श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 966, कुल 1058 में से
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- रामचरितमानस *
गरुड़जीने अनेकों प्रकारसे अपने मनको समझाया। पर उन्हें ज्ञान नहीं हुआ, हृदयमें भ्रम और भी अधिक छा गया। [सन्देहजनित] दुःखसे दुखी होकर, मनमें कुतर्क बढ़ाकर वे तुम्हारी ही भाँति मोहवश हो गये ॥ १ ॥
व्याकुल गयउ देवरिषि पाहीं । कहेसि जो संसय निज मन माहीं ॥ सुनि नारदहि लागि अति दाय। सुनु खग प्रबल राम कै माया ॥
व्याकुल होकर वे देवर्षि नारदजीके पास गये और मनमें जो सन्देह था, वह उनसे कहा। उसे सुनकर नारदको अत्यन्त दया आयी। [उन्होंने कहा—] हे गरुड़! सुनिये, श्रीरामजीकी माया बड़ी ही बलवती है ॥ २ ॥
जो ग्यानिन्ह कर चित अपहरई । बरिआई बिमोह मन करई ॥ जेहिं बहु बार नचावा मोही । सोड़ व्यापी बिहंगपति तोही ॥
जो ज्ञानियोंके चित्तको भी भलीभाँति हरण कर लेती है और उनके मनमें जबर्दस्ती बड़ा भारी मोह उत्पन्न कर देती है, तथा जिसने मुझको भी बहुत बार नचाया है, हे पक्षिराज! वही माया आपको भी व्याप गयी है ॥ ३ ॥
महामोह उपजा उर तोरें । मिटिहि न बेगि कहें खग मोरें ॥ चतुरानन पहिं जाहु खगेसा । सोड़ करेहु जेहि होड़ निदेसा ॥
हे गरुड़! आपके हृदयमें बड़ा भारी मोह उत्पन्न हो गया है। यह मेरे समझानेसे तुरंत नहीं मिटेगा। अतः हे पक्षिराज! आप ब्रह्माजीके पास जाइये और वहाँ जिस कामके लिये आदेश मिले, वही कीजियेगा ॥ ४ ॥
दो०—अस कहि चले देवरिषि करत राम गुन गान ।
हरि माया बल बरनत पुनि पुनि परम सुजान ॥ ५९ ॥
ऐसा कहकर परम सुजान देवर्षि नारदजी श्रीरामजीका गुणगान करते हुए और बारंबार श्रीहरिकी मायाका बल वर्णन करते हुए चले ॥ ५९ ॥
तब खगपति बिरंछि पहिं गयऊ । निज संदेह सुनावत भयऊ ॥ सुनि बिरंछि रामहि सिरु नावा । समुझि प्रताप प्रेम अति छावा ॥
तब पक्षिराज गरुड़ ब्रह्माजीके पास गये और अपना सन्देह उन्हें कह सुनाया। उसे सुनकर ब्रह्माजीने श्रीरामचन्द्रजीको सिर नवाया और उनके प्रतापको समझकर उनके अत्यन्त प्रेम छा गया ॥ १ ॥
मन महुँ करड़ बिचार बिधाता । माया बस कबि कोबिद ग्याता ॥ हरि माया कर अमिति प्रभावा । बिपुल बार जेहिं मोहि नचावा ॥