श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 957, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- उत्तरकाण्ड *
१५५
जब न लेउँ मैं तब बिधि मोही । कहा लाभ आगें सुत तोही ॥ परमात्मा ब्रह्म नर रूपा । होइहि रघुकुल भूषण भूपा ॥
जब मैं उसे (सूर्यवंशकी पुरोहितीका काम) नहीं लेता था, तब ब्रह्माजीने मुझे कहा था—हे पुत्र! इससे तुमको आगे चलकर बहुत लाभ होगा। स्वयं ब्रह्म परमात्मा मनुष्यरूप धारण कर रघुकुलके भूषण राजा होंगे ॥ ४ ॥
दो०—तब मैं हृदयँ बिचारा जोग जग्य ब्रत दान। जा कहँ करिअ सो पैहउँ धर्म न एहि सम आन ॥ ४८ ॥
तब मैंने हृदयमें विचार किया कि जिसके लिये योग, यज्ञ, ब्रत और दान किये जाते हैं, उसे मैं इसी कर्मसे पा जाऊँगा; तब तो इसके समान दूसरा कोई धर्म ही नहीं है ॥ ४८ ॥
जप तप नियम जोग निज धर्मा । श्रुति संभव नाना सुभ कर्मा ॥ ग्यान दया दम तीरथ मज्जन । जहँ लगि धर्म कहत श्रुति सज्जन ॥
जप, तप, नियम, योग, अपने-अपने [वर्णाश्रमके] धर्म, श्रुतियोंसे उत्पन्न (वेदविहित) बहुत-से शुभ कर्म, ज्ञान, दया, दम (इन्द्रियनिग्रह), तीर्थस्नान आदि जहाँतक वेद और संतजनोंने धर्म कहे हैं [उनके करनेका]— ॥ १ ॥
आगम निगम पुरान अनेका । पढ़े सुने कर फल प्रभु एका ॥ तव पद पंकज प्रीति निरंतर । सब साधन कर यह फल सुंदर ॥
[तथा] हे प्रभो! अनेक तन्त्र, वेद और पुराणोंके पढ़ने और सुनेका सर्वोत्तम फल एक ही है और सब साधनोंका भी यही एक सुन्दर फल है कि आपके चरणकमलोंमें सदा-सर्वदा प्रेम हो ॥ २ ॥
छूटइ मल कि मलहि के धोएँ । घृत कि पाव कोइ बारि बिलोएँ ॥ प्रेम भगति जल बिनु रघुराई । अभिअंतर मल कबहँ न जाई ॥
मैंलसे धोनेसे क्या मैल छूटता है? जलके मथनेसे क्या कोई घी पा सकता है? [उसी प्रकार] हे रघुनाथजी! प्रेम-भक्तिरूपी [निर्मल] जलके बिना अन्तःकरणका मल कभी नहीं जाता ॥ ३ ॥
सोइ सर्वग्य तग्य सोइ पंडित । सोइ गुन गूह बिग्यान अखंडित ॥ दच्छ सकल लच्छन जुत सोई । जाकें पद सरोज रति होई ॥
वही सर्वज्ञ है, वही तत्त्वज्ञ और पण्डित है, वही गुणोंका घर और अखण्ड विज्ञानवान् है; वही चतुर और सब सुलक्षणोंसे युक्त है, जिसका आपके चरणकमलोंमें प्रेम है ॥ ४ ॥