सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
संग्रह पर लौटें

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ
  • उत्तरकाण्ड *

१६७

दो०—ग्यानी भगत सिरोमनि त्रिभुवनपति कर जान।

ताहि मोह माया नर पावैँ करहिं गुमान ॥ ६२ ( क ) ॥

जो ज्ञानियोंमें और भक्तोंमें शिरोमणि हैं एवं त्रिभुवनपति भगवान्के वाहन हैं, उन गरुड़को भी मायाने मोह लिया। फिर भी नीच मनुष्य मूर्खतावश घमंड किया करते हैं ॥ ६२ ( क ) ॥

मासपारायण, अट्टाईसवाँ विश्राम

सिव बिरंचि कहँ मोहइ को है बपुरा आन।

अस जियँ जानि भजहिं मुनि माया पति भगवान ॥ ६२ ( ख ) ॥

यह माया जब शिवजी और ब्रह्माजीको भी मोह लेती है, तब दूसरा बेचारा क्या चीज है? जियँ ऐसा जानकर ही मुनिलोग उस मायाके स्वामी भगवान्का भजन करते हैं ॥ ६२ ( ख ) ॥

गयउ गरुड़ जहँ बसइ भुसुंडा। मति अकुंठ हरि भगति अखंडा ॥

देखि सैल प्रसन्न मन भयऊ। माया मोह सोच सब गयऊ ॥

गरुड़जी वहाँ गये जहाँ निर्बाध बुद्धि और पूर्ण भक्तिवाले काकभुशुण्डिजी बसते थे। उस पर्वतको देखकर उनका मन प्रसन्न हो गया और [उसके दर्शनसे ही] सब माया, मोह तथा सोच जाता रहा ॥ १ ॥

करि तड़ाग मज्जन जलपाना। बट तर गयउ हृदयँ हरषाना ॥

बृद्ध बृद्ध बिहंग तहँ आए। सुनै राम के चरित सुहाए ॥

तालाबमें स्नान और जलपान करके वे प्रसन्नचित्तसे वटवृक्षके नीचे गये। वहाँ श्रीरामजीके सुन्दर चरित्र सुननेके लिये बूढ़े-बूढ़े पक्षी आये हुए थे ॥ २ ॥

कथा अरंभ करै सोड़ चाह। तेही समय गयउ खगनाहा ॥

आवत देखि सकल खगराजा। हरषेउ बायस सहित समाजा ॥

भुशुण्डिजी कथा आरम्भ करना ही चाहते थे कि उसी समय पक्षिराज गरुड़जी वहाँ जा पहुँचे। पक्षियोंके राजा गरुड़जीको आते देखकर काकभुशुण्डिजीसहित सारा पक्षिसमाज हर्षित हुआ ॥ ३ ॥

अति आदर खगपति कर कीन्हा। स्वागत पूछि सुआसन दीन्हा ॥

करि पूजा समेत अनुरागा। मधुर वचन तब बोलेउ कागा ॥

उन्होंने पक्षिराज गरुड़जीका बहुत ही आदर-सत्कार किया और स्वागत (कुशल) पूछकर बैठनेके लिये सुन्दर आसन दिया। फिर प्रेमसहित पूजा करके काकभुशुण्डिजी मधुर वचन बोले— ॥ ४ ॥

दो०—नाथ कृतारथ भयउँ मैं तव दरसन खगराज।

आयसु देहु सो करौँ अब प्रभु आयहु केहि काज ॥ ६३ ( क ) ॥

१६८

  • रामचरितमानस *

हे नाथ! हे पश्चिराज! आपके दर्शनसे मैं कृतार्थ हो गया। आप जो आज्ञा दें मैं अब वही करूँ। हे प्रभो! आप किस कार्यके लिये आये हैं? ॥ ६३ (क) ॥

सदा कृतारथ रूप तुम्ह कह मृदु बचन खगेस।

जेहि कै अस्तुति सादर निज मुख कीन्हि महेस ॥ ६३ (ख) ॥

पश्चिराज गरुड़जीने कोमल वचन कहे—आप तो सदा ही कृतार्थरूप हैं, जिनकी बड़ाई स्वयं महादेवजीने आदरपूर्वक अपने श्रीमुखसे की है ॥ ६३ (ख) ॥

सुनहु तात जेहि कारन आयउँ। सो सब भयउ दरस तव पायउँ॥

देखि परम पावन तव आश्रम। गयउ मोह संसय नाना भ्रम॥

हे तात! सुनिये, मैं जिस कारणसे आया था, वह सब कार्य तो यहाँ आते ही पूरा हो गया। फिर आपके दर्शन भी प्राप्त हो गये। आपका परम पवित्र आश्रम देखकर ही मेरा मोह, सन्देह और अनेक प्रकारके भ्रम सब जाते रहे ॥ १ ॥

अब श्रीराम कथा अति पावनि। सदा सुखद दुख पुंज नसावनि॥

सादर तात सुनावहु मोही। बार बार बिनवउँ प्रभु तोही॥

अब हे तात! आप मुझे श्रीरामजीकी अत्यन्त पवित्र करनेवाली, सदा सुख देनेवाली और दुःखसमूहका नाश करनेवाली कथा आदरसहित सुनाइये। हे प्रभो! मैं बार-बार आपसे यही विनती करता हूँ ॥ २ ॥

सुनत गरुड़ कै गिरा बिनीता। सरल सुप्रेम सुखद सुपुनीता॥

भयउ तासु मन परम उछाहा। लाग कहै रघुपति गुन गाहा॥

गरुड़जीकी विनम्र, सरल, सुन्दर प्रेमयुक्त, सुखप्रद और अत्यन्त पवित्र वाणी सुनते ही भुशुण्डिजीके मनमें परम उत्साह हुआ और वे श्रीरघुनाथजीके गुणोंकी कथा कहने लगे ॥ ३ ॥

प्रथमहिं अति अनुराग भवानी। रामचरित सर कहेसि बखानी॥

पुनि नारद कर मोह अपारा। कहेसि बहुरि रावन अवतारा॥

हे भवानी! पहले तो उन्होंने बड़े ही प्रेमसे रामचरितमानस सरोवरका रूपक समझाकर कहा। फिर नारदजीका अपार मोह और फिर रावणका अवतार कहा ॥ ४ ॥

प्रभु अवतार कथा पुनि गाई। तब सिसु चरित कहेसि मन लाई॥

फिर प्रभुके अवतारकी कथा वर्णन की। तदनन्तर मन लगाकर श्रीरामजीकी बाललीलालाई कही ॥ ५ ॥

दो०—बालचरित कहि बिबिधि बिधि मन महँ परम उछाह।

रिषि आगवन कहेसि पुनि श्रीरघुबीर बिबाह ॥ ६४ ॥

  • उत्तरकाण्ड *

१६१

मनमें परम उत्साह भरकर अनेकों प्रकारकी बाललीलाएँ कहकर, फिर ऋषि विश्वामित्रजीका अयोध्या आना और श्रीरघुवीरजीका विवाह वर्णन किया ॥ ६४ ॥

बहुरि राम अभिषेक प्रसंगा । पुनि नृप बचन राज रस भंगा ॥ पुरबासिन्ह कर बिरह बिषादा । कहैसि राम लछिमन संबादा ॥

फिर श्रीरामजीके राज्याभिषेकका प्रसङ्ग, फिर राजा दशरथजीके वचनसे राजरस (राज्याभिषेकके आनन्द)में भङ्ग पड़ना, फिर नगरनिवासियोंका विरह, विषाद और श्रीराम-लक्ष्मणका संवाद (बातचीत) कहा ॥ १ ॥

बिपिन गवन केवट अनुरागा । सुरसरि उत्तरि निवास प्रयागा ॥ बालमीक प्रभु मिलन बखाना । चित्रकूट जिमि बसे भगवाना ॥

श्रीरामका वनगमन, केवटका प्रेम, गङ्गाजीसे पार उत्तरकर प्रयागमें निवास, बाल्मीकिजी और प्रभु श्रीरामजीका मिलन और जैसे भगवान् चित्रकूटमें बसे, वह सब कहा ॥ २ ॥

सचिवागवन नगर नृप मरना । भरतागवन प्रेम बहु बरना ॥ करि नृप क्रिया संग पुरबासी । भरत गए जहाँ प्रभु सुख रासी ॥

फिर मन्त्री सुमन्त्रजीका नगरमें लौटना, राजा दशरथजीका मरण, भरतजीका [ननिहालसे] अयोध्यामें आना और उनके प्रेमका बहुत वर्णन किया। राजाकी अन्त्येष्टि क्रिया करके नगरनिवासियोंको साथ लेकर भरतजी वहाँ गये जहाँ सुखकी राशि प्रभु श्रीरामचन्द्रजी थे ॥ ३ ॥

