श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 943, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- उत्तरकाण्ड *
१४१
भ्रातन्ह सहित रामु एक बारा । संग परम प्रिय पवनकुमारा ॥ सुंदर उपवन देखन गए । सब तरु कुसुमित पल्लव नए ॥
एक बार भाइयोंसहित श्रीरामचन्द्रजी परम प्रिय हनुमान्जीको साथ लेकर सुन्दर उपवन देखने गये। वहाँके सब वृक्ष फूले हुए और नये पत्तोंसे युक्त थे ॥ १ ॥
जानि समय सनकादिक आए । तेज पुंज गुन सील सुहाए ॥ ब्रह्मानन्द सदा लयलीना । देखत बालक बहुकालीना ॥
सुअवसर जानकर सनकादि मुनि आये, जो तेजके पुञ्ज, सुन्दर गुण और शीलसे युक्त तथा सदा ब्रह्मानन्दमें लवलीन रहते हैं। देखनेमें तो वे बालक लगते हैं, परन्तु हैं बहुत समयके ॥ २ ॥
रूप धरें जनु चारिउ बेदा । समदरसी मुनि बिगत बिभेदा ॥ आसा बसन व्यसन यह तिन्हहीं । रघुपति चरित होइ तहँ सुनहीं ॥
मानो चारों वेद ही बालकरूप धारण किये हों। वे मुनि समदर्शी और भेदरहित हैं। दिशाएँ ही उनके वस्त्र हैं। उनके एक ही व्यसन है कि जहाँ श्रीरघुनाथजीकी चरित्र-कथा होती है वहाँ जाकर वे उसे अवश्य सुनते हैं ॥ ३ ॥
तहाँ रहे सनकादि भवानी । जहँ घटसंभव मुनिबर ग्यानी ॥ राम कथा मुनिबर बहु बरनी । ग्यान जोनि पावक जिमि अरनी ॥
[शिवजी कहते हैं—] हे भवानी! सनकादि मुनि वहाँ गये थे (वहींसे चले आ रहे थे) जहाँ ज्ञानी मुनिश्रेष्ठ श्रीअगस्त्यजी रहते थे। श्रेष्ठ मुनिने श्रीरामजीकी बहुत-सी कथाएँ वर्णन की थीं, जो ज्ञान उत्पन्न करनेमें उसी प्रकार समर्थ हैं, जैसे अरणि लकड़ीसे अग्नि उत्पन्न होती है ॥ ४ ॥
दो०—देखि राम मुनि आवत हरषि दंडवत कीन्ह।
स्वागत पूँछि पीत पट प्रभु बैठन कहँ दीन्ह ॥ ३२ ॥
सनकादि मुनियोंको आते देखकर श्रीरामचन्द्रजीने हर्षित होकर दण्डवत् की और स्वागत (कुशल) पूछकर प्रभुने [उनके] बैठनेके लिये अपना पीताम्बर बिछा दिया ॥ ३२ ॥
कीन्ह दंडवत तीनिउँ भाई । सहित पवनसुत सुख अधिकाई ॥ मुनि रघुपति छबि अतुल बिलोकी । भए मगन मन सके न रोकी ॥
फिर हनुमान्जीसहित तीनों भाइयोंने दण्डवत् की, सबको बड़ा सुख हुआ। मुनि श्रीरघुनाथजीकी अतुलनीय छबि देखकर उसीमें मग्न हो गये। वे मनको रोक न सके ॥ १ ॥
स्यामल गात सरोरुह लोचन । सुंदरता मंदिर भव मोचन ॥ एकटक रहे निमेष न लावहिं । प्रभु कर जोरें सीस नवावहिं ॥