श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 944, कुल 1058 में से
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- रामचरितमानस *
वे जन्म-मृत्यु [के चक्र] से छुड़ानेवाले, श्यामशरीर, कमलनयन, सुन्दरताके धाम श्रीरामजीको टकटकी लगाये देखते ही रह गये, पलक नहीं मारते। और प्रभु हाथ जोड़े सिर नवा रहे हैं ॥ २ ॥
तिन्ह कै दसा देखि रघुबीरा । स्वत नयन जल पुलक सरीरा ॥ कर गहि प्रभु मुनिबर बैठारे । परम मनोहर बचन उचारे ॥
उनकी [प्रेमविह्वल] दशा देखकर [उन्हींकी भाँति] श्रीरघुनाथजीके नेत्रोंसे भी [प्रेमाश्रुओंका] जल बहने लगा और शरीर पुलकित हो गया। तदनन्तर प्रभुने हाथ पकड़कर श्रेष्ठ मुनियोंको बैठाया और परम मनोहर वचन कहे— ॥ ३ ॥
आजु धन्य मैं सुनहु मुनीसा । तुम्हरेँ दरस जाहिँ अघ खीसा ॥ बड़े भाग पाड़ब सतसंगा । बिनिहिँ प्रयास होहिँ भवभंगा ॥
हे मुनीश्वरो! सुनिये, आज मैं धन्य हूँ। आपके दर्शनोहीसे [सारे] पाप नष्ट हो जाते हैं। बड़े ही भाग्यसे सत्संगकी प्राप्ति होती है, जिससे बिना ही परिश्रम जन्म-मृत्युका चक्र नष्ट हो जाता है ॥ ४ ॥
दो०—संत संग अपर्ग कर कामी भव कर पंथ ।
कहहिँ संत कबि कोबिद श्रुति पुरान सदग्रंथ ॥ ३३ ॥
संतका संग मोक्ष (भव-बन्धनसे छूटने) का और कामीका संग जन्म-मृत्युके बन्धनमें पड़नेका मार्ग है। संत, कवि और पण्डित तथा वेद, पुराण [आदि] सभी सदग्रन्थ ऐसा कहते हैं ॥ ३३ ॥
सुनि प्रभु बचन हरषि मुनि चारी । पुलकित तन अस्तुति अनुसारी ॥ जय भगवंत अनंत अनामय । अनघ अनेक एक करुनामय ॥
प्रभुके वचन सुनकर चारों मुनि हर्षित होकर, पुलकित शरीरसे स्तुति करने लगे—हे भगवन्! आपकी जय हो। आप अन्तरहित, विकाररहित, पापरहित, अनेक (सब रूपोंमें प्रकट), एक (अद्वितीय) और करुणामय हैं ॥ १ ॥
जय निर्गुन जय जय गुन सागर । सुख मंदिर सुंदर अति नागर ॥ जय इंदिरा रमन जय भूधर । अनुपम अज अनादि सोभाकर ॥
हे निर्गुण! आपकी जय हो। हे गुणके समुद्र! आपकी जय हो, जय हो। आप सुखके धाम, [अत्यन्त] सुन्दर और अति चतुर हैं। हे लक्ष्मीपति! आपकी जय हो। हे पृथ्वीके धारण करनेवाले! आपकी जय हो। आप उपमारहित, अजन्मा, अनादि और शोभाकी खान हैं ॥ २ ॥
ग्यान निधान अमान मानप्रद । पावन सुजस पुरान बेद बद ॥ तग्य कृतग्य अग्यता भंजन । नाम अनेक अनाम निरंजन ॥