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श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

२००

  • रामचरितमानस *

भूकुटि बिलास नचावइ ताही । अस प्रभु छाड़ि भजिअ कहु काही ॥ मन क्रम बचन छाड़ि चतुराई । भजत कृपा करिहहिं रघुराई ॥

भगवान् उस मायाको भाँहेके इशारेपर नचाते हैं। ऐसे प्रभुको छोड़कर कहो, [और] किसका भजन किया जाय। मन, बचन और कर्मसे चतुराई छोड़कर भजते ही श्रीरघुनाथजी कृपा करेंगे ॥ ३ ॥

एहि बिधि सिसुबिनोद प्रभु कीन्हा । सकल नगरबासिन्ह सुख दीन्हा ॥ तै उछंग कबहुँक हलरावै । कबहुँ पालने घालि झुलावै ॥

इस प्रकारसे प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने बालक्रीड़ा की और समस्त नगरनिवासियोंको सुख दिया। कौसल्याजी कभी उन्हें गोदमें लेकर हिलाती-डुलाती और कभी पालनेमें लिटाकर झुलाती थीं ॥ ४ ॥

दो०—प्रेम मगन कौसल्या निसि दिन जात न जान।

सुत सनेह बस माता बालचरित कर गान ॥ २०० ॥

प्रेममें मग्न कौसल्याजी रात और दिनका बीतना नहीं जानती थीं। पुत्रके स्नेहवश माता उनके बालचरित्रोंका गान किया करतीं ॥ २०० ॥

एक बार जननीं अन्हवाए । करि सिंगार पलनाँ पौढ़ाए ॥ निज कुल इष्टदेव भगवाना । पूजा हेतु कीन्ह अस्त्राना ॥

एक बार माताने श्रीरामचन्द्रजीको स्नान कराया और शृंगार करके पालनेपर पौढ़ा दिया। फिर अपने कुलके इष्टदेव भगवान्की पूजाके लिये स्नान किया ॥ १ ॥

करि पूजा नैवेद्य चढ़ावा । आपु गई जहाँ पाक बनावा ॥ बहरि मातु तहवाँ चलि आई । भोजन करत देख सुत जाई ॥

पूजा करके नैवेद्य चढ़ाया और स्वयं वहाँ गयी, जहाँ रसोई बनायी गयी थी। फिर माता वहाँ (पूजाके स्थानमें) लौट आयी, और वहाँ आनेपर पुत्रको [इष्टदेव भगवान्के लिये चढ़ाये हुए नैवेद्यका] भोजन करते देखा ॥ २ ॥

गै जननी सिसु पहिं भयभीता । देखा बाल तहाँ पुनि सूता ॥ बहरि आइ देखा सुत सोई । हृदयँ कंप मन धीर न होई ॥

माता भयभीत होकर (पालनेमें सोया था, यहाँ किसने लाकर बैठा दिया, इस बातसे डरकर) पुत्रके पास गयी, तो वहाँ बालकको सोया हुआ देखा। फिर [पूजास्थानमें लौटकर] देखा कि वही पुत्र वहाँ [भोजन कर रहा] है। उनके हृदयमें कम्प होने लगा और मनको धीरज नहीं होता ॥ ३ ॥

  • बालकाण्ड *

२०१

इहाँ उहाँ दुड़ बालक देखा । मतिभ्रम मोर कि आन बिसेषा ॥ देखि राम जननी अकुलानी । प्रभु हँसि दीन्ह मधुर मुसुकानी ॥

[वह सोचने लगी कि] यहाँ और वहाँ मैंने दो बालक देखे। यह मेरी बुद्धिका भ्रम है या और कोई विशेष कारण है? प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने माताको घबड़ायी हुई देखकर मधुर मुसकानसे हँस दिया ॥ ४ ॥

दो०—देखरावा मातहि निज अद्भुत रूप अखंड । रोम रोम प्रति लागे कोटि कोटि ब्रह्मंड ॥ २०१ ॥

फिर उन्होंने माताको अपना अखण्ड अद्भुत रूप दिखलाया, जिसके एक-एक रोममें करोड़ों ब्रह्माण्ड लगे हुए हैं ॥ २०१ ॥

