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भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 960, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 960

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  • रामचरितमानस *

गिरिजा सुनहु बिसद यह कथा । मैं सब कही मोरि मति जथा ॥ राम चरित सत कोटि अपारा । श्रुति सारदा न बरनै पारा ॥

[शिवजी कहते हैं—] हे गिरिजे! सुनो, मैंने यह उज्ज्वल कथा, जैसी मेरी बुद्धि थी, वैसी पूरी कह डाली। श्रीरामजीके चरित्र सौ करोड़ [अथवा] अपार हैं। श्रुति और सारदा भी उनका वर्णन नहीं कर सकते ॥ १ ॥

राम अनंत अनंत गुनानी । जन्म कर्म अनंत नामानी ॥ जल सीकर महि रज गनि जाहीं । रघुपति चरित न बरनि सिराहीं ॥

भगवान् श्रीराम अनन्त हैं; उनके गुण अनन्त हैं; जन्म, कर्म और नाम भी अनन्त हैं। जलकी बूँदें और पृथ्वीके रज-कण चाहे गिने जा सकते हों, पर श्रीरघुनाथजीके चरित्र वर्णन करनेसे नहीं चुकते ॥ २ ॥

बिमल कथा हरि पद दायनी । भगति होइ सुनि अनपायनी ॥ उमा कहिउँ सब कथा सुहाई । जो भुसुंडि खगपतिहि सुनाई ॥

यह पवित्र कथा भगवान्के परमपदको देनेवाली है। इसके सुननेसे अविचल भक्ति प्राप्त होती है। हे उमा! मैंने वह सब सुन्दर कथा कही जो काकभुशुण्डिजीने गरुड़जीको सुनायी थी ॥ ३ ॥

कछुक राम गुन कहेउँ बखानी । अब का कहौं सो कहहु भवानी ॥ सुनि सुभ कथा उमा हरषानी । बोली अति बिनीत मृदु बानी ॥

मैंने श्रीरामजीके कुछ थोड़े-से गुण बखानकर कहे हैं। हे भवानी! सो कहो, अब और क्या कहूँ? श्रीरामजीकी मङ्गलमयी कथा सुनकर पार्वतीजी हर्षित हुई और अत्यन्त विनम्र तथा कोमल वाणी बोली— ॥ ४ ॥

धन्य धन्य मैं धन्य पुरारी । सुनेउँ राम गुन भव भय हारी ॥

हे त्रिपुरारि! मैं धन्य हूँ, धन्य-धन्य हूँ जो मैंने जन्म-मृत्युके भयको हरण करनेवाले श्रीरामजीके गुण (चरित्र) सुने ॥ ५ ॥

दो०— तुम्हरी कृपाँ कृपायतन अब कृतकृत्य न मोह।

जानेउँ राम प्रताप प्रभु चिदानंद संदोह ॥ ५२ (क) ॥

हे कृपाथाम! अब आपकी कृपासे मैं कृतकृत्य हो गयी। अब मुझे मोह नहीं रह गया। हे प्रभु! मैं सच्चिदानन्दधन प्रभु श्रीरामजीके प्रतापको जान गयी ॥ ५२ (क) ॥

नाथ तवानन ससि स्वत कथा सुधा रघुबीर।

श्रवन पुटन्हि मन पान करि नहिं अघात मतिधीर ॥ ५२ (ख) ॥