किसी ओर नहीं चल पाता ॥ ३ ॥
धरम तड़ाग ग्यान बिग्याना। ए पंकज बिकसे बिधि नाना ॥ सुख संतोष बिराग बिबेका। बिगत सोक ए कोक अनेका ॥
धर्मरूपी तालाबमें ज्ञान, विज्ञान—ये अनेकों प्रकारके कमल खिल उठे। सुख, संतोष, वैराग्य और विवेक—ये अनेकों चकवे शोकरहित हो गये ॥ ४ ॥
दो०—यह प्रताप रबि जाकें उर जब करइ प्रकास। पछिले बाढ़हिं प्रथम जे कहे ते पावहिं नास ॥ ३१ ॥
यह श्रीरामप्रतापरूपी सूर्य जिसके हृदयमें जब प्रकाश करता है, तब जिनका वर्णन पीछेसे किया गया है, वे (धर्म, ज्ञान, विज्ञान, सुख, सन्तोष, वैराग्य और विवेक) बढ़ जाते हैं और जिनका वर्णन पहले किया गया है, वे (अविद्या, पाप, काम, क्रोध, कर्म, काल, गुण, स्वभाव आदि) नाशको प्राप्त होते (नष्ट हो जाते) हैं ॥ ३१ ॥
- उत्तरकाण्ड *
१४१
भ्रातन्ह सहित रामु एक बारा । संग परम प्रिय पवनकुमारा ॥ सुंदर उपवन देखन गए । सब तरु कुसुमित पल्लव नए ॥
एक बार भाइयोंसहित श्रीरामचन्द्रजी परम प्रिय हनुमान्जीको साथ लेकर सुन्दर उपवन देखने गये। वहाँके सब वृक्ष फूले हुए और नये पत्तोंसे युक्त थे ॥ १ ॥
जानि समय सनकादिक आए । तेज पुंज गुन सील सुहाए ॥ ब्रह्मानन्द सदा लयलीना । देखत बालक बहुकालीना ॥
सुअवसर जानकर सनकादि मुनि आये, जो तेजके पुञ्ज, सुन्दर गुण और शीलसे युक्त तथा सदा ब्रह्मानन्दमें लवलीन रहते हैं। देखनेमें तो वे बालक लगते हैं, परन्तु हैं बहुत समयके ॥ २ ॥
रूप धरें जनु चारिउ बेदा । समदरसी मुनि बिगत बिभेदा ॥ आसा बसन व्यसन यह तिन्हहीं । रघुपति चरित होइ तहँ सुनहीं ॥
मानो चारों वेद ही बालकरूप धारण किये हों। वे मुनि समदर्शी और भेदरहित हैं। दिशाएँ ही उनके वस्त्र हैं। उनके एक ही व्यसन है कि जहाँ श्रीरघुनाथजीकी चरित्र-कथा होती है वहाँ जाकर वे उसे अवश्य सुनते हैं ॥ ३ ॥
तहाँ रहे सनकादि भवानी । जहँ घटसंभव मुनिबर ग्यानी ॥ राम कथा मुनिबर बहु बरनी । ग्यान जोनि पावक जिमि अरनी ॥
[शिवजी कहते हैं—] हे भवानी! सनकादि मुनि वहाँ गये थे (वहींसे चले आ रहे थे) जहाँ ज्ञानी मुनिश्रेष्ठ श्रीअगस्त्यजी रहते थे। श्रेष्ठ मुनिने श्रीरामजीकी बहुत-सी कथाएँ वर्णन की थीं, जो ज्ञान उत्पन्न करनेमें उसी प्रकार समर्थ हैं, जैसे अरणि लकड़ीसे अग्नि उत्पन्न होती है ॥ ४ ॥
दो०—देखि राम मुनि आवत हरषि दंडवत कीन्ह।
स्वागत पूँछि पीत पट प्रभु बैठन कहँ दीन्ह ॥ ३२ ॥
सनकादि मुनियोंको आते देखकर श्रीरामचन्द्रजीने हर्षित होकर दण्डवत् की और स्वागत (कुशल) पूछकर प्रभुने [उनके] बैठनेके लिये अपना पीताम्बर बिछा दिया ॥ ३२ ॥