अगनित रबि ससि सिव चतुरानन । बहु गिरि सरित सिंधु महि कानन ॥ काल कर्म गुन ग्यान सुभाऊ । सोउ देखा जो सुना न काऊ ॥

अगणित सूर्य, चन्द्रमा, शिव, ब्रह्मा, बहुत-से पर्वत, नदियाँ, समुद्र, पृथ्वी, वन, काल, कर्म, गुण, ज्ञान और स्वभाव देखे। और वे पदार्थ भी देखे जो कभी सुने भी न थे ॥ १ ॥

देखी माया सब बिधि गाढ़ी । अति सभीत जोरें कर ठाढ़ी ॥ देखा जीव नचावड़ जाही । देखी भगति जो छोरड़ ताही ॥

सब प्रकारसे बलवती मायाको देखा कि वह [भगवान्के सामने] अत्यन्त भयभीत हाथ जोड़े खड़ी है। जीवको देखा, जिसे वह माया नचाती है और [फिर] भक्तिको देखा, जो उस जीवको [मायासे] छुड़ा देती है ॥ २ ॥

तन पुलकित मुख बचन न आवा । नयन मूदि चरननि सिरु नावा ॥ बिसमयवंत देखि महतारी । भए बहुरि सिसुरूप खरारी ॥

[माताका] शरीर पुलकित हो गया, मुखसे वचन नहीं निकलता। तब आँखें मूँदकर उसने श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें सिर नवाया। माताको आश्चर्यचकित देखकर खरके शत्रु श्रीरामजी फिर बालरूप हो गये ॥ ३ ॥

अस्तुति करि न जाड़ भय माना । जगत पिता मैं सुत करि जाना ॥ हरि जननी बहुबिधि समुझाई । यह जनि कतहुँ कहसि सुनु माई ॥

[मातासे] स्तुति भी नहीं की जाती। वह डर गयी कि मैंने जगत्पिता परमात्माको पुत्र करके जाना। श्रीहरिने माताको बहुत प्रकारसे समझाया [और कहा—] हे माता! सुनो, यह बात कहींपर कहना नहीं ॥ ४ ॥

२०२

  • रामचरितमानस *

दो०— बार बार कौसल्या बिनय करइ कर जोरि।

अब जनि कबहूँ व्यापै प्रभु मोहि माया तोरि ॥ २०२ ॥

कौसल्याजी बार-बार हाथ जोड़कर विनय करती हैं कि हे प्रभो! मुझे आपकी माया अब कभी न व्यापे ॥ २०२ ॥

बालचरित हरि बहुबिधि कीन्हा। अति अनंद दासन्ह कहँ दीन्हा ॥

कछुक काल बीतें सब भाई। बड़े भए परिजन सुखदाई ॥

भगवान्ने बहुत प्रकारसे बाललीलाएँ कीं और अपने सेवकोंको अत्यन्त आनन्द दिया। कुछ समय बीतनेपर चारों भाई बड़े होकर कुटुम्बियोंको सुख देनेवाले हुए ॥ १ ॥

चूड़ाकरन कीन्ह गुरु जाई। बिप्रन्ह पुनि दछिना बहु पाई ॥

परम मनोहर चरित अपारा। करत फिरत चारिउ सुकुमारा ॥

तब गुरुजीने जाकर चूड़ाकर्म-संस्कार किया। ब्राह्मणोंने फिर बहुत-सी दक्षिणा पायी। चारों सुन्दर राजकुमार बड़े ही मनोहर अपार चरित्र करते फिरते हैं ॥ २ ॥

मन क्रम बचन अगोचर जोई। दसरथ अजिर बिचर प्रभु सोई ॥

भोजन करत बोल जब राजा। नहिं आवत तजि बाल समाजा ॥

जो मन, वचन और कर्मसे अगोचर हैं, वही प्रभु दशरथजीके आँगनमें विचर रहे हैं। भोजन करनेके समय जब राजा बुलाते हैं, तब वे अपने बालसखाओंके समाजको छोड़कर नहीं आते ॥ ३ ॥