पुनि रघुपति बहु बिधि समुझाए । लै पादुका अवधपुर आए ॥ भरत रहनि सुरपति सुत करनी । प्रभु अरु अत्रि भेंट पुनि बरनी ॥

फिर श्रीरघुनाथजीने उनको बहुत प्रकारसे समझाया, जिससे वे खड़ाऊँ लेकर अयोध्यापुरी लौट आये, यह सब कथा कही। भरतजीकी नन्दिग्राममें रहनेकी रीति, इन्द्रपुत्र जयन्तकी नीच करनी और फिर प्रभु श्रीरामचन्द्रजी और अत्रिजीका मिलाप वर्णन किया ॥ ४ ॥

दो०— कहि बिराध बध जेहि बिधि देह तजी सरभंग ।

बरनि सुतीछन प्रीति पुनि प्रभु अगस्ति सतसंग ॥ ६५ ॥

जिस प्रकार विराधका बध हुआ और शरभंगजीने शरीर त्याग किया, वह प्रसंग कहकर, फिर सुतीक्ष्णजीका प्रेम वर्णन करके प्रभु और अगस्त्यजीका सत्संग-वृत्तान्त कहा ॥ ६५ ॥

कहि दंडक बन पावनताई । गीध मङ्ग्री पुनि तेहिं गाई ॥ पुनि प्रभु पंचबटीं कृत बासा । भंजी सकल मुनिन्ह की त्रासा ॥

दण्डकवनका पवित्र करना कहकर फिर भुशुण्डिजीने गृध्रराजके साथ मित्रताका वर्णन किया। फिर जिस प्रकार प्रभुने पञ्चवटीमें निवास किया और सब मुनियोंके भयका नाश किया, ॥ १ ॥

१७०

  • रामचरितमानस *

पुनि लछिमन उपदेस अनूपा । सूपनखा जिमि कीन्हि कुरूपा ॥ खर दूषन बध बहुरि बखाना । जिमि सब मरमु दसानन जाना ॥

और फिर जैसे लक्ष्मणजीको अनुपम उपदेश दिया और शूर्पणखाको कुरूप किया, वह सब वर्णन किया। फिर खर-दूषण-बध और जिस प्रकार रावणने सब समाचार जाना, वह बखानकर कहा, ॥ २ ॥

दसकंधर मारीच बतकही । जेहि बिधि भई सो सब तेहिं कही ॥ पुनि माया सीता कर हरना । श्रीरघुबीर बिरह कछु बरना ॥

तथा जिस प्रकार रावण और मारीचकी बातचीत हुई, वह सब उन्होंने कही। फिर मायासीताका हरण और श्रीरघुवीरके विरहका कुछ वर्णन किया ॥ ३ ॥

पुनि प्रभु गीध क्रिया जिमि कीन्ही । बधि कबंध सबरिहि गति दीन्ही ॥ बहुरि बिरह बरनत रघुबीरा । जेहि बिधि गए सरोबर तीरा ॥

फिर प्रभुने गिद्ध जटायुकी जिस प्रकार क्रिया की, कबन्धका बध करके शबरीको परमगति दी और फिर जिस प्रकार विरह-वर्णन करते हुए श्रीरघुवीरजी पंपासरके तीरपर गये, वह सब कहा ॥ ४ ॥

दो०—प्रभु नारद संवाद कहि मारुति मिलन प्रसंग ।

पुनि सुग्रीव मितार्ई बालि प्रान कर भंग ॥ ६६ ( क ) ॥

प्रभु और नारदजीका संवाद और मारुतिके मिलनेका प्रसंग कहकर फिर सुग्रीवसे मित्रता और बालिके प्राणनाशका वर्णन किया ॥ ६६ ( क ) ॥

कपिहि तिलक करि प्रभु कृत सैल प्रबरषन बास ।

बरनन वर्षा सरद अरु राम रोष कपि त्रास ॥ ६६ ( ख ) ॥

सुग्रीवका राजतिलक करके प्रभुने प्रवर्षण पर्वतपर निवास किया, वह तथा वर्षा और शरद्का वर्णन, श्रीरामजीका सुग्रीवपर रोष और सुग्रीवका भय आदि प्रसंग कहे ॥ ६६ ( ख ) ॥

जेहि बिधि कपिपति कीस पठाए । सीता खोज सकल दिसि धाए ॥ बिबर प्रबेस कीन्ह जेहि भाँती । कपिन्ह बहोरि मिला संपाती ॥

जिस प्रकार वानरराज सुग्रीवने वानरोंको भेजा और वे सीताजीकी खोजमें जिस प्रकार सब दिशाओंमें गये, जिस प्रकार उन्होंने बिलमें प्रवेश किया और फिर जैसे वानरोंको सम्पाती मिला, वह कथा कही ॥ १ ॥

सुनि सब कथा समीरकुमारा । नाघत भयउ पयोधि अपारा ॥ लंकाँ कपि प्रबेस जिमि कीन्हा । पुनि सीतहि धीरजु जिमि दीन्हा ॥

  • उत्तरकाण्ड *

१७१

संपातीसे सब कथा सुनकर पवनपुत्र हनुमान्जी जिस तरह अपार समुद्रको लाँघ गये, फिर हनुमान्जीने जैसे लङ्कामें प्रवेश किया और फिर जैसे सीताजीको धीरज दिया, सो सब कहा ॥ २ ॥

बन उजारि रावनहि प्रबोधी । पुर दहि नाघेउ बहुरि पयोधी ॥ आए कपि सब जहँ रघुराई । बैदेही की कुसल सुनाई ॥

अशोकवनको उजाड़कर, रावणको समझाकर, लङ्कापुरीको जलाकर फिर जैसे उन्होंने समुद्रको लाँघा और जिस प्रकार सब वानर वहाँ आये जहाँ श्रीरघुनाथजी थे और आकर श्रीजानकीजीकी कुशल सुनायी, ॥ ३ ॥

सेन समेति जथा रघुबीरा । उतरे जाइ बारिनिधि तीरा ॥ मिला बिभीषन जेहि बिधि आई । सागर निग्रह कथा सुनाई ॥

फिर जिस प्रकार सेनासहित श्रीरघुवीर जाकर समुद्रके तटपर उतरे और जिस प्रकार विभीषणजी आकर उनसे मिले, वह सब और समुद्रके बाँधनेकी कथा उसने सुनायी ॥ ४ ॥

दो०— सेतु बाँधि कपि सेन जिमि उतरी सागर पार ।

गयउ बसीठी बीरबर जेहि बिधि बालिकुमार ॥ ६७ ( क ) ॥

पुल बाँधकर जिस प्रकार वानरोंकी सेना समुद्रके पार उतरी और जिस प्रकार वीरश्रेष्ठ बालिपुत्र अंगद दूत बनकर गये, वह सब कहा ॥ ६७ ( क ) ॥

निसिचर कीस लराई बरनिसि बिबिध प्रकार ।

कुंभकरन घननाद कर बल पौरुष संधार ॥ ६७ ( ख ) ॥

फिर राक्षसों और वानरोंके युद्धका अनेकों प्रकारसे वर्णन किया। फिर कुम्भकर्ण और मेघनादके बल, पुरुषार्थ और संहारकी कथा कही ॥ ६७ ( ख ) ॥

निसिचर निकर मरन बिधि नाना । रघुपति रावन समर बखाना ॥

रावन बध मंदोदरि सोका । राज बिभीषन देव असोका ॥

नाना प्रकारके राक्षससमूहोंके मरण तथा श्रीरघुनाथजी और रावणके अनेक प्रकारके युद्धका वर्णन किया। रावणवध, मन्दोदरीका शोक, विभीषणका राज्याभिषेक और देवताओंका शोकरहित होना कहकर, ॥ १ ॥

सीता रघुपति मिलन बहोरी । सुरन्ह कीन्हि अस्तुति कर जोरी ॥

पुनि पुष्पक चढ़ि कपिन्ह समेता । अवध चले प्रभु कृपा निकेता ॥

फिर सीताजी और श्रीरघुनाथजीका मिलाप कहा। जिस प्रकार देवताओंने हाथ जोड़कर स्तुति की और फिर जैसे वानरोंसमेत पुष्पकविमानपर चढ़कर कृपाधाम प्रभु अवधपुरीको चले, वह कहा ॥ २ ॥

