श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 958, कुल 1058 में से
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- रामचरितमानस *
दो०—नाथ एक बार मागउँ राम कृपा करि देहु। जन्म जन्म प्रभु पद कमल कबहुँ घटै जनि नेहु ॥ ४९ ॥
हे नाथ! हे श्रीरामजी! मैं आपसे एक बार माँगता हूँ, कृपा करके दीजिये। प्रभु (आप) के चरणकमलोंमें मेरा प्रेम जन्म-जन्मान्तरमें भी कभी न घटे ॥ ४९ ॥
अस कहि मुनि बसिष्ठ गृह आए । कृपासिंधु के मन अति भाए ॥ हनुमान भरतादिक भ्राता । संग लिए सेवक सुखदाता ॥
ऐसा कहकर मुनि बसिष्ठजी घर आये। वे कृपासागर श्रीरामजीके मनको बहुत ही अच्छे लगे। तदनन्तर सेवकोंको सुख देनेवाले श्रीरामजीने हनुमान्जी तथा भरतजी आदि भाइयोंको साथ लिया ॥ १ ॥
पुनि कृपाल पुर बाहेर गए । गज रथ तुरग मगावत भए ॥ देखि कृपा करि सकल सराहे । दिए उचित जिन्ह जिन्ह तेइ चाहे ॥
और फिर कृपालु श्रीरामजी नगरके बाहर गये और वहाँ उन्होंने हाथी, रथ और घोड़े मँगाये। उन्हें देखकर, कृपा करके प्रभुने सबकी सराहना की और उनको जिस-जिसने चाहा, उस-उसको उचित जानकर दिया ॥ २ ॥
हरन सकल श्रम प्रभु श्रम पाई । गए जहाँ सीतल अवैराई ॥ भरत दीन्ह निज बसन डसाई । बैठे प्रभु सेवहिं सब भाई ॥
संसारके सभी श्रमोंको हरनेवाले प्रभुने [हाथी, घोड़े आदि बाँटनेमें] श्रमका अनुभव किया और [श्रम मिटानेको] वहाँ गये जहाँ सीतल अमराई (आमोंका बगीचा) थी। वहाँ भरतजीने अपना वस्त्र बिछा दिया। प्रभु उसपर बैठ गये और सब भाई उनकी सेवा करने लगे ॥ ३ ॥
मारुतसुत तब मारुत करई । पुलक बपुष लोचन जल भरई ॥ हनुमान सम नहीं बड़भागी । नहीं कोउ राम चरन अनुरागी ॥ गिरिजा जासु प्रीति सेवकाई । बार बार प्रभु निज मुख गाई ॥
उस समय पवनपुत्र हनुमान्जी पवन (पंखा) करने लगे। उनका शरीर पुलकित हो गया और नेत्रोंमें [प्रेमाश्रुओंका] जल भर आया। [शिवजी कहने लगे—] हे गिरिजे! हनुमान्जीके समान न तो कोई बड़भागी है और न कोई श्रीरामजीके चरणोंका प्रेमी ही है, जिनके प्रेम और सेवाकी [स्वयं] प्रभुने अपने श्रीमुखसे बार-बार बढ़ाई की है ॥ ४-५ ॥
दो०—तेहिं अवसर मुनि नारद आए करतल बीन। गावन लगे राम कल कीरति सदा नबीन ॥ ५० ॥