कौसल्या जब बोलन जाई। ठुमुकु ठुमुकु प्रभु चलहिं पराई ॥

निगम नेति सिव अंत न पावा। ताहि धैर जननी हठि धावा ॥

कौसल्याजी जब बुलाने जाती हैं, तब प्रभु ठुमुक-ठुमुक भाग चलते हैं। जिनका वेद 'नेति' (इतना ही नहीं) कहकर निरूपण करते हैं और शिवजीने जिनका अन्त नहीं पाया, माता उन्हें हठपूर्वक पकड़नेके लिये दौड़ती हैं ॥ ४ ॥

धूसर धूरि भरें तनु आए। भूपति बिहसि गोद बैठाए ॥

वे शरीरमें धूल लपेटे हुए आये और राजाने हँसकर उन्हें गोदमें बैठा लिया ॥ ५ ॥

दो०— भोजन करत चपल चित इत उत अवसरु पाइ।

भाजि चले किलकत मुख दधि ओदन लपटाइ ॥ २०३ ॥

भोजन करते हैं पर चित चञ्चल है। अवसर पाकर मुँहमें दही-भात लपटाये किलकारी मारते हुए इधर-उधर भाग चले ॥ २०३ ॥

  • बालकाण्ड *

२०३

बालचरित अति सरल सुहाए। सारद सेष संभु श्रुति गाए॥ जिन्ह कर मन इन्ह सन नहीं राता। ते जन बंचित किए बिधाता॥

श्रीरामचन्द्रजीकी बहुत ही सरल (भोली) और सुन्दर (मनभावनी) बाललीलाओंका सरस्वती, शेषजी, शिवजी और वेदोंने गान किया है। जिनका मन इन लीलाओंमें अनुरक्त नहीं हुआ, विधाताने उन मनुष्योंको वञ्चित कर दिया (नितान्त भाग्यहीन बनाया) ॥ १ ॥

भाए कुमार जबहिं सब भ्राता। दीन्ह जनेऊ गुरु पितु माता॥ गुरगृहँ गए पढ़न रघुराई। अलप काल बिद्या सब आई॥

ज्यों ही सब भाई कुमारवस्थामें हुए, त्यों ही गुरु, पिता और माताने उनका यज्ञोपवीत संस्कार कर दिया। श्रीरघुनाथजी [भाइयोंसहित] गुरुके घरमें विद्या पढ़ने गये और थोड़े ही समयमें उनको सब विद्याएँ आ गयीं ॥ २ ॥

जाकी सहज स्वास श्रुति चारी। सो हरि पढ़ यह कौतुक भारी॥ बिद्या विनय निपुन गुन सीला। खेलहिं खेल सकल नृप लीला॥

चारों वेद जिनके स्वाभाविक श्वास हैं, वे भगवान् पढ़ें, यह बड़ा कौतुक (अचरज) है। चारों भाई विद्या, विनय, गुण और शीलमें [बढ़ें] निपुण हैं और सब राजाओंकी लीलाओंके ही खेल खेलते हैं ॥ ३ ॥

करतल बान धनुष अति सोहा। देखत रूप चराचर मोहा॥ जिन्ह बीथिन्ह बिहरहिं सब भाई। थकित होहिं सब लोग लुगाई॥

हाथोंमें बाण और धनुष बहुत ही शोभा देते हैं। रूप देखते ही चराचर (जड़-चेतन) मोहित हो जाते हैं। वे सब भाई जिन गलियोंमें खेलते [हुए निकलते] हैं, उन गलियोंके सभी स्त्री-पुरुष उनको देखकर स्नेहसे शिथिल हो जाते हैं अथवा ठिठककर रह जाते हैं ॥ ४ ॥

दो०— कोसलपुर बासी नर नारि बृद्ध अरु बाल।

प्रानहु ते प्रिय लागत सब कहँ राम कृपाल॥ २०४॥

कोसलपुरके रहनेवाले स्त्री, पुरुष, बूढ़े और बालक सभीको कृपालु श्रीरामचन्द्रजी प्राणोंसे भी बढ़कर प्रिय लगते हैं ॥ २०४ ॥

बंधु सखा सँग लेहिं बोलाई। बन मृगया नित खेलहिं जाई॥ पावन मृग मारहिं जियँ जानी। दिन प्रति नृपहिं देखावहिं आनी॥