जेहि बिधि राम नगर निज आए । बायस बिसद चरित सब गाए ॥

कहेसि बहोरि राम अभिषेका । पुर बरनत नृपनीति अनेका ॥

१७२

  • रामचरितमानस *

जिस प्रकार श्रीरामचन्द्रजी अपने नगर (अयोध्या) में आये, वे सब उज्ज्वल चरित्र काकभुशुण्डिजीने विस्तारपूर्वक वर्णन किये। फिर उन्होंने श्रीरामजीका राज्याभिषेक कहा। [शिवजी कहते हैं—] अयोध्यापुरीका और अनेक प्रकारकी राजनीतिका वर्णन करते हुए— ॥ ३ ॥

कथा समस्त भुसुंड बखानी । जो मैं तुम्ह सन कही भवानी ॥ सुनि सब राम कथा खगनाहा । कहत बचन मन परम उछाहा ॥

भुशुण्डिजीने वह सब कथा कही जो हे भवानी! मैंने तुमसे कही। सारी रामकथा सुनकर पक्षिराज गरुड़जी मनमें बहुत उत्साहित (आनन्दित) होकर वचन कहने लगे— ॥ ४ ॥

सो०—गयउ मोर संदेह सुनेउँ सकल रघुपति चरित ।

भयउ राम पद नेह तव प्रसाद बायस तिलक ॥ ६८ ( क ) ॥

श्रीरघुनाथजीके सब चरित्र मैंने सुने, जिससे मेरा सन्देह जाता रहा। हे काकशिरोमणि! आपके अनुग्रहसे श्रीरामजीके चरणोंमें मेरा प्रेम हो गया ॥ ६८ ( क ) ॥

मोहि भयउ अति मोह प्रभु बंधन रन महुँ निरखि ।

चिदानंद संदोह राम बिकल कारन कवन ॥ ६८ ( ख ) ॥

युद्धमें प्रभुका नागपाशसे बन्धन देखकर मुझे अत्यन्त मोह हो गया था कि श्रीरामजी तो सच्चिदानन्दधन हैं, वे किस कारण व्याकुल हैं ॥ ६८ ( ख ) ॥

देखि चरित अति नर अनुसारी । भयउ हृदयँ मम संसय भारी ॥

सोइ भ्रम अब हित करि मैं माना । कीन्ह अनुग्रह कृपानिधाना ॥

बिलकुल ही लौकिक मनुष्योंका-सा चरित्र देखकर मेरे हृदयमें भारी सन्देह हो गया। मैं अब उस भ्रम (सन्देह) को अपने लिये हित करके समझता हूँ। कृपानिधानने मुझपर यह बड़ा अनुग्रह किया ॥ १ ॥

जो अति आतप व्याकुल होई । तरु छाया सुख जानइ सोई ॥

जौँ नहीं होत मोह अति मोही । मिलतेउँ तात कवन बिधि तोही ॥

जो धूपसे अत्यन्त व्याकुल होता है, वही वृक्षकी छायाका सुख जानता है। हे तात! यदि मुझे अत्यन्त मोह न होता तो मैं आपसे किस प्रकार मिलता? ॥ २ ॥

सुनतेउँ किमि हरि कथा सुहाई । अति बिचित्र बहु बिधि तुम्ह गाई ॥

निगमागम पुरान मत एहा । कहहिँ सिद्ध मुनि नहीं संदेहा ॥

और कैसे अत्यन्त विचित्र यह सुन्दर हरिकथा सुनता; जो आपने बहुत प्रकारसे गायी है? वेद, शास्त्र और पुराणोंका यही मत है; सिद्ध और मुनि भी यही कहते हैं, इसमें सन्देह नहीं कि— ॥ ३ ॥

  • उत्तरकाण्ड *

१७३

संत बिसुद्ध मिलहिं परि तेही । चितवहिं राम कृपा करि जेही ॥ राम कृपाँ तव दरसन भयऊ । तव प्रसाद सब संसय गयऊ ॥

शुद्ध (सच्चे) संत उसीको मिलते हैं जिसे श्रीरामजी कृपा करके देखते हैं। श्रीरामजीकी कृपासे मुझे आपके दर्शन हुए और आपकी कृपासे मेरा सन्देह चला गया ॥ ४ ॥

दो०— सुनि बिहंगपति बानी सहित बिनय अनुराग ।

पुलक गात लोचन सजल मन हरषेउ अति काग ॥ ६९ ( क ) ॥

पक्षिराज गरुड़जीकी विनय और प्रेमयुक्त वाणी सुनकर काकभुशुण्डिजीका शरीर पुलकित हो गया, उनके नेत्रोंमें जल भर आया और वे मनमें अत्यन्त हर्षित हुए ॥ ६९ (क) ॥

श्रोता सुमति सुसील सुचि कथा रसिक हरिदास ।

पाड़ उमा अति गोप्यमपि सज्जन करहिं प्रकास ॥ ६९ ( ख ) ॥

हे उमा! सुन्दर बुद्धिवाले, सुशील, पवित्र कथाके प्रेमी और हरिके सेवक श्रोताको पाकर सज्जन अत्यन्त गोपनीय (सबके सामने प्रकट न करनेयोग्य) रहस्यको भी प्रकट कर देते हैं ॥ ६९ (ख) ॥

बोलेउ काकभसुंड बहोरी । नभग नाथ पर प्रीति न थोरी ॥

सब बिधि नाथ पूज्य तुम्ह मेरे । कृपापात्र रघुनायक केरे ॥

काकभुशुण्डिजीने फिर कहा—पक्षिराजपर उनका प्रेम कम न था (अर्थात् बहुत था)—हे नाथ! आप सब प्रकारसे मेरे पूज्य हैं और श्रीरघुनाथजीके कृपापात्र हैं ॥ १ ॥

तुम्हहि न संसय मोह न माया । मो पर नाथ कीन्हि तुम्ह दया ॥

पठइ मोह मिस खगपति तोही । रघुपति दीन्हि बड़ाई मोही ॥

आपको न सन्देह है और न मोह अथवा माया ही है। हे नाथ! आपने तो मुझपर दया की है। हे पक्षिराज! मोहके बहाने श्रीरघुनाथजीने आपको यहाँ भेजकर मुझे बड़ाई दी है ॥ २ ॥

तुम्ह निज मोह कही खगसाई । सो नहिं कछु आचरज गोसाई ॥

नारद भव बिरंचि सनकादी । जे मुनिनायक आतमबादी ॥

हे पक्षियोंके स्वामी! आपने अपना मोह कहा, सो हे गोसाई! यह कुछ आश्चर्य नहीं है। नारदजी, शिवजी, ब्रह्माजी और सनकादि जो आत्मतत्त्वके मर्मज्ञ और उसका उपदेश करनेवाले श्रेष्ठ मुनि हैं ॥ ३ ॥

मोह न अंध कीन्ह केहि केही । को जग काम नचाव न जेही ॥

तूस्त्राँ केहि न कीन्ह बौराहा । केहि कर हृदय क्रोध नहिं दाहा ॥

उनमेंसे भी किस-किसको मोहने अंधा (विवेकशून्य) नहीं किया? जगत्में ऐसा कौन है जिसे कामने न नचाया हो? तूष्णाने किसको मतवाला नहीं बनाया? क्रोधने किसका हृदय नहीं जलाया? ॥ ४ ॥

१७४

  • रामचरितमानस *

दो०— ग्यानी तापस सूर कबि कोबिद गुन आगार।

केहि कै लोभ बिडंबना कीन्हि न एहि संसार ॥ ७० ( क ) ॥

इस संसारमें ऐसा कौन ज्ञानी, तपस्वी, शूरवीर, कवि, विद्वान् और गुणोंका धाम है, जिसकी लोभने विडम्बना (मिट्टी पलीद) न की हो ॥ ७० ( क ) ॥

श्रीमद बक्र न कीन्ह केहि प्रभुता बधिर न काहि।

मृगलोचनि के नैन सर को अस लाग न जाहि ॥ ७० ( ख ) ॥

लक्ष्मीके मदने किसको टेढ़ा और प्रभुताने किसको बहरा नहीं कर दिया? ऐसा कौन है, जिसे मृगनयनी (युवती स्त्री) के नेत्र-बाण न लगे हों? ॥ ७० ( ख ) ॥

गुन कृत सन्यपात नहीं केही। कोउ न मान मद तजेउ निबेही ॥ जोबन ज्वर केहि नहीं बलकावा। ममता केहि कर जस न नसावा ॥

[रज, तम आदि] गुणोंका किया हुआ सन्निपात किसे नहीं हुआ? ऐसा कोई नहीं है जिसे मान और मदने अछूता छोड़ा हो। यौवनके ज्वरने किसे आपेसे बाहर नहीं किया? ममताने किसके यशका नाश नहीं किया? ॥ १ ॥

