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भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 968, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 968

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  • रामचरितमानस *

हे भाई! जहाँ प्रतिदिन हरिकथा होती है, तुमको मैं वहीं भेजता हूँ, तुम जाकर उसे सुनो। उसे सुनते ही तुम्हारा सब सन्देह दूर हो जायगा और तुम्हें श्रीरामजीके चरणोंमें अत्यन्त प्रेम होगा ॥ ४ ॥

दो०—बिनु सतसंग न हरि कथा तेहि बिनु मोह न भाग।

मोह गएँ बिनु राम पद होइ न दूढ़ अनुराग ॥ ६१ ॥

सत्संगके बिना हरिकी कथा सुननेको नहीं मिलती, उसके बिना मोह नहीं भागता और मोहके गये बिना श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें दूढ़ (अचल) प्रेम नहीं होता ॥ ६१ ॥

मिलहिं न रघुपति बिनु अनुरागा । किऐं जोग तप ग्यान बिरागा ॥

उत्तर दिसि सुंदर गिरि नीला । तहँ रह काकभुसुंडि सुसीला ॥

बिना प्रेमके केवल योग, तप, ज्ञान और वैराग्यादिके करनेसे श्रीरघुनाथजी नहीं मिलते। [अतएव तुम सत्संगके लिये वहाँ जाओ जहाँ] उत्तर दिशामें एक सुन्दर नील पर्वत है। वहाँ परम सुशील काकभुशुण्डिजी रहते हैं ॥ १ ॥

राम भगति पथ परम प्रबीना । ग्यानी गुन गूह बहु कालीना ॥

राम कथा सो कहइ निरंतर । सादर सुनहिं बिबिध बिहंगबर ॥

वे रामभक्तिके मार्गमें परम प्रवीण हैं, ज्ञानी हैं, गुणोंके धाम हैं और बहुत कालके हैं। वे निरन्तर श्रीरामचन्द्रजीकी कथा कहते रहते हैं, जिसे भाँति-भाँतिके श्रेष्ठ पक्षी आदरसहित सुनते हैं ॥ २ ॥

जाइ सुनुहु तहँ हरि गुन भूरी । होइहि मोह जनित दुख दूरी ॥

मैं जब तेहि सब कहा बुझाई । चलेउ हरषि मम पद सिरु नाई ॥

वहाँ जाकर श्रीहरिके गुणसमूहोंको सुनो। उनके सुननेसे मोहसे उत्पन्न तुम्हारा दुःख दूर हो जायगा। मैंने उसे जब सब समझाकर कहा, तब वह मेरे चरणोंमें सिर नवाकर हर्षित होकर चला गया ॥ ३ ॥

ताते उमा न मैं समुझावा । रघुपति कृपाँ मरमु मैं पावा ॥

होइहि कीन्ह कबहुँ अभिमाना । सो खोवै चह कृपानिधाना ॥

हे उमा! मैंने उसको इसीलिये नहीं समझाया कि मैं श्रीरघुनाथजीकी कृपासे उसका मर्म (भेद) पा गया था। उसने कभी अभिमान किया होगा, जिसको कृपानिधान श्रीरामजी नष्ट करना चाहते हैं ॥ ४ ॥

कछु तेहि ते पुनि मैं नहिं राखा । समुझइ खग खगही कै भाषा ॥

प्रभु माया बलवंत भवानी । जाहि न मोह कवन अस ग्यानी ॥

फिर कुछ इस कारण भी मैंने उसको अपने पास नहीं रखा कि पक्षी पक्षीकी ही बोली समझते हैं। हे भवानी! प्रभुकी माया [बड़ी ही] बलवती है, ऐसा कौन ज्ञानी है, जिसे वह न मोह ले ? ॥ ५ ॥