श्रीरामचन्द्रजी भाइयों और इष्ट-मित्रोंको बुलाकर साथ ले लेते हैं और नित्य वनमें जाकर शिकार खेलते हैं। मनमें पवित्र समझकर मृगोंको मारते हैं और प्रतिदिन लाकर राजा (दशरथजी) को दिखलाते हैं ॥ १ ॥

२०४ * रामचरितमानस *

जे मृग राम बान के मारे। ते तनु तजि सुरलोक सिधारे॥ अनुज सखा सँग भोजन करहीं। मातु पिता अग्या अनुसरहीं॥ जो मृग श्रीरामजीके बाणसे मारे जाते थे, वे शरीर छोड़कर देवलोकको चले जाते थे। श्रीरामचन्द्रजी अपने छोटे भाइयों और सखाओंके साथ भोजन करते हैं और माता-पिताकी आज्ञाका पालन करते हैं॥ २॥

जेहि बिधि सुखी होहिं पुर लोगा। करहिं कृपानिधि सोइ संजोगा॥ बेद पुरान सुनहिं मन लाई। आपु कहहिं अनुजन्ह समुझाई॥ जिस प्रकार नगरके लोग सुखी हों, कृपानिधान श्रीरामचन्द्रजी वही संयोग (लीला) करते हैं। वे मन लगाकर वेद-पुराण सुनते हैं और फिर स्वयं छोटे भाइयोंको समझाकर कहते हैं॥ ३॥

प्रातकाल उठि कै रघुनाथा। मातु पिता गुरु नावहिं माथा॥ आयसु मागि करहिं पुर काजा। देखि चरित हरषइ मन राजा॥ श्रीरघुनाथजी प्रातःकाल उठकर माता-पिता और गुरुको मस्तक नवाते हैं और आज्ञा लेकर नगरका काम करते हैं। उनके चरित्र देख-देखकर राजा मनमें बड़े हर्षित होते हैं॥ ४॥

दो०—ब्यापक अकल अनीह अज निर्गुन नाम न रूप। भगत हेतु नाना बिधि करत चरित्र अनूप॥ २०५॥ जो व्यापक, अकल (निरवयव), इच्छारहित, अजन्मा और निर्गुण हैं; तथा जिनका न नाम है न रूप, वही भगवान् भक्तोंके लिये नाना प्रकारके अनुपम (अलौकिक) चरित्र करते हैं॥ २०५॥

यह सब चरित कहा मैं गाई। आगिलि कथा सुनहु मन लाई॥ बिस्वामित्र महामुनि ग्यानी। बसहिं बिपिन सुभ आश्रम जानी॥ यह सब चरित्र मैंने गाकर (बखानकर) कहा। अब आगेकी कथा मन लगाकर सुनो। ज्ञानी महामुनि विश्वामित्रजी वनमें शुभ आश्रम (पवित्र स्थान) जानकर बसते थे, ॥ १॥

जहँ जप जग्य जोग मुनि करहीं। अति मारीच सुबाहुहि डरहीं॥ देखत जग्य निसाचर धावहिं। करहिं उपद्रव मुनि दुख पावहिं॥ जहाँ वे मुनि जप, यज्ञ और योग करते थे, परन्तु मारीच और सुबाहुसे बहुत डरते थे। यज्ञ देखते ही राक्षस दौड़ पड़ते थे और उपद्रव मचाते थे, जिससे मुनि [बहुत] दुःख पाते थे॥ २॥

गाधितनय मन चिंता ब्यापी। हरि बिनु मरहिं न निसिचर पापी॥ तब मुनिबर मन कीन्ह बिचारा। प्रभु अवतरेउ हरन महि भारा॥ गाधिके पुत्र विश्वामित्रजीके मनमें चिन्ता छा गयी कि ये पापी राक्षस भगवान्के [मारे] बिना न मरेंगे। तब श्रेष्ठ मुनिने मनमें विचार किया कि प्रभुने पृथ्वीका भार हरनेके लिये अवतार लिया है॥ ३॥