मच्छर काहि कलंक न लावा। काहि न सोक समीर डोलावा ॥ चिंता साँपिनि को नहीं खाया। को जग जाहि न व्यापी माया ॥

मत्सर (डाह) ने किसको कलङ्क नहीं लगाया? शोकरूपी पवनने किसे नहीं हिला दिया? चिन्तारूपी साँपिनने किसे नहीं खा लिया? जगत्में ऐसा कौन है, जिसे माया न व्यापी हो? ॥ २ ॥

कीट मनोरथ दारु सरीरा। जेहि न लाग घुन को अस धीरा ॥ सुत बित लोक ईषना तीनी। केहि कै मति इन्ह कृत न मलीनी ॥

मनोरथ कीड़ा है, शरीर लकड़ी है। ऐसा धैर्यवान् कौन है, जिसके शरीरमें यह कीड़ा न लगा हो? पुत्रकी, धनकी और लोकप्रतिष्ठाकी इन तीन प्रबल इच्छाओंने किसकी बुद्धिको मलिन नहीं कर दिया (बिगाड़ नहीं दिया)? ॥ ३ ॥

यह सब माया कर परिवारा। प्रबल अमिति को बरनै पारा ॥ सिव चतुरानन जाहि डेराहीं। अपर जीव केहि लेखे माहीं ॥

यह सब मायाका बड़ा बलवान् परिवार है। यह अपार है, इसका वर्णन कौन कर सकता है? शिवजी और ब्रह्माजी भी जिससे डरते हैं, तब दूसरे जीव तो किस गिनतीमें हैं? ॥ ४ ॥

दो०— व्यापि रहेउ संसार महुँ माया कटक प्रचंड।

सेनापति कामादि भट दंभ कपट पाषंड ॥ ७१ ( क ) ॥

  • उत्तरकाण्ड *

१७५

मायाकी प्रचण्ड सेना संसारभरमें छायी हुई है। कामादि (काम, क्रोध और लोभ) उसके सेनापति हैं और दम्भ, कपट और पाखण्ड योद्धा हैं ॥ ७१ (क) ॥

सो दासी रघुबीर कै समुझें मिथ्या सोपि।

छूट न राम कृपा बिनु नाथ कहउँ पद रोपि ॥ ७१ (ख) ॥

वह माया श्रीरघुवीरकी दासी है। यद्यपि समझ लेनेपर वह मिथ्या ही है, किन्तु वह श्रीरामजीकी कृपाके बिना छूटती नहीं। हे नाथ! यह मैं प्रतिज्ञा करके कहता हूँ ॥ ७१ (ख) ॥

जो माया सब जगहि नचावा। जासु चरित लिखि काहुँ न पावा ॥

सोइ प्रभु भू बिलास खगराजा। नाच नटी इव सहित समाजा ॥

जो माया सारे जगत्को नचाती है और जिसका चरित्र (करनी) किसीने नहीं लख पाया, हे खगराज गरुड़जी! वही माया प्रभु श्रीरामचन्द्रजीकी भुक्टीके इशारेपर अपने समाज (परिवार) सहित नटीकी तरह नाचती है ॥ १ ॥

सोइ सच्चिदानंद घन रामा। अज बिग्यान रूप बल धामा ॥

व्यापक व्याप्य अखंड अनंता। अखिल अमोघसक्ति भगवंता ॥

श्रीरामजी वही सच्चिदानन्दधन हैं जो अजन्मा, विज्ञानस्वरूप, रूप और बलके धाम, सर्वव्यापक एवं व्याप्य (सर्वरूप), अखण्ड, अनन्त, सम्पूर्ण, अमोघशक्ति (जिसकी शक्ति कभी व्यर्थ नहीं होती) और छः ऐश्वर्योंसे युक्त भगवान् हैं ॥ २ ॥

अगुन अदभ्र गिरा गोतीता। सबदरसी अनवद्य अजीता ॥

निर्मम निराकार निरमोहा। नित्य निरंजन सुख संदोहा ॥

वे निर्गुण (मायाके गुणोंसे रहित), महान्, वाणी और इन्द्रियोंसे परे, सब कुछ देखनेवाले, निर्दोष, अजेय, ममतारहित, निराकार (मायिक आकारसे रहित), मोहरहित, नित्य, मायारहित, सुखकी राशि, ॥ ३ ॥

प्रकृति पार प्रभु सब उर बासी। ब्रह्म निरीह बिरज अविनासी ॥

इहाँ मोह कर कारन नाहीं। रबि सन्मुख तम कबहुँ कि जाहीं ॥

प्रकृतिसे परे, प्रभु (सर्वसमर्थ), सदा सबके हृदयमें बसनेवाले, इच्छारहित, विकाररहित, अविनाशी ब्रह्म हैं। यहाँ (श्रीराममें) मोहका कारण ही नहीं है। क्या अन्धकारका समूह कभी सूर्यके सामने जा सकता है? ॥ ४ ॥

दो०— भगत हेतु भगवान प्रभु राम धरेउ तनु भूप।

किए चरित पावन परम प्राकृत नर अनुरूप ॥ ७२ (क) ॥

१७६

  • रामचरितमानस *

भगवान् प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने भक्तोंके लिये राजाका शरीर धारण किया और साधारण मनुष्योंके-से अनेकों परम पावन चरित्र किये ॥ ७२ ( क ) ॥

जथा अनेक बेष धरि नृत्य करइ नट कोइ ।

सोइ सोइ भाव देखावइ आपुन होइ न सोइ ॥ ७२ ( ख ) ॥

जैसे कोई नट (खेल करनेवाला) अनेक वेष धारण करके नृत्य करता है, और वही-वही (जैसा वेष होता है, उसीके अनुकूल) भाव दिखलाता है, पर स्वयं वह उनमेंसे कोई हो नहीं जाता, ॥ ७२ ( ख ) ॥

असि रघुपति लीला उरगारी । दनुज बिमोहनि जन सुखकारी ॥

जे मति मलिन बिषयबस कामी । प्रभु पर मोह धरहिं इमि स्वामी ॥

हे गरुड़जी! ऐसी ही श्रीरघुनाथजीकी यह लीला है, जो राक्षसोंको विशेष मोहित करनेवाली और भक्तोंको सुख देनेवाली है। हे स्वामी! जो मनुष्य मलिनबुद्धि, विषयोंके वश और कामी हैं, वे ही प्रभुपर इस प्रकार मोहका आरोप करते हैं ॥ १ ॥

नयन दोष जा कहैं जब होई । पीत बरन ससि कहुँ कह सोई ॥

जब जेहि दिसि भ्रम होइ खगेसा । सो कह पच्छिम उयउ दिनेसा ॥

जब जिसको [कवैल आदि] नेत्रदोष होता है, तब वह चन्द्रमाको पीले रंगका कहता है। हे पक्षिराज! जब जिसे दिशाभ्रम होता है, तब वह कहता है कि सूर्य पश्चिममें उदय हुआ है ॥ २ ॥

नौकारूढ़ चलत जग देखा । अचल मोहबस आपुहि लेखा ॥

बालक भ्रमहिं न भ्रमहिं गृहादी । कहहिं परस्पर मिथ्याबादी ॥

नौकापर चढ़ा हुआ मनुष्य जगत्को चलता हुआ देखता है और मोहवश अपनेको अचल समझता है। बालक घूमते (चक्राकार दौड़ते) हैं, घर आदि नहीं घूमते। पर वे आपसमें एक-दूसरेको झूठा कहते हैं ॥ ३ ॥

हरि बिषइक अस मोह बिहंगा । सपनेहुँ नहिं अग्यान प्रसंगा ॥

मायाबस मतिमंद अभागी । हृदयँ जमनिका बहुबिधि लागी ॥

हे गरुड़जी! श्रीहरिके विषयमें मोहकी कल्पना भी ऐसी ही है, भगवान्में तो स्वप्नमें भी अज्ञानका प्रसंग (अवसर) नहीं है। किन्तु जो मायाके वश, मन्दबुद्धि और भाग्यहीन हैं और जिनके हृदयपर अनेकों प्रकारके परदे पड़े हैं, ॥ ४ ॥

ते सठ हठ बस संसय करहीं । निज अग्यान राम पर धरहीं ॥

वे मूर्ख हठके वश होकर सन्देह करते हैं और अपना अज्ञान श्रीरामजीपर आरोपित करते हैं ॥ ५ ॥

