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भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 973, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 973
  • उत्तरकाण्ड *

१७१

संपातीसे सब कथा सुनकर पवनपुत्र हनुमान्जी जिस तरह अपार समुद्रको लाँघ गये, फिर हनुमान्जीने जैसे लङ्कामें प्रवेश किया और फिर जैसे सीताजीको धीरज दिया, सो सब कहा ॥ २ ॥

बन उजारि रावनहि प्रबोधी । पुर दहि नाघेउ बहुरि पयोधी ॥ आए कपि सब जहँ रघुराई । बैदेही की कुसल सुनाई ॥

अशोकवनको उजाड़कर, रावणको समझाकर, लङ्कापुरीको जलाकर फिर जैसे उन्होंने समुद्रको लाँघा और जिस प्रकार सब वानर वहाँ आये जहाँ श्रीरघुनाथजी थे और आकर श्रीजानकीजीकी कुशल सुनायी, ॥ ३ ॥

सेन समेति जथा रघुबीरा । उतरे जाइ बारिनिधि तीरा ॥ मिला बिभीषन जेहि बिधि आई । सागर निग्रह कथा सुनाई ॥

फिर जिस प्रकार सेनासहित श्रीरघुवीर जाकर समुद्रके तटपर उतरे और जिस प्रकार विभीषणजी आकर उनसे मिले, वह सब और समुद्रके बाँधनेकी कथा उसने सुनायी ॥ ४ ॥

दो०— सेतु बाँधि कपि सेन जिमि उतरी सागर पार ।

गयउ बसीठी बीरबर जेहि बिधि बालिकुमार ॥ ६७ ( क ) ॥

पुल बाँधकर जिस प्रकार वानरोंकी सेना समुद्रके पार उतरी और जिस प्रकार वीरश्रेष्ठ बालिपुत्र अंगद दूत बनकर गये, वह सब कहा ॥ ६७ ( क ) ॥

निसिचर कीस लराई बरनिसि बिबिध प्रकार ।

कुंभकरन घननाद कर बल पौरुष संधार ॥ ६७ ( ख ) ॥

फिर राक्षसों और वानरोंके युद्धका अनेकों प्रकारसे वर्णन किया। फिर कुम्भकर्ण और मेघनादके बल, पुरुषार्थ और संहारकी कथा कही ॥ ६७ ( ख ) ॥

निसिचर निकर मरन बिधि नाना । रघुपति रावन समर बखाना ॥

रावन बध मंदोदरि सोका । राज बिभीषन देव असोका ॥

नाना प्रकारके राक्षससमूहोंके मरण तथा श्रीरघुनाथजी और रावणके अनेक प्रकारके युद्धका वर्णन किया। रावणवध, मन्दोदरीका शोक, विभीषणका राज्याभिषेक और देवताओंका शोकरहित होना कहकर, ॥ १ ॥

सीता रघुपति मिलन बहोरी । सुरन्ह कीन्हि अस्तुति कर जोरी ॥

पुनि पुष्पक चढ़ि कपिन्ह समेता । अवध चले प्रभु कृपा निकेता ॥

फिर सीताजी और श्रीरघुनाथजीका मिलाप कहा। जिस प्रकार देवताओंने हाथ जोड़कर स्तुति की और फिर जैसे वानरोंसमेत पुष्पकविमानपर चढ़कर कृपाधाम प्रभु अवधपुरीको चले, वह कहा ॥ २ ॥

जेहि बिधि राम नगर निज आए । बायस बिसद चरित सब गाए ॥

कहेसि बहोरि राम अभिषेका । पुर बरनत नृपनीति अनेका ॥