* बालकाण्ड * २०५

एहूँ मिस देखौं पद जाई। करि बिनती आनौं दोउ भाई॥ ग्यान बिराग सकल गुन अयना। सो प्रभु मैं देखब भरि नयना॥ इसी बहाने जाकर मैं उनके चरणोंका दर्शन करूँ और विनती करके दोनों भाइयोंको ले आऊँ। [अहा!] जो ज्ञान, वैराग्य और सब गुणोंके धाम हैं, उन प्रभुको मैं नेत्र भरकर देखूँगा॥ ४॥

दो०—बहुबिधि करत मनोरथ जात लागि नहिं बार। करि मज्जन सरऊ जल गए भूप दरबार॥ २०६॥ बहुत प्रकारसे मनोरथ करते हुए जानेमें देर नहीं लगी। सरयूजीके जलमें स्नान करके वे राजाके दरवाजेपर पहुँचे॥ २०६॥

मुनि आगमन सुना जब राजा। मिलन गयउ लै बिप्र समाजा॥ करि दंडवत मुनिहि सनमानी। निज आसन बैठारेन्हि आनी॥ राजाने जब मुनिका आना सुना, तब वे ब्राह्मणोंके समाजको साथ लेकर मिलने गये और दण्डवत् करके मुनिका सम्मान करते हुए उन्हें लाकर अपने आसनपर बैठाया॥ १॥

चरन पखारि कीन्हि अति पूजा। मो सम आजु धन्य नहिं दूजा॥ बिबिध भाँति भोजन करवावा। मुनिबर हृदयँ हरष अति पावा॥ चरणोंको धोकर बहुत पूजा की और कहा—मेरे समान धन्य आज दूसरा कोई नहीं है। फिर अनेक प्रकारके भोजन करवाये, जिससे श्रेष्ठ मुनिने अपने हृदयमें बहुत ही हर्ष प्राप्त किया॥ २॥

पुनि चरननि मेले सुत चारी। राम देखि मुनि देह बिसारी॥ भए मगन देखत मुख सोभा। जनु चकोर पूरन ससि लोभा॥ फिर राजाने चारों पुत्रोंको मुनिके चरणोंपर डाल दिया (उनसे प्रणाम कराया)। श्रीरामचन्द्रजीको देखकर मुनि अपनी देहकी सुधि भूल गये। वे श्रीरामजीके मुखकी शोभा देखते ही ऐसे मग्न हो गये, मानो चकोर पूर्ण चन्द्रमाको देखकर लुभा गया हो॥ ३॥

तब मन हरषि बचन कह राऊ। मुनि अस कृपा न कीन्हिहु काऊ॥ केहि कारन आगमन तुम्हारा। कहहु सो करत न लावउँ बारा॥ तब राजाने मनमें हर्षित होकर ये वचन कहे—हे मुनि! इस प्रकार कृपा तो आपने कभी नहीं की। आज किस कारणसे आपका शुभागमन हुआ? कहिये, मैं उसे पूरा करनेमें देर नहीं लगाऊँगा॥ ४॥

असुर समूह सतावहिं मोही। मैं जाचन आयउँ नृप तोही॥ अनुज समेत देहु रघुनाथा। निसिचर बध मैं होब सनाथा॥

२०६ * रामचरितमानस *


[मुनिने कहा—] हे राजन्! राक्षसोंके समूह मुझे बहुत सताते हैं। इसीलिये मैं तुमसे कुछ माँगने आया हूँ। छोटे भाईसहित श्रीरघुनाथजीको मुझे दो। राक्षसोंके मारे जानेपर मैं सनाथ (सुरक्षित) हो जाऊँगा॥५॥

दो०—देहु भूप मन हरषित तजहु मोह अग्यान। धर्म सुजस प्रभु तुम्ह कौं इन्ह कहँ अति कल्यान॥२०७॥

हे राजन्! प्रसन्न मनसे इनको दो, मोह और अज्ञानको छोड़ दो। हे स्वामी! इससे तुमको धर्म और सुयशकी प्राप्ति होगी और इनका परम कल्याण होगा॥२०७॥

सुनि राजा अति अप्रिय बानी। हृदय कंप मुख दुति कुमुलानी॥ चौथेंपन पायउँ सुत चारी। बिप्र बचन नहिं कहेहु बिचारी॥