दो०—काम क्रोध मद लोभ रत गृहासक्त दुखरूप ।

ते किमि जानहिं रघुपतिहि मूढ़ परे तम कूप ॥ ७३ ( क ) ॥

  • उत्तरकाण्ड *

१७७

जो काम, क्रोध, मद और लोभमें रत हैं और दुःखरूप घरमें आसक्त हैं, वे श्रीरघुनाथजीको कैसे जान सकते हैं? वे मूर्ख तो अन्धकाररूपी कुएँमें पड़े हुए हैं ॥७३ (क) ॥

निर्गुण रूप सुलभ अति सगुण जान नहीं कोइ।

सुगम अगम नाना चरित सुनि मुनि मन भ्रम होइ ॥ ७३ (ख) ॥

निर्गुण रूप अत्यन्त सुलभ (सहज ही समझमें आ जानेवाला) है, परन्तु [गुणातीत दिव्य] सगुण रूपको कोई नहीं जानता। इसलिये उन सगुण भगवान्के अनेक प्रकारके सुगम और अगम चरित्रोंको सुनकर मुनियोंके भी मनको भ्रम हो जाता है ॥ ७३(ख) ॥

सुनु खगेस रघुपति प्रभुताई। कहउँ जथामति कथा सुहाई ॥ जेहि बिधि मोह भयउ प्रभु मोही। सोउ सब कथा सुनावउँ तोही ॥

हे पक्षिराज गरुड़जी! श्रीरघुनाथजीकी प्रभुता सुनिये। मैं अपनी बुद्धिके अनुसार वह सुहावनी कथा कहता हूँ। हे प्रभो! मुझे जिस प्रकार मोह हुआ, वह सब कथा भी आपको सुनाता हूँ ॥ १ ॥

राम कृपा भाजन तुम्ह ताता। हरि गुन प्रीति मोहि सुखदाता ॥ ताते नहीं कछु तुम्हहि दुरावउँ। परम रहस्य मनोहर गावउँ ॥

हे तात! आप श्रीरामजीके कृपापात्र हैं। श्रीहरिके गुणोंमें आपकी प्रीति है, इसीलिये आप मुझे सुख देनेवाले हैं। इसीसे मैं आपसे कुछ भी नहीं छिपाता और अत्यन्त रहस्यकी बातें आपको गाकर सुनाता हूँ ॥ २ ॥

सुनहु राम कर सहज सुभाऊ। जन अभिमान न राखहिं काऊ ॥ संसृत मूल सूलप्रद नाना। सकल सोक दायक अभिमाना ॥

श्रीरामचन्द्रजीका सहज स्वभाव सुनिये। वे भक्तमें अभिमान कभी नहीं रहने देते। क्योंकि अभिमान जन्म-मरणरूप संसारका मूल है और अनेक प्रकारके क्लेशों तथा समस्त शोकोंका देनेवाला है ॥ ३ ॥

ताते करहिं कृपानिधि दूरी। सेवक पर ममता अति भूरी ॥ जिमि सिसु तन ब्रन होइ गोसाई। मातु चिराव कठिन की नाई ॥

इसीलिये कृपानिधि उसे दूर कर देते हैं; क्योंकि सेवकपर उनकी बहुत ही अधिक ममता है। हे गोसाई! जैसे बच्चेके शरीरमें फोड़ा हो जाता है, तो माता उसे कठोर हृदयकी भाँति चिरा डालती है ॥ ४ ॥

दो०—जदपि प्रथम दुख पावइ रोवइ बाल अधीर।

ब्याधि नास हित जननी गनति न सो सिसु पीर ॥ ७४ (क) ॥

१७८

  • रामचरितमानस *

यद्यपि बच्चा पहले (फोड़ा चिराते समय) दुःख पाता है और अधीर होकर रोता है, तो भी रोगके नाशके लिये माता बच्चेकी उस पीड़ाको कुछ भी नहीं गिनती (उसकी परवा नहीं करती और फोड़ेको चिरवा ही डालती है) ॥ ७४ (क) ॥

तिमि रघुपति निज दास कर हरहिं मान हित लागि।

तुलसिदास ऐसे प्रभुहि कस न भजहु भ्रम त्यागि ॥ ७४ (ख) ॥

उसी प्रकार श्रीरघुनाथजी अपने दासका अभिमान उसके हितके लिये हर लेते हैं। तुलसीदासजी कहते हैं कि ऐसे प्रभुको भ्रम त्यागकर क्यों नहीं भजते ॥ ७४ (ख) ॥

राम कृपा आपनि जड़ताई। कहउँ खगेस सुनुहु मन लाई॥ जब जब राम मनुज तनु धरहीं। भक्त हेतु लीला बहु करहीं॥

हे पक्षिराज गरुड़जी! श्रीरामजीकी कृपा और अपनी जड़ता (मूर्खता) की बात कहता हूँ, मन लगाकर सुनिये। जब-जब श्रीरामचन्द्रजी मनुष्यशरीर धारण करते हैं और भक्तोंके लिये बहुत-सी लीलाएँ करते हैं ॥ १ ॥

तब तब अवधपुरी में जाऊँ। बालचरित बिलोकि हरषाऊँ॥ जन्म महोत्सव देखउँ जाई। बरष पाँच तहँ रहउँ लोभाई॥

तब-तब मैं अयोध्यापुरी जाता हूँ और उनकी बाललीला देखकर हर्षित होता हूँ। वहाँ जाकर मैं जन्ममहोत्सव देखता हूँ और [भगवान्की शिशुलीलामें] लुभाकर पाँच वर्षतक वहीं रहता हूँ ॥ २ ॥

इष्टदेव मम बालक रामा। सोभा बपुष कोटि सत कामा॥ निज प्रभु बदन निहारि निहारी। लोचन सुफल करउँ उरगारी॥

बालकरूप श्रीरामचन्द्रजी मेरे इष्टदेव हैं, जिनके शरीरमें अरबों कामदेवोंकी शोभा है। हे गरुड़जी! अपने प्रभुका मुख देख-देखकर मैं नेत्रोंको सफल करता हूँ ॥ ३ ॥

लघु बायस बपु धरि हरि संगा। देखउँ बालचरित बहु रंगा॥

छोटे-से कौएका शरीर धरकर और भगवान्के साथ-साथ फिरकर मैं उनके भाँति-भाँतिके बालचरित्रोंको देखा करता हूँ ॥ ४ ॥

दो०— लरिकाई जहँ जहँ फिरहिं तहँ तहँ संग उड़ाउँ।

जूठनि परड़ अजिर महँ सो उठाड़ करि खाउँ ॥ ७५ (क) ॥

लड़कपनमें वे जहाँ-जहाँ फिरते हैं, वहाँ-वहाँ मैं साथ-साथ उड़ता हूँ और आँगनमें उनकी जो जूठन पड़ती है, वही उठाकर खाता हूँ ॥ ७५ (क) ॥

  • उत्तरकाण्ड *

१७१

एक बार अतिसय सब चरित किए रघुबीर।

सुमिरत प्रभु लीला सोड़ पुलकित भयउ सरीर ॥ ७५ (ख) ॥

एक बार श्रीरघुवीरने सब चरित्र बहुत अधिकतासे किये। प्रभुकी उस लीलाका स्मरण करते ही काकभुशुण्डिजीका शरीर [प्रेमानन्दवश] पुलकित हो गया ॥ ७५ (ख) ॥

कहइ भसुंड सुनहु खगनायक। राम चरित सेवक सुखदायक ॥

नृप मंदिर सुंदर सब भाँती। खचित कनक मनि नाना जाती ॥

भुशुण्डिजी कहने लगे—हे पक्षिराज! सुनिये, श्रीरामजीका चरित्र सेवकोंको सुख देनेवाला है। [अयोध्याका] राजमहल सब प्रकारसे सुन्दर है। सोनेके महलमें नाना प्रकारके रत्न जड़े हुए हैं ॥ १ ॥

बरनि न जाड़ रुचिर अँगनाई। जहाँ खेलहिं नित चारिउ भाई ॥

बालविनोद करत रघुराई। बिचरत अजिर जननि सुखदाई ॥

सुन्दर अँगनका वर्णन नहीं किया जा सकता, जहाँ चारों भाई नित्य खेलते हैं। माताको सुख देनेवाले बालविनोद करते हुए श्रीरघुनाथजी अँगनमें विचर रहे हैं ॥ २ ॥

