श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 974, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें१७२
- रामचरितमानस *
जिस प्रकार श्रीरामचन्द्रजी अपने नगर (अयोध्या) में आये, वे सब उज्ज्वल चरित्र काकभुशुण्डिजीने विस्तारपूर्वक वर्णन किये। फिर उन्होंने श्रीरामजीका राज्याभिषेक कहा। [शिवजी कहते हैं—] अयोध्यापुरीका और अनेक प्रकारकी राजनीतिका वर्णन करते हुए— ॥ ३ ॥
कथा समस्त भुसुंड बखानी । जो मैं तुम्ह सन कही भवानी ॥ सुनि सब राम कथा खगनाहा । कहत बचन मन परम उछाहा ॥
भुशुण्डिजीने वह सब कथा कही जो हे भवानी! मैंने तुमसे कही। सारी रामकथा सुनकर पक्षिराज गरुड़जी मनमें बहुत उत्साहित (आनन्दित) होकर वचन कहने लगे— ॥ ४ ॥
सो०—गयउ मोर संदेह सुनेउँ सकल रघुपति चरित ।
भयउ राम पद नेह तव प्रसाद बायस तिलक ॥ ६८ ( क ) ॥
श्रीरघुनाथजीके सब चरित्र मैंने सुने, जिससे मेरा सन्देह जाता रहा। हे काकशिरोमणि! आपके अनुग्रहसे श्रीरामजीके चरणोंमें मेरा प्रेम हो गया ॥ ६८ ( क ) ॥
मोहि भयउ अति मोह प्रभु बंधन रन महुँ निरखि ।
चिदानंद संदोह राम बिकल कारन कवन ॥ ६८ ( ख ) ॥
युद्धमें प्रभुका नागपाशसे बन्धन देखकर मुझे अत्यन्त मोह हो गया था कि श्रीरामजी तो सच्चिदानन्दधन हैं, वे किस कारण व्याकुल हैं ॥ ६८ ( ख ) ॥
देखि चरित अति नर अनुसारी । भयउ हृदयँ मम संसय भारी ॥
सोइ भ्रम अब हित करि मैं माना । कीन्ह अनुग्रह कृपानिधाना ॥
बिलकुल ही लौकिक मनुष्योंका-सा चरित्र देखकर मेरे हृदयमें भारी सन्देह हो गया। मैं अब उस भ्रम (सन्देह) को अपने लिये हित करके समझता हूँ। कृपानिधानने मुझपर यह बड़ा अनुग्रह किया ॥ १ ॥
जो अति आतप व्याकुल होई । तरु छाया सुख जानइ सोई ॥
जौँ नहीं होत मोह अति मोही । मिलतेउँ तात कवन बिधि तोही ॥
जो धूपसे अत्यन्त व्याकुल होता है, वही वृक्षकी छायाका सुख जानता है। हे तात! यदि मुझे अत्यन्त मोह न होता तो मैं आपसे किस प्रकार मिलता? ॥ २ ॥
सुनतेउँ किमि हरि कथा सुहाई । अति बिचित्र बहु बिधि तुम्ह गाई ॥
निगमागम पुरान मत एहा । कहहिँ सिद्ध मुनि नहीं संदेहा ॥
और कैसे अत्यन्त विचित्र यह सुन्दर हरिकथा सुनता; जो आपने बहुत प्रकारसे गायी है? वेद, शास्त्र और पुराणोंका यही मत है; सिद्ध और मुनि भी यही कहते हैं, इसमें सन्देह नहीं कि— ॥ ३ ॥