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भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 931, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 931
  • उत्तरकाण्ड *

१२१

और बार-बार दण्डवत्-प्रणाम करते हैं। मनमें ऐसा आता है कि श्रीरामजी मुझे रहनेको कह दें। वे श्रीरामजीके देखनेकी, बोलनेकी, चलनेकी तथा हँसकर मिलनेकी रीतिको याद कर-करके सोचते हैं (दुखी होते हैं) ॥ २ ॥

प्रभु रुख देखि बिनय बहु भाषी । चलेउ हृदयँ पद पंकज राखी ॥ अति आदर सब कपि पहुँचाए । भाइन्ह सहित भरत पुनि आए ॥

किन्तु प्रभुका रुख देखकर, बहुत-से विनयवचन कहकर तथा हृदयमें चरण-कमलोंको रखकर वे चले। अत्यन्त आदरके साथ सब वानरोंको पहुँचाकर भाइयोंसहित भरतजी लौट आये ॥ ३ ॥

तब सुग्रीव चरन गहि नाना । भाँति बिनय कीन्हे हनुमाना ॥ दिन दस करि रघुपति पद सेवा । पुनि तव चरन देखिहउँ देवा ॥

तब हनुमान्जीने सुग्रीवके चरण पकड़कर अनेक प्रकारसे विनती की और कहा—हे देव! दस (कुछ) दिन श्रीरघुनाथजीकी चरणसेवा करके फिर मैं आकर आपके चरणोंके दर्शन करूँगा ॥ ४ ॥

पुन्य पुंज तुम्ह पवनकुमारा । सेवहु जाइ कृपा आगारा ॥ अस कहि कपि सब चले तुरंता । अंगद कहइ सुनुहु हनुमंता ॥

[सुग्रीवने कहा—] हे पवनकुमार! तुम पुण्यकी राशि हो [जो भगवान्ने तुमको अपनी सेवामें रख लिया]। जाकर कृपाथाम श्रीरामजीकी सेवा करो। सब वानर ऐसा कहकर तुरंत चल पड़े। अङ्गदने कहा—हे हनुमान्! सुनो— ॥ ५ ॥

दो०—कहेहु दंडवत प्रभु सँ तुम्हहि कहउँ कर जोरि।

बार बार रघुनायकहि सुरति कराएहु मोरि ॥ १९ ( क ) ॥

मैं तुमसे हाथ जोड़कर कहता हूँ, प्रभुसे मेरी दण्डवत् कहना और श्रीरघुनाथजीको बार-बार मेरी याद कराते रहना ॥ १९ (क) ॥

अस कहि चलेउ बालिसुत फिरि आयउ हनुमंत।

तासु प्रीति प्रभु सन कही मगन भए भगवंत ॥ १९ ( ख ) ॥

ऐसा कहकर बालिपुत्र अङ्गद चले, तब हनुमान्जी लौट आये और आकर प्रभुसे उनका प्रेम वर्णन किया। उसे सुनकर भगवान् प्रेममग्न हो गये ॥ १९ (ख) ॥

कुलिसहु चाहि कठोर अति कोमल कुसुमहु चाहि।

चित्त खगेस राम कर समुझि परइ कहु काहि ॥ १९ ( ग ) ॥

[काकभुशुण्डिजी कहते हैं—] हे गरुड़जी! श्रीरामजीका चित्त वज्रसे भी अत्यन्त कठोर और फूलसे भी अत्यन्त कोमल है। तब कहिये, वह किसकी समझमें आ सकता है? ॥ १९ (ग) ॥