मरकत मृदुल कलेवर स्यामा। अंग अंग प्रति छबि बहु कामा ॥

नव राजीव अरुन मृदु चरना। पदज रुचिर नख ससि दुति हरना ॥

मरकत मणिके समान हरिताभ श्याम और कोमल शरीर है। अङ्ग-अङ्गमें बहुत-से कामदेवोंकी शोभा छायी हुई है। नवीन [लाल] कमलके समान लाल-लाल कोमल चरण हैं। सुन्दर अँगुलियाँ हैं और नख अपनी ज्योतिसे चन्द्रमाकी कान्तिको हरनेवाले हैं ॥ ३ ॥

ललित अंक कुलिसादिक चारी। नूपुर चारु मधुर रवकारी ॥

चारु पुरट मनि रचित बनाई। कटि किंकिनि कल मुखर सुहाई ॥

[तलवेमें] वज्रादि (वज्र, अंकुश, ध्वजा और कमल) के चार सुन्दर चिह्न हैं, चरणोंमें मधुर शब्द करनेवाले सुन्दर नूपुर हैं, मणियों, रत्नोंसे जड़ी हुई सोनेकी बनी हुई सुन्दर करधनीका शब्द सुहावना लग रहा है ॥ ४ ॥

दो०—रेखा त्रय सुंदर उदर नाभी रुचिर गँभीर।

उर आयत भ्राजत बिबिधि बाल बिभूषन चीर ॥ ७६ ॥

उदरपर सुन्दर तीन रेखाएँ (त्रिवली) हैं, नाभि सुन्दर और गहरी है। विशाल वक्षःस्थलपर अनेकों प्रकारके बच्चोंके आभूषण और वस्त्र सुशोभित हैं ॥ ७६ ॥

अरुन पानि नख करज मनोहर। बाहु बिसाल बिभूषन सुंदर ॥

कंध बाल केहरि दर ग्रीवा। चारु चिबुक आनन छबि सीवा ॥

१८०

  • रामचरितमानस *

लाल-लाल हथेलियाँ, नख और अँगुलियाँ मनको हरनेवाले हैं और विशाल भुजाओंपर सुन्दर आभूषण हैं। बालसिंह (सिंहके बच्चे) के-से कंधे और शंखके समान (तीन रेखाओंसे युक्त) गला है। सुन्दर टुट्टी है और मुख तो छबिकी सीमा ही है ॥ १ ॥

कलबल बचन अधर अरुनारे । दुड़ दुड़ दसन बिसद बर बारै ॥ ललित कपोल मनोहर नासा । सकल सुखद ससि कर सम हासा ॥

कलबल (तोतले) बचन हैं, लाल-लाल ओंठ हैं। उज्ज्वल, सुन्दर और छोटी-छोटी [ऊपर और नीचे] दो-दो दंतुलियाँ हैं। सुन्दर गाल, मनोहर नासिका और सब सुखोंको देनेवाली चन्द्रमाकी [अथवा सुख देनेवाली समस्त कलाओंसे पूर्ण चन्द्रमाकी] किरणोंके समान मधुर मुसकान है ॥ २ ॥

नील कंज लोचन भव मोचन । भ्राजत भाल तिलक गोरोचन ॥ बिकट भृकुटि सम श्रवन सुहाए । कुंचित कच मेचक छबि छाए ॥

नीले कमलके समान नेत्र जन्म-मृत्यु [के बन्धन] से छुड़ानेवाले हैं। ललाटपर गोरोचनका तिलक सुशोभित है। भौंहें टेढ़ी हैं, कान सम और सुन्दर हैं, काले और घुँघराले केशोंकी छबि छा रही है ॥ ३ ॥

पीत झीनि झगुली तन सोही । किलकनि चितवनि भावति मोही ॥ रूप रासि नृप अजिर बिहारी । नाचहिं निज प्रतिबिंब निहारी ॥

पोली और महीन झँगुली शरीरपर शोभा दे रही है। उनकी किलकारी और चितवन मुझे बहुत ही प्रिय लगती है। राजा दशरथजीके आँगनमें विहार करनेवाले रूपकी राशि श्रीरामचन्द्रजी अपनी परछाहीं देखकर नाचते हैं, ॥ ४ ॥

मोहि सन करहिं बिबिधि बिधि क्रीड़ा । बरनत मोहि होति अति ब्रीड़ा ॥ किलकत मोहि धरन जब धावहिं । चलउँ भागि तब पूप देखावहिं ॥

और मुझसे बहुत प्रकारके खेल करते हैं, जिन चरित्रोंका वर्णन करते मुझे लज्जा आती है ! किलकारी मारते हुए जब वे मुझे पकड़ने दौड़ते और मैं भाग चलता, तब मुझे पूआ दिखलाते थे ॥ ५ ॥

दो०— आवत निकट हँसहिं प्रभु भाजत रुदन कराहिं ।

जाऊँ समीप गहन पद फिरि फिरि चितड़ पराहिं ॥ ७७ ( क ) ॥

मेरे निकट आनेपर प्रभु हँसते हैं और भाग जानेपर रोते हैं और जब मैं उनका चरण स्पर्श करनेके लिये पास जाता हूँ, तब वे पीछे फिर-फिरकर मेरी ओर देखते हुए भाग जाते हैं ॥ ७७ ( क ) ॥

प्राकृत सिसु इव लीला देखि भयउ मोहि मोह ।

कवन चरित्र करत प्रभु चिदानंद संदोह ॥ ७७ ( ख ) ॥

  • उत्तरकाण्ड *

१८१

साधारण बच्चों-जैसी लीला देखकर मुझे मोह (शङ्का) हुआ कि सच्चिदानन्दधन प्रभु यह कौन [महत्त्वका] चरित्र (लीला) कर रहे हैं ॥ ७७ (ख) ॥

एतना मन आनत खगराया । रघुपति प्रेरित ब्यापी माया ॥ सो माया न दुखद मोहि काहीं । आन जीव इव संसृत नाहीं ॥

हे पक्षिराज! मनमें इतनी [शङ्का] लाते ही श्रीरघुनाथजीके द्वारा प्रेरित माया मुझपर छा गयी। परन्तु वह माया न तो मुझे दुःख देनेवाली हुई और न दूसरे जीवोंकी भाँति संसारमें डालनेवाली हुई ॥ १ ॥

नाथ इहाँ कछु कारन आना । सुनहु सो सावधान हरिजाना ॥ ग्यान अखंड एक सीताबर । माया बस्य जीव सचराचर ॥

हे नाथ! यहाँ कुछ दूसरा ही कारण है। हे भगवान् के वाहन गरुड़जी! उसे सावधान होकर सुनिये। एक सीतापति श्रीरामजी ही अखण्ड ज्ञानस्वरूप हैं और जड़-चेतन सभी जीव मायाके वश हैं ॥ २ ॥

जौं सब कें रह ग्यान एकरस । ईस्वर जीवहि भेद कहहु कस ॥ माया बस्य जीव अभिमानी । ईस बस्य माया गुन खानी ॥

यदि जीवोंको एकरस (अखण्ड) ज्ञान रहे, तो कहिये, फिर ईश्वर और जीवमें भेद ही कैसा? अभिमानी जीव मायाके वश है और वह [सत्त्व, रज, तम—इन] तीनों गुणोंकी खान माया ईश्वरके वशमें है ॥ ३ ॥

परबस जीव स्वबस भगवंता । जीव अनेक एक श्रीकंता ॥ मुधा भेद जद्यपि कृत माया । बिनु हरि जाइ न कोटि उपाया ॥

जीव परतन्त्र है, भगवान् स्वतन्त्र हैं; जीव अनेक हैं, श्रीपति भगवान् एक हैं। यद्यपि मायाका किया हुआ यह भेद असत् है तथापि वह भगवान् के भजन बिना करोड़ों उपाय करनेपर भी नहीं जा सकता ॥ ४ ॥

दो०—रामचंद्र के भजन बिनु जो चह पद निर्बान ।

ग्यानवंत अपि सो नर पसु बिनु पूँछ बिषान ॥ ७८ ( क ) ॥

श्रीरामचन्द्रजीके भजन बिना जो मोक्षपद चाहता है, वह मनुष्य ज्ञानवान् होनेपर भी बिना पूँछ और सींगका पशु है ॥ ७८ ( क ) ॥

राकापति षोडस उअहिं तारागन समुदाइ ।

सकल गिरिन्ह दव लाइअ बिनु रबि राति न जाइ ॥ ७८ ( ख ) ॥

सभी तारागणोंके साथ सोलह कलाओंसे पूर्ण चन्द्रमा उदय हो और जितने पर्वत हैं उन सबमें दावाग्नि लगा दी जाय, तो भी सूर्यके उदय हुए बिना रात्रि नहीं जा सकती ॥ ७८ ( ख ) ॥