कीन्ह दंडवत तीनिउँ भाई । सहित पवनसुत सुख अधिकाई ॥ मुनि रघुपति छबि अतुल बिलोकी । भए मगन मन सके न रोकी ॥
फिर हनुमान्जीसहित तीनों भाइयोंने दण्डवत् की, सबको बड़ा सुख हुआ। मुनि श्रीरघुनाथजीकी अतुलनीय छबि देखकर उसीमें मग्न हो गये। वे मनको रोक न सके ॥ १ ॥
स्यामल गात सरोरुह लोचन । सुंदरता मंदिर भव मोचन ॥ एकटक रहे निमेष न लावहिं । प्रभु कर जोरें सीस नवावहिं ॥
१४२
- रामचरितमानस *
वे जन्म-मृत्यु [के चक्र] से छुड़ानेवाले, श्यामशरीर, कमलनयन, सुन्दरताके धाम श्रीरामजीको टकटकी लगाये देखते ही रह गये, पलक नहीं मारते। और प्रभु हाथ जोड़े सिर नवा रहे हैं ॥ २ ॥
तिन्ह कै दसा देखि रघुबीरा । स्वत नयन जल पुलक सरीरा ॥ कर गहि प्रभु मुनिबर बैठारे । परम मनोहर बचन उचारे ॥
उनकी [प्रेमविह्वल] दशा देखकर [उन्हींकी भाँति] श्रीरघुनाथजीके नेत्रोंसे भी [प्रेमाश्रुओंका] जल बहने लगा और शरीर पुलकित हो गया। तदनन्तर प्रभुने हाथ पकड़कर श्रेष्ठ मुनियोंको बैठाया और परम मनोहर वचन कहे— ॥ ३ ॥
आजु धन्य मैं सुनहु मुनीसा । तुम्हरेँ दरस जाहिँ अघ खीसा ॥ बड़े भाग पाड़ब सतसंगा । बिनिहिँ प्रयास होहिँ भवभंगा ॥
हे मुनीश्वरो! सुनिये, आज मैं धन्य हूँ। आपके दर्शनोहीसे [सारे] पाप नष्ट हो जाते हैं। बड़े ही भाग्यसे सत्संगकी प्राप्ति होती है, जिससे बिना ही परिश्रम जन्म-मृत्युका चक्र नष्ट हो जाता है ॥ ४ ॥
दो०—संत संग अपर्ग कर कामी भव कर पंथ ।
कहहिँ संत कबि कोबिद श्रुति पुरान सदग्रंथ ॥ ३३ ॥
संतका संग मोक्ष (भव-बन्धनसे छूटने) का और कामीका संग जन्म-मृत्युके बन्धनमें पड़नेका मार्ग है। संत, कवि और पण्डित तथा वेद, पुराण [आदि] सभी सदग्रन्थ ऐसा कहते हैं ॥ ३३ ॥
सुनि प्रभु बचन हरषि मुनि चारी । पुलकित तन अस्तुति अनुसारी ॥ जय भगवंत अनंत अनामय । अनघ अनेक एक करुनामय ॥
प्रभुके वचन सुनकर चारों मुनि हर्षित होकर, पुलकित शरीरसे स्तुति करने लगे—हे भगवन्! आपकी जय हो। आप अन्तरहित, विकाररहित, पापरहित, अनेक (सब रूपोंमें प्रकट), एक (अद्वितीय) और करुणामय हैं ॥ १ ॥
जय निर्गुन जय जय गुन सागर । सुख मंदिर सुंदर अति नागर ॥ जय इंदिरा रमन जय भूधर । अनुपम अज अनादि सोभाकर ॥
हे निर्गुण! आपकी जय हो। हे गुणके समुद्र! आपकी जय हो, जय हो। आप सुखके धाम, [अत्यन्त] सुन्दर और अति चतुर हैं। हे लक्ष्मीपति! आपकी जय हो। हे पृथ्वीके धारण करनेवाले! आपकी जय हो। आप उपमारहित, अजन्मा, अनादि और शोभाकी खान हैं ॥ २ ॥
