श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 997, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- उत्तरकाण्ड *
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दो०—रामु अमित गुन सागर थाह कि पावड़ कोड़।
संतन्ह सन जस किछु सुनेउँ तुम्हि सुनायउँ सोड़ ॥ १२ ( क ) ॥
श्रीरामजी अपार गुणोंके समुद्र हैं, क्या उनकी कोई थाह पा सकता है? संतोसे मैंने जैसा कुछ सुना था, वही आपको सुनाया ॥ १२ ( क ) ॥
सो०—भाव बस्य भगवान सुख निधान करुना भवन।
तजि ममता मद मान भजिअ सदा सीतारवन ॥ १२ ( ख ) ॥
सुखके भण्डार, करुणाधाम भगवान् भाव (प्रेम) के वश हैं। [अतएव] ममता, मद और मानको छोड़कर सदा श्रीजानकीनाथजीका ही भजन करना चाहिये ॥ १२ ( ख ) ॥
सुनि भुसुंडि के बचन सुहाए। हरषित खगपति पंख फुलाए ॥
नयन नीर मन अति हरषाना। श्रीरघुपति प्रताप उर आना ॥
भुशुण्डिजीके सुन्दर वचन सुनकर पक्षिराजने हर्षित होकर अपने पंख फुला लिये। उनके नेत्रोंमें [प्रेमानन्दके आँसुओंका] जल आ गया और मन अत्यन्त हर्षित हो गया। उन्होंने श्रीरघुनाथजीका प्रताप हृदयमें धारण किया ॥ १ ॥
पाछिल मोह समुद्धि पछिताना। ब्रह्म अनादि मनुज करि माना ॥
पुनि पुनि काग चरन सिरु नावा। जानि राम सम प्रेम बढ़ावा ॥
वे अपने पिछले मोहको समझकर (याद करके) पछिताने लगे कि मैंने अनादि ब्रह्मको मनुष्य करके माना। गरुड़जीने बार-बार काकभुशुण्डिजीके चरणोंपर सिर नवाया और उन्हें श्रीरामजीके ही समान जानकर प्रेम बढ़ाया ॥ २ ॥
गुर बिनु भव निधि तरड़ न कोई। जौँ बिरंचि संकर सम होई ॥
संसय सर्प गसेउ मोहि ताता। दुखद लहरि कुतर्क बहु ब्राता ॥
गुरुके बिना कोई भवसागर नहीं तर सकता, चाहे वह ब्रह्माजी और शंकरजीके समान ही क्यों न हो। [गरुड़जीने कहा—] हे तात! मुझे सन्देशरूपी सर्पने डस लिया था और [साँपके डसनेपर जैसे विष चढ़नेसे लहरे आती हैं, वैसे ही] बहुत-सी कुतर्करूपी दुःख देनेवाली लहरे आ रही थीं ॥ ३ ॥
तव सरूप गारुड़ि रघुनायक। मोहि जिआयउ जन सुखदायक ॥
तव प्रसाद मम मोह नसाना। राम रहस्य अनूपम जाना ॥
आपके स्वरूपरूपी गारुड़ी (साँपका विष उतारनेवाले) के द्वारा भक्तोंको सुख देनेवाले श्रीरघुनाथजीने मुझे जिला लिया। आपकी कृपासे मेरा मोह नाश हो गया और मैंने श्रीरामजीका अनुपम रहस्य जाना ॥ ४ ॥