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भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 930, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 930

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  • रामचरितमानस *

असरन सरन बिरदु संभारी । मोहि जनि तजहु भगत हितकारी ॥ मोरें तुम्ह प्रभु गुर पितु माता । जाऊँ कहाँ तजि पद जलजाता ॥

अतः हे भक्तोंके हितकारी! अपना अशरण-शरण विरद (बाना) याद करके मुझे त्यागिये नहीं। मेरे तो स्वामी, गुरु, पिता और माता, सब कुछ आप ही हैं। आपके चरणकमलोंको छोड़कर मैं कहाँ जाऊँ? ॥ २ ॥

तुम्हहि बिचारि कहहु नरनाहा । प्रभु तजि भवन काज मम काहा ॥ बालक ग्यान बुद्धि बल हीना । राखहु सरन नाथ जन दीना ॥

हे महाराज! आप ही विचारकर कहिये, प्रभु (आप) को छोड़कर घरमें मेरा क्या काम है? हे नाथ! इस ज्ञान, बुद्धि और बलसे हीन बालक तथा दीन सेवकको शरणमें रखिये ॥ ३ ॥

नीचि टहल गृह कै सब करिहउँ । पद पंकज बिलोकि भव तरिहउँ ॥ अस कहि चरन परेउ प्रभु पाही । अब जनि नाथ कहहु गृह जाही ॥

मैं घरकी सब नीची-से-नीची सेवा करूँगा और आपके चरणकमलोंको देख-देखकर भवसागरसे तर जाऊँगा। ऐसा कहकर वे श्रीरामजीके चरणोंमें गिर पड़े [और बोले—] हे प्रभो! मेरी रक्षा कीजिये। हे नाथ! अब यह न कहिये कि तू घर जा ॥ ४ ॥

दो०—अंगद बचन बिनीत सुनि रघुपति करुना सींव।

प्रभु उठाइ उर लायउ सजल नयन राजीव ॥ १८ (क) ॥

अङ्गदके विनम्र वचन सुनकर करुणाकी सीमा प्रभु श्रीरघुनाथजीने उनको उठाकर हृदयसे लगा लिया। प्रभुके नेत्रकमलोंमें [प्रेमाश्रुओंका] जल भर आया ॥ १८ (क) ॥

निज उर माल बसन मनि बालितनय पहिराइ ॥

बिदा कीन्हि भगवान तब बहु प्रकार समुझाइ ॥ १८ (ख) ॥

तब भगवान्ने अपने हृदयकी माला, वस्त्र और मणि (रत्नोंके आभूषण) बालि-पुत्र अङ्गदको पहनाकर और बहुत प्रकारसे समझाकर उनकी विदाई की ॥ १८ (ख) ॥

भरत अनुज सौमित्रि समेता । पठवन चले भगत कृत चेता ॥ अंगद हृदयँ प्रेम नहीं थोरा । फिरि फिरि चितव राम कीँ ओरा ॥

भक्तकी करनीको याद करके भरतजी छोटे भाई शत्रुघ्मजी और लक्ष्मणजीसहित उनको पहुँचाने चले। अङ्गदके हृदयमें थोड़ा प्रेम नहीं है (अर्थात् बहुत अधिक प्रेम है)। वे फिर-फिरकर श्रीरामजीकी ओर देखते हैं, ॥ १ ॥

बार बार कर दंड प्रनामा । मन अस रहन कहहिं मोहि रामा ॥ राम बिलोकनि बोलनि चलनी । सुमिरि सुमिरि सोचत हँसि मिलनी ॥