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भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 961, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 961
  • उत्तरकाण्ड *

१५९

हे नाथ! आपका मुखरूपी चन्द्रमा श्रीरघुवीरकी कथारूपी अमृत बरसाता है। हे मतिधीर! मेरा मन कर्णपुटोंसे उसे पीकर तूस नहीं होता॥५२ (ख)॥

राम चरित जे सुनत अघाहीं। रस बिसेष जाना तिन्ह नाहीं॥ जीवनमुक्त महामुनि जेऊ। हरि गुन सुनहिं निरंतर तेऊ॥

श्रीरामजीके चरित्र सुनते-सुनते जो तूस हो जाते हैं (बस कर देते हैं), उन्हींने तो उसका विशेष रस जाना ही नहीं। जो जीवनमुक्त महामुनि हैं, वे भी भगवान्के गुण निरन्तर सुनते रहते हैं ॥ १ ॥

भव सागर चह पार जो पावा। राम कथा ता कहैं दूढ़ नावा॥ बिषइन्ह कहैं पुनि हरि गुन ग्रामा। श्रवन सुखद अरु मन अभिरामा॥

जो संसाररूपी सागरका पार पाना चाहता है, उसके लिये तो श्रीरामजीकी कथा दूढ़ नौकाके समान है। श्रीहरिके गुणसमूह तो विषयी लोगोंके लिये भी कानोंको सुख देनेवाले और मनको आनन्द देनेवाले हैं ॥ २ ॥

श्रवनवंत अस को जग माहीं। जाहि न रघुपति चरित सोहाहीं॥ ते जड़ जीव निजात्मक घाती। जिन्हहि न रघुपति कथा सोहाती॥

जगत्में कानवाला ऐसा कौन है जिसे श्रीरघुनाथजीके चरित्र न सुहाते हों। जिन्हें श्रीरघुनाथजीकी कथा नहीं सुहाती, वे मूर्ख जीव तो अपनी आत्माकी हत्या करनेवाले हैं ॥ ३ ॥

हरिचरित्र मानस तुम्ह गावा। सुनि मैं नाथ अमिति सुख पावा॥ तुम्ह जो कही यह कथा सुहाई। कागभसुंडि गरुड़ प्रति गाई॥

हे नाथ! आपने श्रीरामचरित्रमानसका गान किया, उसे सुनकर मैंने अपार सुख पाया। आपने जो यह कहा कि यह सुन्दर कथा काकभुशुण्डिजीने गरुड़जीसे कही थी— ॥ ४ ॥

दो०—बिरति ग्यान बिग्यान दूढ़ राम चरन अति नेह।

बायस तन रघुपति भगति मोहि परम संदेह॥५३॥

सो कौएका शरीर पाकर भी काकभुशुण्डि वैराग्य, ज्ञान और विज्ञानमें दूढ़ हैं, उनका श्रीरामजीके चरणोंमें अत्यन्त प्रेम है और उन्हें श्रीरघुनाथजीकी भक्ति भी प्राप्त है, इस बातका मुझे परम सन्देह हो रहा है ॥५३॥

नर सहस्त्र महैं सुनहु पुरारी। कोउ एक होइ धर्म ब्रतधारी॥ धर्मसील कोटिक महैं कोई। बिषय बिमुख बिराग रत होई॥

हे त्रिपुरारि! सुनिये, हजारों मनुष्योंमें कोई एक धर्मके ब्रतका धारण करनेवाला होता है और करोड़ों धर्मात्माओंमें कोई एक विषयसे विमुख (विषयोंका त्यागी) और वैराग्यपरायण होता है ॥ १ ॥