श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 929, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- उत्तरकाण्ड *
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प्रभुके वचन सुनकर सब-के-सब प्रेममग्न हो गये। हम कौन हैं और कहाँ हैं? यह देहकी सुध भी भूल गयी। वे प्रभुके सामने हाथ जोड़कर टकटकी लगाये देखते ही रह गये। अत्यन्त प्रेमके कारण कुछ कह नहीं सकते ॥ १ ॥
परम प्रेम तिन्ह कर प्रभु देखा । कहा बिबिधि बिधि ग्यान बिसेषा ॥ प्रभु सन्मुख कछु कहन न पारहिं । पुनि पुनि चरन सरोज निहारहिं ॥
प्रभुने उनका अत्यन्त प्रेम देखा, [तब] उन्हें अनेकों प्रकारसे विशेष ज्ञानका उपदेश दिया। प्रभुके सम्मुख वे कुछ कह नहीं सकते। बार-बार प्रभुके चरणकमलोंको देखते हैं ॥ २ ॥
तब प्रभु भूषन बसन मगाए । नाना रंग अनूप सुहाए ॥ सुग्रीवहि प्रथमहिं पहिराए । बसन भरत निज हाथ बनाए ॥
तब प्रभुने अनेक रंगोंके अनुपम और सुन्दर गहने-कपड़े मँगावाये। सबसे पहले भरतजीने अपने हाथसे सँवारकर सुग्रीवको वस्त्राभूषण पहनाये ॥ ३ ॥
प्रभु प्रेरित लछिमन पहिराए । लंकापति रघुपति मन भाए ॥ अंगद बैठ रहा नहिं डोला । प्रीति देखि प्रभु ताहि न बोला ॥
फिर प्रभुकी प्रेरणासे लक्ष्मणजीने विभीषणजीको गहने-कपड़े पहनाये, जो श्रीरघुनाथजीके मनको बहुत ही अच्छे लगे। अंगद बैठे ही रहे, वे अपनी जगहसे हिलेतक नहीं। उनका उत्कट प्रेम देखकर प्रभुने उनको नहीं बुलाया ॥ ४ ॥
दो०—जामवंत नीलादि सब पहिराए रघुनाथ ।
हिर्घ धरि राम रूप सब चले नाड़ पद माथ ॥ १७ (क) ॥
जाम्बवान् और नील आदि सबको श्रीरघुनाथजीने स्वयं भूषण-वस्त्र पहनाये। वे सब अपने हृदयोंमें श्रीरामचन्द्रजीके रूपको धारण करके उनके चरणोंमें मस्तक नवाकर चले ॥ १७ (क) ॥
तब अंगद उठि नाड़ सिरु सजल नयन कर जोरि ।
अति बिनीत बोलेउ बचन मनहुँ प्रेम रस बोरि ॥ १७ (ख) ॥
तब अंगद उठकर सिर नवाकर, नेत्रोंमें जल भरकर और हाथ जोड़कर अत्यन्त विनम्र तथा मानो प्रेमके रसमें डुबोये हुए (मधुर) वचन बोले ॥ १७ (ख) ॥
सुनु सर्बग्य कृपा सुख सिंधो । दीन दयाकर आरत बंधो ॥ मरती बेर नाथ मोहि बाली । गयउ तुम्हारेहि कोछें घाली ॥
हे सर्वज्ञ! हे कृपा और सुखके समुद्र! हे दीनोंपर दया करनेवाले! हे आर्तोंके बन्धु! सुनिये। हे नाथ! मरते समय मेरा पिता बालि मुझे आपकी ही गोदमें डाल गया था ॥ १ ॥