इस अत्यन्त अप्रिय वाणीको सुनकर राजाका हृदय काँप उठा और उनके मुखकी कान्ति फीकी पड़ गयी। [उन्होंने कहा—] हे ब्राह्मण! मैंने चौथेपनमें चार पुत्र पाये हैं, आपने विचारकर बात नहीं कही॥१॥

मागहु भूमि धेनु धन कोसा। सर्बस देउँ आजु सहरोसा॥ देह प्रान तें प्रिय कछु नाहीं। सोउ मुनि देउँ निमिष एक माहीं॥

हे मुनि! आप पृथ्वी, गौ, धन और खजाना माँग लीजिये, मैं आज बड़े हर्षके साथ अपना सर्वस्व दे दूँगा। देह और प्राणसे अधिक प्यारा कुछ भी नहीं होता, मैं उसे भी एक पलमें दे दूँगा॥२॥

सब सुत प्रिय मोहि प्रान कि नाईं। राम देत नहिं बनइ गोसाईं॥ कहँ निसिचर अति घोर कठोरा। कहँ सुंदर सुत परम किसोरा॥

सभी पुत्र मुझे प्राणोंके समान प्यारे हैं; उनमें भी हे प्रभो! रामको तो [किसी प्रकार भी] देते नहीं बनता। कहाँ अत्यन्त डरावने और क्रूर राक्षस और कहाँ परम किशोर अवस्थाके (बिल्कुल सुकुमार) मेरे सुन्दर पुत्र!॥३॥

सुनि नृप गिरा प्रेम रस सानी। हृदयँ हरष माना मुनि ग्यानी॥ तब बसिष्ठ बहुबिधि समुझावा। नृप संदेह नास कहँ पावा॥

प्रेम-रसमें सनी हुई राजाकी वाणी सुनकर ज्ञानी मुनि विश्वामित्रजीने हृदयमें बड़ा हर्ष माना। तब वसिष्ठजीने राजाको बहुत प्रकारसे समझाया, जिससे राजाका सन्देह नाशको प्राप्त हुआ॥४॥

अति आदर दोउ तनय बोलाए। हृदयँ लाइ बहु भाँति सिखाए॥ मेरे प्रान नाथ सुत दोऊ। तुम्ह मुनि पिता आन नहिं कोऊ॥

  • बालकाण्ड *

२०७

राजाने बड़े ही आदरसे दोनों पुत्रोंको बुलाया और हृदयसे लगाकर बहुत प्रकारसे उन्हें शिक्षा दी। [फिर कहा—] हे नाथ! ये दोनों पुत्र मेरे प्राण हैं। हे मुनि! [अब] आप ही इनके पिता हैं, दूसरा कोई नहीं ॥ ५ ॥

दो०— सौंपे भूप रिषिहि सुत बहुबिधि देइ असीस।

जननी भवन गए प्रभु चले नाइ पद सीस ॥ २०८ ( क ) ॥

राजाने बहुत प्रकारसे आशीर्वाद देकर पुत्रोंको ऋषिके हवाले कर दिया। फिर प्रभु माताके महलमें गये और उनके चरणोंमें सिर नवाकर चले ॥ २०८ ( क ) ॥

सो०— पुरुषसिंह दोउ बीर हरषि चले मुनि भय हरन।

कृपासिंधु मतिधीर अखिल बिस्व कारन करन ॥ २०८ ( ख ) ॥

पुरुषोंमें सिंहरूप दोनों भाई (राम-लक्ष्मण) मुनिका भय हरनेके लिये प्रसन्न होकर चले। वे कृपाके समुद्र, धीरबुद्धि और सम्पूर्ण विश्वके कारणके भी कारण हैं ॥ २०८ (ख) ॥

अरुन नयन उर बाहु बिसाला। नील जलज तनु स्याम तमाला ॥

कटि पट पीत कसें बर भाथा। रुचिर चाप सायक दुहुँ हाथा ॥

भगवान्के लाल नेत्र हैं, चौड़ी छाती और विशाल भुजाएँ हैं, नील कमल और तमालके वृक्षकी तरह श्याम शरीर है, कमरमें पीताम्बर [पहने] और सुन्दर तरकस कसे हुए हैं। दोनों हाथोंमें [क्रमशः] सुन्दर धनुष और बाण हैं ॥ १ ॥