ग्यान निधान अमान मानप्रद । पावन सुजस पुरान बेद बद ॥ तग्य कृतग्य अग्यता भंजन । नाम अनेक अनाम निरंजन ॥
- उत्तरकाण्ड *
१४३
आप ज्ञानके भण्डार, [स्वयं] मानरहित और [दूसरोंको] मान देनेवाले हैं। वेद और पुराण आपका पावन सुन्दर यश गाते हैं। आप तत्त्वके जाननेवाले, की हुई सेवाको माननेवाले और अज्ञानका नाश करनेवाले हैं। हे निरञ्जन (मायारहित)! आपके अनेकों (अनन्त) नाम हैं और कोई नाम नहीं है (अर्थात् आप सब नामोंके परे हैं) ॥ ३ ॥
सर्वं सर्वगतं सर्वं उरालय । बससि सदा हम कहँ परिपालय ॥ द्वंद बिपति भव फंद बिभंजय । हृदि बसि राम काम मद गंजय ॥
आप सर्वरूप हैं, सबमें व्याप्त हैं और सबके हृदयरूपी घरमें सदा निवास करते हैं; [अतः] आप हमारा परिपालन कीजिये। [राग-द्वेष, अनुकूलता-प्रतिकूलता, जन्म-मृत्यु आदि] द्वन्द्व, बिपति और जन्म-मृत्युके जालको काट दीजिये। हे रामजी! आप हमारे हृदयमें बसकर काम और मदका नाश कर दीजिये ॥ ४ ॥
दो०—परमानंद कृपायतन मन परिपूर्ण काम । प्रेम भगति अनपायनी देहु हमहि श्रीराम ॥ ३४ ॥
आप परमानन्दस्वरूप, कृपाके धाम और मनकी कामनाओंको परिपूर्ण करनेवाले हैं। हे श्रीरामजी! हमको अपनी अविचल प्रेमा-भक्ति दीजिये ॥ ३४ ॥
देहु भगति रघुपति अति पावनि । त्रिबिधि ताप भव दाप नसावनि ॥ प्रनत काम सुरधेनु कलपतरु । होइ प्रसन्न दीजै प्रभु यह बरु ॥
हे रघुनाथजी! आप हमें अपनी अत्यन्त पवित्र करनेवाली और तीनों प्रकारके तापों और जन्म-मरणके क्लेशोंका नाश करनेवाली भक्ति दीजिये। हे शरणागतोंकी कामना पूर्ण करनेके लिये कामधेनु और कल्पवृक्षरूप प्रभो! प्रसन्न होकर हमें यही वर दीजिये ॥ १ ॥
भव बारिधि कुंभज रघुनायक । सेवत सुलभ सकल सुख दायक ॥ मन संभव दारुन दुख दारय । दीनबंधु समता बिस्तारय ॥
हे रघुनाथजी! आप जन्म-मृत्युरूप समुद्रको सोखनेके लिये अगस्त्य मुनिके समान हैं। आप सेवा करनेमें सुलभ हैं तथा सब सुखोंके देनेवाले हैं। हे दीनबन्धो! मनसे उत्पन्न दारुण दुःखोंका नाश कीजिये और [हममें] समदृष्टिका विस्तार कीजिये ॥ २ ॥
आस त्रास इरिषादि निवारक । विनय बिबेक बिरति बिस्तारक ॥ भूप मौलि मनि मंडन धरनी । देहि भगति संसृति सरि तरनी ॥
आप [विषयोंकी] आशा, भय और ईर्ष्या आदिके निवारण करनेवाले हैं तथा विनय, विवेक और वैराग्यके विस्तार करनेवाले हैं। हे राजाओंके शिरोमणि एवं पृथ्वीके भूषण श्रीरामजी! संसृति (जन्म-मृत्युके प्रवाह)-रूपी नदीके लिये नौकारूप अपनी भक्ति प्रदान कीजिये ॥ ३ ॥
