श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 967, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- उत्तरकाण्ड *
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ब्रह्माजी मनमें विचार करने लगे कि कवि, कोविद और ज्ञानी सभी मायाके वश हैं। भगवान्की मायाका प्रभाव असीम है, जिसने मुझतकको अनेकों बार नचाया है ॥ २ ॥
अग जगमय जग मम उपराजा । नहिं आचरज मोह खगराजा ॥ तब बोले बिधि गिरा सुहाई । जान महेस राम प्रभुताई ॥
यह सारा चराचर जगत् तो मेरा रचा हुआ है। जब मैं ही मायावश नाचने लगता हूँ, तब पक्षिराज गरुड़को मोह होना कोई आश्चर्य [की बात] नहीं है। तदनन्तर ब्रह्माजी सुन्दर वाणी बोले— श्रीरामजीकी महिमाको महादेवजी जानते हैं ॥ ३ ॥
बैनतेय संकर पहिं जाहू । तात अनत पूछहु जनि काहू ॥ तहँ होइहि तव संसय हानी । चलेउ बिहंग सुनत बिधि बानी ॥
हे गरुड़! तुम शंकरजीके पास जाओ। हे तात! और कहीं किसीसे न पूछना। तुम्हारे सन्देहका नाश वहीं होगा। ब्रह्माजीका वचन सुनते ही गरुड़ चल दिये ॥ ४ ॥
दो०—परमातुर बिहंगपति आयउ तब मो पास । जात रहेउँ कुबेर गृह रहिहु उमा कैलास ॥ ६० ॥
तब बड़ी आतुरता (उतावली) से पक्षिराज गरुड़ मेरे पास आये। हे उमा! उस समय मैं कुबेरके घर जा रहा था और तुम कैलासपर थीं ॥ ६० ॥
तेहिं मम पद सादर सिरु नावा । पुनि आपन संदेह सुनावा ॥ सुनि ता करि बिनती मृदु बानी । प्रेम सहित मैं कहेउँ भवानी ॥
गरुड़ने आदरपूर्वक मेरे चरणोंमें सिर नवाया और फिर मुझको अपना सन्देह सुनाया। हे भवानी! उनकी विनती और कोमल वाणी सुनकर मैंने प्रेमसहित उनसे कहा— ॥ १ ॥
मिलेहु गरुड़ मारग महँ मोही । कवन भाँति समुझावौं तोही ॥ तबहिं होइ सब संसय भंगा । जब बहु काल करिअ सतसंगा ॥
हे गरुड़! तुम मुझे रास्तेमें मिले हो। राह चलते मैं तुम्हें किस प्रकार समझाऊँ? सब सन्देहोंका तो तभी नाश हो जब दीर्घ कालतक सत्संग किया जाय ॥ २ ॥
सुनिअ तहाँ हरिकथा सुहाई । नाना भाँति मुनिन्ह जो गाई ॥ जेहि महुँ आदि मध्य अवसाना । प्रभु प्रतिपाद्य राम भगवाना ॥
और वहाँ (सत्संगमें) सुन्दर हरिकथा सुनी जाय, जिसे मुनियोंने अनेकों प्रकारसे गाया है और जिसके आदि, मध्य और अन्तमें भगवान् श्रीरामचन्द्रजी ही प्रतिपाद्य प्रभु हैं ॥ ३ ॥
नित हरि कथा होत जहँ भाई । पठवउँ तहाँ सुनुहु तुम्ह जाई ॥ जाइहि सुनत सकल संदेहा । राम चरन होइहि अति नेहा ॥