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श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 998, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 998

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  • रामचरितमानस *

दो०—ताहि प्रसंसि बिबिधि बिधि सीस नाड़ कर जोरि।

बचन बिनीत सप्रेम मृदु बोलेउ गुरुड़ बहोरि ॥ १३ ( क ) ॥

उनकी (भुशुण्डिजीकी) बहुत प्रकारसे प्रशंसा करके, सिर नवाकर और हाथ जोड़कर फिर गुरुड़जी प्रेमपूर्वक विनम्र और कोमल वचन बोले— ॥ १३ ( क ) ॥

प्रभु अपने अबिबेक ते बूझउँ स्वामी तोहि।

कृपासिंधु सादर कहहु जानि दास निज मोहि ॥ १३ ( ख ) ॥

हे प्रभो! हे स्वामी! मैं अपने अविवेकके कारण आपसे पूछता हूँ। हे कृपाके समुद्र! मुझे अपना 'निज दास' जानकर आदरपूर्वक (विचारपूर्वक) मेरे प्रश्नका उत्तर कहिये ॥ १३ ( ख ) ॥

तुम्ह सर्बग्य तग्य तम पारा। सुमति सुसील सरल आचारा ॥

ग्यान बिरति बिग्यान निवासा। रघुनायक के तुम्ह प्रिय दासा ॥

आप सब कुछ जाननेवाले हैं, तत्त्वके ज्ञाता हैं, अन्धकार (माया) से परे, उत्तम बुद्धिसे युक्त, सुशील, सरल आचरणवाले, ज्ञान, वैराग्य और विज्ञानके धाम और श्रीरघुनाथजीके प्रिय दास हैं ॥ १ ॥

कारन कवन देह यह पाई। तात सकल मोहि कहहु बुझाई ॥

राम चरित सर सुंदर स्वामी। पायहु कहाँ कहहु नभगामी ॥

आपने यह काकशरीर किस कारणसे पाया? हे तात! सब समझाकर मुझसे कहिये। हे स्वामी! हे आकाशगामी! यह सुन्दर रामचरितमानस आपने कहाँ पाया, सो कहिये ॥ २ ॥

नाथ सुना मैं अस सिव पाहीं। महा प्रलयहुँ नास तव नाहीं ॥

मुधा बचन नहि ईस्वर कहई। सोउ मोरें मन संसय अहई ॥

हे नाथ! मैंने शिवजीसे ऐसा सुना है कि महाप्रलयमें भी आपका नाश नहीं होता और ईश्वर (शिवजी) कभी मिथ्या वचन कहते नहीं। वह भी मेरे मनमें सन्देह है ॥ ३ ॥

अग जग जीव नाग नर देवा। नाथ सकल जगु काल कलेवा ॥

अंड कटाह अमित लयकारी। कालु सदा दुरतिक्रम भारी ॥

[क्योंकि] हे नाथ! नाग, मनुष्य, देवता आदि चर-अचर जीव तथा यह सारा जगत् कालका कलेवा है। असंख्य ब्रह्माण्डोंका नाश करनेवाला काल सदा बड़ा ही अनिवार्य है ॥ ४ ॥

सो०—तुम्हहि न व्यापत काल अति कराल कारन कवन।

मोहि सो कहहु कृपाल ग्यान प्रभाव कि जोग बल ॥ १४ ( क ) ॥