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भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 969, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 969
  • उत्तरकाण्ड *

१६७

दो०—ग्यानी भगत सिरोमनि त्रिभुवनपति कर जान।

ताहि मोह माया नर पावैँ करहिं गुमान ॥ ६२ ( क ) ॥

जो ज्ञानियोंमें और भक्तोंमें शिरोमणि हैं एवं त्रिभुवनपति भगवान्के वाहन हैं, उन गरुड़को भी मायाने मोह लिया। फिर भी नीच मनुष्य मूर्खतावश घमंड किया करते हैं ॥ ६२ ( क ) ॥

मासपारायण, अट्टाईसवाँ विश्राम

सिव बिरंचि कहँ मोहइ को है बपुरा आन।

अस जियँ जानि भजहिं मुनि माया पति भगवान ॥ ६२ ( ख ) ॥

यह माया जब शिवजी और ब्रह्माजीको भी मोह लेती है, तब दूसरा बेचारा क्या चीज है? जियँ ऐसा जानकर ही मुनिलोग उस मायाके स्वामी भगवान्का भजन करते हैं ॥ ६२ ( ख ) ॥

गयउ गरुड़ जहँ बसइ भुसुंडा। मति अकुंठ हरि भगति अखंडा ॥

देखि सैल प्रसन्न मन भयऊ। माया मोह सोच सब गयऊ ॥

गरुड़जी वहाँ गये जहाँ निर्बाध बुद्धि और पूर्ण भक्तिवाले काकभुशुण्डिजी बसते थे। उस पर्वतको देखकर उनका मन प्रसन्न हो गया और [उसके दर्शनसे ही] सब माया, मोह तथा सोच जाता रहा ॥ १ ॥

करि तड़ाग मज्जन जलपाना। बट तर गयउ हृदयँ हरषाना ॥

बृद्ध बृद्ध बिहंग तहँ आए। सुनै राम के चरित सुहाए ॥

तालाबमें स्नान और जलपान करके वे प्रसन्नचित्तसे वटवृक्षके नीचे गये। वहाँ श्रीरामजीके सुन्दर चरित्र सुननेके लिये बूढ़े-बूढ़े पक्षी आये हुए थे ॥ २ ॥

कथा अरंभ करै सोड़ चाह। तेही समय गयउ खगनाहा ॥

आवत देखि सकल खगराजा। हरषेउ बायस सहित समाजा ॥

भुशुण्डिजी कथा आरम्भ करना ही चाहते थे कि उसी समय पक्षिराज गरुड़जी वहाँ जा पहुँचे। पक्षियोंके राजा गरुड़जीको आते देखकर काकभुशुण्डिजीसहित सारा पक्षिसमाज हर्षित हुआ ॥ ३ ॥

अति आदर खगपति कर कीन्हा। स्वागत पूछि सुआसन दीन्हा ॥

करि पूजा समेत अनुरागा। मधुर वचन तब बोलेउ कागा ॥

उन्होंने पक्षिराज गरुड़जीका बहुत ही आदर-सत्कार किया और स्वागत (कुशल) पूछकर बैठनेके लिये सुन्दर आसन दिया। फिर प्रेमसहित पूजा करके काकभुशुण्डिजी मधुर वचन बोले— ॥ ४ ॥

दो०—नाथ कृतारथ भयउँ मैं तव दरसन खगराज।

आयसु देहु सो करौँ अब प्रभु आयहु केहि काज ॥ ६३ ( क ) ॥