मुनि मन मानस हंस निरंतर । चरन कमल बंदित अज संकर ॥ रघुकुल केतु सेतु श्रुति रच्छक । काल करम सुभाउ गुन भच्छक ॥
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- रामचरितमानस *
हे मुनियोंँके मनरूपी मानसरोवरमें निरन्तर निवास करनेवाले हंस! आपके चरणकमल ब्रह्माजी और शिवजीके द्वारा वन्दित हैं। आप रघुकुलके केतु, वेदमर्यादाके रक्षक और काल, कर्म, स्वभाव तथा गुण [—रूप बन्धनों] के भक्षक (नाशक) हैं ॥ ४ ॥
तारन तरन हरन सब दूषन। तुलसिदास प्रभु त्रिभुवन भूषन॥
आप तरन-तारन (स्वयं तेरे हुए और दूसरोंको तारनेवाले) तथा सब दोषोंको हरनेवाले हैं। तीनों लोकोंके विभूषण आप ही तुलसीदासके स्वामी हैं ॥ ५ ॥
दो०—बार बार अस्तुति करि प्रेम सहित सिरु नाइ।
ब्रह्म भवन सनकादि गे अति अभीष्ट बर पाइ॥ ३५ ॥
प्रेमसहित बार-बार स्तुति करके और सिर नवाकर तथा अपना अत्यन्त मनचाहा वर पाकर सनकादि मुनि ब्रह्मलोकको गये ॥ ३५ ॥
सनकादिक बिधि लोक सिधाए। भ्रातन्ह राम चरन सिर नाए॥
पूछत प्रभुहि सकल सकुचाहीं। चितवहिं सब मारुतसुत पाहीं॥
सनकादि मुनि ब्रह्मलोकको चले गये। तब भाइयोंने श्रीरामजीके चरणोंमें सिर नवाया। सब भाई प्रभुसे पूछते सकुचाते हैं। [इसलिये] सब हनुमान्जीकी ओर देख रहे हैं ॥ १ ॥
सुनी चहहिं प्रभु मुख कै बानी। जो सुनि होइ सकल भ्रम हानी॥
अंतरजामी प्रभु सभ जाना। बूझत कहहु काह हनुमाना॥
वे प्रभुके श्रीमुखकी वाणी सुनना चाहते हैं, जिसे सुनकर सारे भ्रमोंका नाश हो जाता है। अन्तर्यामी प्रभु सब जान गये और पूछने लगे—कहो हनुमान्! क्या बात है? ॥ २ ॥
जोरि पानि कह तब हनुमंता। सुनहु दीनदयाल भगवंता॥
नाथ भरत कछु पूँछन चहहीं। प्रस्न करत मन सकुचत अहहीं॥
तब हनुमान्जी हाथ जोड़कर बोले—हे दीनदयालु भगवान्! सुनिये। हे नाथ! भरतजी कुछ पूछना चाहते हैं, पर प्रश्न करते मनमें सकुचा रहे हैं ॥ ३ ॥
तुम्ह जानहु कपि मोर सुभाऊ। भरतहि मोहि कछु अंतर काऊ॥
सुनि प्रभु बचन भरत गहे चरना। सुनहु नाथ प्रनतारति हरना॥
[भगवान्ने कहा—] हनुमान्! तुम तो मेरा स्वभाव जानते ही हो। भरतके और मेरे बीचमें कभी भी कोई अन्तर (भेद) है? प्रभुके वचन सुनकर भरतजीने उनके चरण पकड़ लिये [और कहा—] हे नाथ! हे शरणागतके दुःखोंको हरनेवाले! सुनिये ॥ ४ ॥
दो०—नाथ न मोहि संदेह कछु सपनेहूँ सोक न मोह।
केवल कृपा तुम्हारिहि कृपानंद संदोह॥ ३६ ॥