स्याम गौर सुंदर दोउ भाई। बिस्वामित्र महानिधि पाई ॥

प्रभु ब्रह्मन्यदेव मैं जाना। मोहि निति पिता तजेउ भगवाना ॥

श्याम और गौर वर्णके दोनों भाई परम सुन्दर हैं। विश्वामित्रजीको महान् निधि प्राप्त हो गयी। [वे सोचने लगे—] मैं जान गया कि प्रभु ब्रह्मण्यदेव (ब्राह्मणोंके भक्त) हैं। मेरे लिये भगवान्ने अपने पिताको भी छोड़ दिया ॥ २ ॥

चले जात मुनि दीन्हि देखाई। मुनि ताड़का क्रोध करि धाई ॥

एकहिं बान प्रान हरि लीन्हा। दीन जानि तेहि निज पद दीन्हा ॥

मार्गमें चले जाते हुए मुनिने ताड़काको दिखलाया। शब्द सुनते ही वह क्रोध करके दौड़ी। श्रीरामजीने एक ही बाणसे उसके प्राण हर लिये और दीन जानकर उसको निजपद (अपना दिव्य स्वरूप) दिया ॥ ३ ॥

तब रिषि निज नाथहि जियँ चीन्ही। बिद्यानिधि कहुँ बिद्या दीन्ही ॥

जाते लाग न छुधा पिपासा। अतुलित बल तनु तेज प्रकासा ॥

२०८

  • रामचरितमानस *

तब ऋषि विश्वामित्रने प्रभुको मनमें विद्याका भण्डार समझते हुए भी [लीलाको पूर्ण करनेके लिये] ऐसी विद्या दी, जिससे भूख-प्यास न लगे और शरीरमें अतुलित बल और तेजका प्रकाश हो ॥ ४ ॥

दो०— आयुध सर्व समर्पि कै प्रभु निज आश्रम आनि।

कंद मूल फल भोजन दीन्ह भगति हित जानि ॥ २०९ ॥

सब अस्त्र-शस्त्र समर्पण करके मुनि प्रभु श्रीरामजीको अपने आश्रममें ले आये; और उन्हें परम हित जानकर भक्तिपूर्वक कन्द, मूल और फलका भोजन कराया ॥ २०९ ॥

प्रात कहा मुनि सन रघुराई। निर्भय जग्य करहु तुम्ह जाई ॥ होम करन लागे मुनि झारी। आपु रहे मख कीं रखवारी ॥

सबेरे श्रीरघुनाथजीने मुनिसे कहा—आप जाकर निडर होकर यज्ञ कीजिये। यह सुनकर सब मुनि हवन करने लगे। आप (श्रीरामजी) यज्ञकी रखवालीपर रहे ॥ १ ॥

सुनि मारीच निसाचर क्रोही। लै सहाय धावा मुनिद्रोही ॥ बिनु फर बान राम तेहि मारा। सत जोजन गा सागर पारा ॥

यह समाचार सुनकर मुनियोंका शत्रु क्रोधी राक्षस मारीच अपने सहायकोंको लेकर दौड़ा। श्रीरामजीने बिना फलवाला बाण उसको मारा, जिससे वह सौ योजनाके विस्तारवाले समुद्रके पार जा गिरा ॥ २ ॥

पावक सर सुबाहु पुनि मारा। अनुज निसाचर कटकु सँधारा ॥ मारि असुर द्विज निर्भयकारी। अस्तुति करहिं देव मुनि झारी ॥

फिर सुबाहुको अग्निबाण मारा। इधर छोटे भाई लक्ष्मणजीने राक्षसोंकी सेनाका संहार कर डाला। इस प्रकार श्रीरामजीने राक्षसोंको मारकर ब्राह्मणोंको निर्भय कर दिया। तब सारे देवता और मुनि स्तुति करने लगे ॥ ३ ॥

तहँ पुनि कछुक दिवस रघुराया। रहे कीन्हि बिप्रन्ह पर दाय। भगति हेतु बहु कथा पुराना। कहे बिप्र जद्यपि प्रभु जाना ॥

