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भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 971, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 971
  • उत्तरकाण्ड *

१६१

मनमें परम उत्साह भरकर अनेकों प्रकारकी बाललीलाएँ कहकर, फिर ऋषि विश्वामित्रजीका अयोध्या आना और श्रीरघुवीरजीका विवाह वर्णन किया ॥ ६४ ॥

बहुरि राम अभिषेक प्रसंगा । पुनि नृप बचन राज रस भंगा ॥ पुरबासिन्ह कर बिरह बिषादा । कहैसि राम लछिमन संबादा ॥

फिर श्रीरामजीके राज्याभिषेकका प्रसङ्ग, फिर राजा दशरथजीके वचनसे राजरस (राज्याभिषेकके आनन्द)में भङ्ग पड़ना, फिर नगरनिवासियोंका विरह, विषाद और श्रीराम-लक्ष्मणका संवाद (बातचीत) कहा ॥ १ ॥

बिपिन गवन केवट अनुरागा । सुरसरि उत्तरि निवास प्रयागा ॥ बालमीक प्रभु मिलन बखाना । चित्रकूट जिमि बसे भगवाना ॥

श्रीरामका वनगमन, केवटका प्रेम, गङ्गाजीसे पार उत्तरकर प्रयागमें निवास, बाल्मीकिजी और प्रभु श्रीरामजीका मिलन और जैसे भगवान् चित्रकूटमें बसे, वह सब कहा ॥ २ ॥

सचिवागवन नगर नृप मरना । भरतागवन प्रेम बहु बरना ॥ करि नृप क्रिया संग पुरबासी । भरत गए जहाँ प्रभु सुख रासी ॥

फिर मन्त्री सुमन्त्रजीका नगरमें लौटना, राजा दशरथजीका मरण, भरतजीका [ननिहालसे] अयोध्यामें आना और उनके प्रेमका बहुत वर्णन किया। राजाकी अन्त्येष्टि क्रिया करके नगरनिवासियोंको साथ लेकर भरतजी वहाँ गये जहाँ सुखकी राशि प्रभु श्रीरामचन्द्रजी थे ॥ ३ ॥

पुनि रघुपति बहु बिधि समुझाए । लै पादुका अवधपुर आए ॥ भरत रहनि सुरपति सुत करनी । प्रभु अरु अत्रि भेंट पुनि बरनी ॥

फिर श्रीरघुनाथजीने उनको बहुत प्रकारसे समझाया, जिससे वे खड़ाऊँ लेकर अयोध्यापुरी लौट आये, यह सब कथा कही। भरतजीकी नन्दिग्राममें रहनेकी रीति, इन्द्रपुत्र जयन्तकी नीच करनी और फिर प्रभु श्रीरामचन्द्रजी और अत्रिजीका मिलाप वर्णन किया ॥ ४ ॥

दो०— कहि बिराध बध जेहि बिधि देह तजी सरभंग ।

बरनि सुतीछन प्रीति पुनि प्रभु अगस्ति सतसंग ॥ ६५ ॥

जिस प्रकार विराधका बध हुआ और शरभंगजीने शरीर त्याग किया, वह प्रसंग कहकर, फिर सुतीक्ष्णजीका प्रेम वर्णन करके प्रभु और अगस्त्यजीका सत्संग-वृत्तान्त कहा ॥ ६५ ॥

कहि दंडक बन पावनताई । गीध मङ्ग्री पुनि तेहिं गाई ॥ पुनि प्रभु पंचबटीं कृत बासा । भंजी सकल मुनिन्ह की त्रासा ॥

दण्डकवनका पवित्र करना कहकर फिर भुशुण्डिजीने गृध्रराजके साथ मित्रताका वर्णन किया। फिर जिस प्रकार प्रभुने पञ्चवटीमें निवास किया और सब मुनियोंके भयका नाश किया, ॥ १ ॥