१८२

  • रामचरितमानस *

ऐसेहिं हरि बिनु भजन खगेसा । मितइ न जीवन्ह केर कलेसा ॥ हरि सेवकहि न व्याप अबिद्या । प्रभु प्रेरित व्यापइ तेहि बिद्या ॥

हे पक्षिराज ! इसी प्रकार श्रीहरिके भजन बिना जीवोंका क्लेश नहीं मितता । श्रीहरिके सेवकको अबिद्या नहीं व्यापती । प्रभुकी प्रेरणासे उसे विद्या व्यापती है ॥ १ ॥

ताते नास न होइ दास कर । भेद भगति बाढ़इ बिहंगबर ॥ भ्रम तें चकित राम मोहि देखा । बिहँसे सो सुनु चरित बिसेषा ॥

हे पक्षिश्रेष्ठ ! इसीसे दासका नाश नहीं होता और भेद-भक्ति बढ़ती है । श्रीरामजीने मुझे जब भ्रमसे चकित देखा, तब वे हँसे । वह विशेष चरित्र सुनिये ॥ २ ॥

तेहि कौतुक कर मरमु न काहूँ । जाना अनुज न मातु पिताहूँ ॥ जानु पानि धाए मोहि धरना । स्यामल गात अरुन कर चरना ॥

उस खेलका मर्म किसीने नहीं जाना, न छोटे भाइयोंने और न माता-पिताने ही । वे श्याम शरीर और लाल-लाल हथेली और चरणतलवाले बालरूप श्रीरामजी घुटने और हाथोंके बल मुझे पकड़नेको दौड़े ॥ ३ ॥

तब मैं भागि चलेउँ उरगारी । राम गहन कहँ भुजा पसारी ॥ जिमि जिमि दूर उड़ाउँ अकासा । तहँ भुज हरि देखउँ निज पास ॥

हे सपोंके शत्रु गरुड़जी ! तब मैं भाग चला । श्रीरामजीने मुझे पकड़नेके लिये भुजा फैलायी । मैं जैसे-जैसे आकाशमें दूर उड़ता, वैसे-वैसे ही वहाँ श्रीहरिकी भुजाको अपने पास देखता था ॥ ४ ॥

दो०— ब्रह्मलोक लगि गयउँ मैं चितयउँ पाछ उड़ात ।

जुग अंगुल कर बीच सब राम भुजहि मोहि तात ॥ ७९ ( क ) ॥

मैं ब्रह्मलोकतक गया और जब उड़ते हुए मैंने पीछेकी ओर देखा, तो हे तात ! श्रीरामजीकी भुजामें और मुझमें केवल दो ही अंगुलका बीच था ॥ ७९ ( क ) ॥

ससाबरन भेद करि जहाँ लगे गति मोरि ।

गयउँ तहाँ प्रभु भुज निरखि व्याकुल भयउँ बहोरि ॥ ७९ ( ख ) ॥

सातों आवरणोंको भेदकर जहाँतक मेरी गति थी, वहाँतक मैं गया । पर वहाँ भी प्रभुकी भुजाको [अपने पीछे] देखकर मैं व्याकुल हो गया ॥ ७९ ( ख ) ॥

मूदेउँ नयन त्रसित जब भयऊँ । पुनि चितवत कोसलपुर गयऊँ ॥ मोहि बिलोकि राम मुसुकाहीं । बिहँसत तुरत गयउँ मुख माहीं ॥

  • उत्तरकाण्ड *

१८३

जब मैं भयभीत हो गया, तब मैंने आँखें मूद लीं। फिर आँखें खोलकर देखते ही अवधपुरीमें पहुँच गया। मुझे देखकर श्रीरामजी मुसकराने लगे। उनके हँसते ही मैं तुरंत उनके मुखमें चला गया ॥ १ ॥

उदर माझ सुनु अंडज राया। देखेउँ बहु ब्रह्मांड निकाया ॥ अति बिचित्र तहाँ लोक अनेका। रचना अधिक एक ते एका ॥

हे पक्षिराज! सुनिये, मैंने उनके पेटमें बहुत-से ब्रह्माण्डोंके समूह देखे। वहाँ (उन ब्रह्माण्डोंमें) अनेकों विचित्र लोक थे, जिनकी रचना एक-से-एककी बढ़कर थी ॥ २ ॥

कोटिन्ह चतुरानन गौरीसा। अगनिनत उडगन रबि रजनीसा ॥ अगनिनत लोकपाल जम काला। अगनिनत भूधर भूमि बिसाला ॥

करोड़ों ब्रह्माजी और शिवजी, अनगिनत तारागण, सूर्य और चन्द्रमा, अनगिनत लोकपाल, यम और काल, अनगिनत विशाल पर्वत और भूमि, ॥ ३ ॥

सागर सरि सर बिपिन अपारा। नाना भाँति सृष्टि बिस्तारा ॥ सुर मुनि सिद्ध नाग नर किंनर। चारि प्रकार जीव सचराचर ॥

असंख्य समुद्र, नदी, तालाब और वन तथा और भी नाना प्रकारकी सृष्टिका विस्तार देखा। देवता, मुनि, सिद्ध, नाग, मनुष्य, किन्नर तथा चारों प्रकारके जड़ और चेतन जीव देखे ॥ ४ ॥

दो०— जो नहीं देखा नहीं सुना जो मनहूँ न समाड़।

सो सब अद्भुत देखेउँ बरनि कवनि बिधि जाड़ ॥ ८० ( क ) ॥

जो कभी न देखा था, न सुना था और जो मनमें भी नहीं समा सकता था (अर्थात् जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी), वही सब अद्भुत सृष्टि मैंने देखी। तब उसका किस प्रकार वर्णन किया जाय! ॥ ८० ( क ) ॥

एक एक ब्रह्मांड महूँ रहउँ बरष सत एक।

एहि बिधि देखत फिरउँ मैं अंड कटाह अनेक ॥ ८० ( ख ) ॥

मैं एक-एक ब्रह्माण्डमें एक-एक सौ वर्षतक रहता। इस प्रकार मैं अनेकों ब्रह्माण्ड देखता फिरा ॥ ८० ( ख ) ॥

लोक लोक प्रति भिन्न बिधाता। भिन्न बिज्जु सिव मनु दिसिन्नाता ॥ नर गंधर्ब भूत बेताला। किंनर निसिचर पसु खग ब्याला ॥

प्रत्येक लोकमें भिन्न-भिन्न ब्रह्मा, भिन्न-भिन्न विष्णु, शिव, मनु, दिक्पाल, मनुष्य, गन्धर्व, भूत, वैताल, किन्नर, राक्षस, पशु, पक्षी, सर्प, ॥ १ ॥

१८४

  • रामचरितमानस *

देव दनुज गन नाना जाती। सकल जीव तहाँ आनहि भाँती॥ महि सरि सागर सर गिरि नाना। सब प्रपंच तहाँ आनइ आना॥

तथा नाना जातिके देवता एवं दैत्यगण थे। सभी जीव वहाँ दूसरे ही प्रकारके थे। अनेक पृथ्वी, नदी, समुद्र, तालाब, पर्वत तथा सब सृष्टि वहाँ दूसरी-ही-दूसरी प्रकारकी थी ॥ २ ॥

अंडकोस प्रति प्रति निज रूपा। देखेउँ जिनस अनेक अनूपा॥ अवधपुरी प्रति भुवन निनारी। सरजू भिन्न भिन्न नर नारी॥

प्रत्येक ब्रह्माण्डमें मैंने अपना रूप देखा तथा अनेकों अनुपम वस्तुएँ देखीं। प्रत्येक भुवनमें न्यारी ही अवधपुरी, भिन्न ही सरयूजी और भिन्न प्रकारके ही नर-नारी थे ॥ ३ ॥

दसरथ कौसल्या सुनु ताता। बिबिध रूप भरतादिक भाता॥ प्रति ब्रह्मांड राम अवतारा। देखउँ बालबिनोद अपारा॥

हे तात! सुनिये, दशरथजी, कौसल्याजी और भरतजी आदि भाई भी भिन्न-भिन्न रूपोंके थे। मैं प्रत्येक ब्रह्माण्डमें रामावतार और उनकी अपार बाललीलाएँ देखता फिरता ॥ ४ ॥

दो०—भिन्न भिन्न मैं दीख सबु अति बिचित्र हरिजान।

अगनित भुवन फिरेउँ प्रभु राम न देखेउँ आन॥ ८१ (क) ॥

हे हरिवाहन! मैंने सभी कुछ भिन्न-भिन्न और अत्यन्त विचित्र देखा। मैं अनगिनत ब्रह्माण्डोंमें फिरा, पर प्रभु श्रीरामचन्द्रजीको मैंने दूसरी तरहका नहीं देखा ॥ ८१ (क) ॥

