श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 975, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- उत्तरकाण्ड *
१७३
संत बिसुद्ध मिलहिं परि तेही । चितवहिं राम कृपा करि जेही ॥ राम कृपाँ तव दरसन भयऊ । तव प्रसाद सब संसय गयऊ ॥
शुद्ध (सच्चे) संत उसीको मिलते हैं जिसे श्रीरामजी कृपा करके देखते हैं। श्रीरामजीकी कृपासे मुझे आपके दर्शन हुए और आपकी कृपासे मेरा सन्देह चला गया ॥ ४ ॥
दो०— सुनि बिहंगपति बानी सहित बिनय अनुराग ।
पुलक गात लोचन सजल मन हरषेउ अति काग ॥ ६९ ( क ) ॥
पक्षिराज गरुड़जीकी विनय और प्रेमयुक्त वाणी सुनकर काकभुशुण्डिजीका शरीर पुलकित हो गया, उनके नेत्रोंमें जल भर आया और वे मनमें अत्यन्त हर्षित हुए ॥ ६९ (क) ॥
श्रोता सुमति सुसील सुचि कथा रसिक हरिदास ।
पाड़ उमा अति गोप्यमपि सज्जन करहिं प्रकास ॥ ६९ ( ख ) ॥
हे उमा! सुन्दर बुद्धिवाले, सुशील, पवित्र कथाके प्रेमी और हरिके सेवक श्रोताको पाकर सज्जन अत्यन्त गोपनीय (सबके सामने प्रकट न करनेयोग्य) रहस्यको भी प्रकट कर देते हैं ॥ ६९ (ख) ॥
बोलेउ काकभसुंड बहोरी । नभग नाथ पर प्रीति न थोरी ॥
सब बिधि नाथ पूज्य तुम्ह मेरे । कृपापात्र रघुनायक केरे ॥
काकभुशुण्डिजीने फिर कहा—पक्षिराजपर उनका प्रेम कम न था (अर्थात् बहुत था)—हे नाथ! आप सब प्रकारसे मेरे पूज्य हैं और श्रीरघुनाथजीके कृपापात्र हैं ॥ १ ॥
तुम्हहि न संसय मोह न माया । मो पर नाथ कीन्हि तुम्ह दया ॥
पठइ मोह मिस खगपति तोही । रघुपति दीन्हि बड़ाई मोही ॥
आपको न सन्देह है और न मोह अथवा माया ही है। हे नाथ! आपने तो मुझपर दया की है। हे पक्षिराज! मोहके बहाने श्रीरघुनाथजीने आपको यहाँ भेजकर मुझे बड़ाई दी है ॥ २ ॥
तुम्ह निज मोह कही खगसाई । सो नहिं कछु आचरज गोसाई ॥
नारद भव बिरंचि सनकादी । जे मुनिनायक आतमबादी ॥
हे पक्षियोंके स्वामी! आपने अपना मोह कहा, सो हे गोसाई! यह कुछ आश्चर्य नहीं है। नारदजी, शिवजी, ब्रह्माजी और सनकादि जो आत्मतत्त्वके मर्मज्ञ और उसका उपदेश करनेवाले श्रेष्ठ मुनि हैं ॥ ३ ॥
मोह न अंध कीन्ह केहि केही । को जग काम नचाव न जेही ॥
तूस्त्राँ केहि न कीन्ह बौराहा । केहि कर हृदय क्रोध नहिं दाहा ॥
उनमेंसे भी किस-किसको मोहने अंधा (विवेकशून्य) नहीं किया? जगत्में ऐसा कौन है जिसे कामने न नचाया हो? तूष्णाने किसको मतवाला नहीं बनाया? क्रोधने किसका हृदय नहीं जलाया? ॥ ४ ॥