श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 962, कुल 1058 में से
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- रामचरितमानस *
कोटि बिरक्त मध्य श्रुति कहई। सम्यक् ग्यान सकृत कोउ लहई॥ ग्यानवंत कोटिक महाँ कोऊ। जीवनमुक्त सकृत जग सोऊ॥
श्रुति कहती है कि करोड़ों विरक्तोंमें कोई एक ही सम्यक् (यथार्थ) ज्ञानको प्राप्त करता है। और करोड़ों ज्ञानियोंमें कोई एक ही जीवनमुक्त होता है। जगत्में कोई विरला ही ऐसा (जीवनमुक्त) होगा ॥ २ ॥
तिन्ह सहस्त्र महुँ सब सुख खानी। दुर्लभ ब्रह्म लीन बिग्यानी॥ धर्मसील बिरक्त अरु ग्यानी। जीवनमुक्त ब्रह्मपर प्रानी॥
हजारों जीवनमुक्तोंमें भी सब सुखोंकी खान, ब्रह्ममें लीन विज्ञानवान् पुरुष और भी दुर्लभ है। धर्मात्मा, वैराग्यवान्, ज्ञानी, जीवनमुक्त और ब्रह्मलीन— ॥ ३ ॥
सब ते सो दुर्लभ सुरराया। राम भगति रत गत मद माया॥ सो हरिभगति काग किमि पाई। बिस्वनाथ मोहि कहहु बुझाई॥
इन सबमें भी हे देवाधिदेव महादेवजी! वह प्राणी अत्यन्त दुर्लभ है जो मद और मायासे रहित होकर श्रीरामजीकी भक्तिके परायण हो। हे विश्वनाथ! ऐसी दुर्लभ हरिभक्तिको कौआ कैसे पा गया, मुझे समझाकर कहिये ॥ ४ ॥
दो०—राम परायण ग्यान रत गुनागार मति धीर।
नाथ कहहु केहि कारण पायउ काक सरीर॥ ५४॥
हे नाथ! कहिये, [ऐसे] श्रीरामपरायण, ज्ञाननिरत, गुणधाम और धीरबुद्धि भुशुण्डिजीने कौएका शरीर किस कारण पाया? ॥ ५४ ॥
यह प्रभु चरित पवित्र सुहावा। कहहु कृपाल काग कहँ पावा॥ तुम्ह केहि भाँति सुना मदनारी। कहहु मोहि अति कौतुक भारी॥
हे कृपालु! बताइये, उस कौएने प्रभुका यह पवित्र और सुन्दर चरित्र कहाँ पाया? और हे कामदेवके शत्रु! यह भी बताइये, आपने इसे किस प्रकार सुना? मुझे बड़ा भारी कौतूहल हो रहा है ॥ १ ॥
गरुड़ महाग्यानी गुन रासी। हरि सेवक अति निकट निवासी॥ तेहिं केहि हेतु काग सन जाई। सुनी कथा मुनि निकर बिहाई॥
गरुड़जी तो महान् ज्ञानी, सद्गुणोंकी राशि, श्रीहरिके सेवक और उनके अत्यन्त निकट रहनेवाले (उनके वाहन ही) हैं। उन्होंने मुनियोंके समूहको छोड़कर, कौएसे जाकर हरिकथा किस कारण सुनी? ॥ २ ॥
कहहु कवन बिधि भा संबादा। दोउ हरिभगत काग उरगादा॥ गौरि गिरा सुनि सरल सुहाई। बोले सिव सादर सुख पाई॥