सोड़ सिसुपन सोड़ सोभा सोड़ कृपाल रघुबीर।

भुवन भुवन देखत फिरउँ प्रेरित मोह समीर॥ ८१ (ख) ॥

सर्वत्र वही शिशुपन, वही शोभा और वही कृपालु श्रीरघुवीर! इस प्रकार मोहरूपी पवनकी प्रेरणासे मैं भुवन-भुवनमें देखता फिरता था ॥ ८१ (ख) ॥

भ्रमत मोहि ब्रह्मांड अनेका। बीते मनहुँ कल्प सत एका॥

फिरत फिरत निज आश्रम आयउँ। तहाँ पुनि रहि कछु काल गवाँयउँ॥

अनेक ब्रह्माण्डोंमें भटकते मुझे मानो एक सौ कल्प बीत गये। फिरता-फिरता मैं अपने आश्रममें आया और कुछ काल वहाँ रहकर बिताया ॥ १ ॥

निज प्रभु जन्म अवध सुनि पायउँ। निर्भर प्रेम हरषि उठि धायउँ॥

देखउँ जन्म महोत्सव जाई। जेहि बिधि प्रथम कहा मैं गाई॥

फिर जब अपने प्रभुका अवधपुरीमें जन्म (अवतार) सुन पाया, तब प्रेमसे परिपूर्ण होकर मैं हर्षपूर्वक उठ दौड़ा। जाकर मैंने जन्म-महोत्सव देखा, जिस प्रकार मैं पहले वर्णन कर चुका हूँ ॥ २ ॥

  • उत्तरकाण्ड *

१८५

राम उदर देखेउँ जग नाना । देखत बनइ न जाइ बखाना ॥ तहैं पुनि देखेउँ राम सुजाना । माया पति कृपाल भगवाना ॥

श्रीरामचन्द्रजीके पेटमें मैंने बहुत-से जगत् देखे, जो देखते ही बनते थे, वर्णन नहीं किये जा सकते। वहाँ फिर मैंने सुजान मायाके स्वामी कृपालु भगवान् श्रीरामको देखा ॥ ३ ॥

करउँ बिचार बहोरी बहोरी । मोह कलिल व्यापित मति मोरी ॥ उभय घरी महँ मैं सब देखा । भयउँ भ्रमित मन मोह बिसेषा ॥

मैं बार-बार विचार करता था। मेरी बुद्धि मोहरूपी कीचड़से व्याप्त थी। यह सब मैंने दो ही घड़ीमें देखा। मनमें विशेष मोह होनेसे मैं थक गया ॥ ४ ॥

दो०— देखि कृपाल बिकल मोहि बिहँसे तब रघुबीर।

बिहँसतहीं मुख बाहेर आयउँ सुनु मतिधीर ॥ ८२ ( क ) ॥

मुझे व्याकुल देखकर तब कृपालु श्रीरघुवीर हँस दिये। हे धीरबुद्धि गरुड़जी! सुनिये, उनके हँसते ही मैं मुँहसे बाहर आ गया ॥ ८२ ( क ) ॥

सोड़ लरिकार्डि मो सन करन लगे पुनि राम।

कोटि भाँति समुझावउँ मनु न लहइ बिश्राम ॥ ८२ ( ख ) ॥

श्रीरामचन्द्रजी मेरे साथ फिर वही लड़कपन करने लगे। मैं करोड़ों (असंख्य) प्रकारसे मनको समझाता था, पर वह शान्ति नहीं पाता था ॥ ८२ ( ख ) ॥

देखि चरित यह सो प्रभुताई । समुझत देह दसा बिसराई ॥

धरनि परेउँ मुख आव न बाता । त्राहि त्राहि आरत जन त्राता ॥

यह [बाल] चरित्र देखकर और [पेटके अंदर देखी हुई] उस प्रभुताका स्मरण कर मैं शरीरकी सुध भूल गया और 'हे आर्तजनोंके रक्षक! रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये' पुकारता हुआ पृथ्वीपर गिर पड़ा। मुखसे बात नहीं निकलती थी! ॥ १ ॥

प्रेमाकुल प्रभु मोहि बिलोकी । निज माया प्रभुता तब रोकी ॥

कर सरोज प्रभु मम सिर धरेऊ । दीनदयाल सकल दुख हरेऊ ॥

तदनन्तर प्रभुने मुझे प्रेमविह्वल देखकर अपनी मायाकी प्रभुता (प्रभाव) को रोक लिया। प्रभुने अपना कर-कमल मेरे सिरपर रखा। दीनदयालुने मेरा सम्पूर्ण दुःख हर लिया ॥ २ ॥

कीन्ह राम मोहि बिगत बिमोहा । सेवक सुखद कृपा संदोहा ॥

प्रभुता प्रथम बिचारि बिचारी । मन महँ होइ हरष अति भारी ॥

सेवकोंको सुख देनेवाले, कृपाके समूह (कृपापमय) श्रीरामजीने मुझे मोहसे सर्वथा रहित कर दिया। उनकी पहलेवाली प्रभुताको विचार-विचारकर (याद कर-करके) मेरे मनमें बड़ा भारी हर्ष हुआ ॥ ३ ॥

१८६

  • रामचरितमानस *

भगत बछलता प्रभु कै देखी । उपजी मम उर प्रीति बिसेषी ॥ सजल नयन पुलकित कर जोरी । कीन्हिउँ बहु बिधि बिनय बहोरी ॥

प्रभुकी भक्तवत्सलता देखकर मेरे हृदयमें बहुत ही प्रेम उत्पन्न हुआ। फिर मैंने [आनन्दसे] नेत्रोंमें जल भरकर, पुलकित होकर और हाथ जोड़कर बहुत प्रकारसे विनती की ॥ ४ ॥

दो०— सुनि सप्रेम मम बानी देखि दीन निज दास ।

बचन सुखद गंभीर मृदु बोले रमानिवास ॥ ८३ ( क ) ॥

मेरी प्रेमयुक्त वाणी सुनकर और अपने दासको दीन देखकर रमानिवास श्रीरामजी सुखदायक, गम्भीर और कोमल वचन बोले— ॥ ८३ ( क ) ॥

काकभसुंडि मागु बर अति प्रसन्न मोहि जानि ।

अनिमादिक सिधि अपर रिधि मोच्छ सकल सुख खानि ॥ ८३ ( ख ) ॥

हे काकभशुण्डि! तू मुझे अत्यन्त प्रसन्न जानकर वर माँग। अणिमा आदि अष्ट सिद्धियाँ, दूसरी ऋद्धियाँ तथा सम्पूर्ण सुखोंकी खान मोक्ष, ॥ ८३ ( ख ) ॥

ग्यान बिबेक बिरति बिग्याना । मुनि दुर्लभ गुन जे जग नाना ॥

आजु देउँ सब संसय नाहीं । मागु जो तोहि भाव मन माहीं ॥

ज्ञान, विवेक, वैराग्य, विज्ञान (तत्त्वज्ञान) और वे अनेकों गुण जो जगत्में मुनियोंके लिये भी दुर्लभ हैं, ये सब मैं आज तुझे दूँगा, इसमें सन्देह नहीं। जो तेरे मन भावे, सो माँग ले ॥ १ ॥

सुनि प्रभु बचन अधिक अनुरागेउँ । मन अनुमान करन तब लागेउँ ॥

प्रभु कह देन सकल सुख सही । भगति आपनी देन न कही ॥

प्रभुके वचन सुनकर मैं बहुत ही प्रेममें भर गया। तब मनमें अनुमान करने लगा कि प्रभुने सब सुखोंके देनेकी बात कही, यह तो सत्य है; पर अपनी भक्ति देनेकी बात नहीं कही ॥ २ ॥

भगति हीन गुन सब सुख ऐसे । लवन बिना बहु बिंजन जैसे ॥

भजन हीन सुख कवने काजा । अस बिचारि बोलेउँ खगराजा ॥

भक्तिये रहित सब गुण और सब सुख वैसे ही (फोके) हैं जैसे नमकके बिना बहुत प्रकारके भोजनके पदार्थ। भजनसे रहित सुख किस कामके? हे पक्षिराज! ऐसा विचारकर मैं बोला— ॥ ३ ॥

जौँ प्रभु होइ प्रसन्न बर देहू । मो पर करहु कृपा अरु नेहू ॥

मन भावत बर मागउँ स्वामी । तुम्ह उदार उर अंतरजामी ॥