श्रीरघुनाथजीने वहाँ कुछ दिन और रहकर ब्राह्मणोंपर दया की। भक्तिके कारण ब्राह्मणोंने उन्हें पुराणोंकी बहुत-सी कथाएँ कहीं, यद्यपि प्रभु सब जानते थे ॥ ४ ॥

तब मुनि सादर कहा बुझाई। चरित एक प्रभु देखिअ जाई ॥ धनुषजग्य सुनि रघुकुल नाथा। हरषि चले मुनिबर के साथ। ॥

तदनन्तर मुनिने आदरपूर्वक समझाकर कहा—हे प्रभो! चलकर एक चरित्र देखिये। रघुकुलके स्वामी श्रीरामचन्द्रजी धनुषयज्ञ [की बात] सुनकर मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्रजीके साथ प्रसन्न होकर चले ॥ ५ ॥

  • बालकाण्ड *

२०९

आश्रम एक दीख मग माहीं। खग मृग जीव जंतु तहँ नाहीं॥ पूछा मुनिहि सिला प्रभु देखी। सकल कथा मुनि कहा बिसेषी॥

मार्गमें एक आश्रम दिखायी पड़ा। वहाँ पशु-पक्षी, कोई भी जीव-जन्तु नहीं था। पत्थरकी एक शिलाको देखकर प्रभुने पूछा, तब मुनिने विस्तारपूर्वक सब कथा कही॥६॥

दो०— गौतम नारि श्राप बस उपल देह धरि धीर।

चरन कमल रज चाहति कृपा करहु रघुबीर॥ २१०॥

गौतम मुनिकी स्त्री अहल्या शापवश पत्थरकी देह धारण किये बड़े धीरजसे आपके चरणकमलोंकी धूलि चाहती है। हे रघुवीर! इसपर कृपा कीजिये॥ २१०॥

छं०— परसत पद पावन सोक नसावन प्रगट भई तपपुंज सही।

देखत रघुनायक जन सुखदायक सनमुख होइ कर जोरि रही॥

अति प्रेम अधीरा पुलक सरीरा मुख नहिं आवड़ बचन कही।

अतिसय बड़भागी चरनन्हि लागी जुगल नयन जलधार बही॥

श्रीरामजीके पवित्र और शोकको नाश करनेवाले चरणोंका स्पर्श पाते ही सचमुच वह तपोमूर्ति अहल्या प्रकट हो गयी। भक्तोंको सुख देनेवाले श्रीरघुनाथजीको देखकर वह हाथ जोड़कर सामने खड़ी रह गयी। अत्यन्त प्रेमके कारण वह अधीर हो गयी। उसका शरीर पुलकित हो उठा; मुखसे वचन कहनेमें नहीं आते थे। वह अत्यन्त बड़भागिनी अहल्या प्रभुके चरणोंसे लिपट गयी और उसके दोनों नेत्रोंसे जल (प्रेम और आनन्दके आँसुओं) की धारा बहने लगी॥१॥

धीरजु मन कीन्हा प्रभु कहँ चीन्हा रघुपति कृपाँ भगति पाई।

अति निर्मल बानी अस्तुति ठानी ग्यानगम्य जय रघुराई॥

मैं नारि अपावन प्रभु जग पावन रावन रिपु जन सुखदाई।

राजीव बिलोचन भव भय मोचन पाहि पाहि सरनहिं आई॥

फिर उसने मनमें धीरज धरकर प्रभुको पहचाना और श्रीरघुनाथजीकी कृपासे भक्ति प्राप्त की। तब अत्यन्त निर्मल वाणीसे उसने [इस प्रकार] स्तुति प्रारम्भ की—हे ज्ञानसे जानने योग्य श्रीरघुनाथजी! आपकी जय हो! मैं [सहज ही] अपवित्र स्त्री हूँ; और हे प्रभो! आप जगत्को पवित्र करनेवाले, भक्तोंको सुख देनेवाले और रावणके शत्रु हैं। हे कमलनयन! हे संसार (जन्म-मृत्यु) के भयसे छुड़ानेवाले! मैं आपकी शरण आयी हूँ, [मेरी] रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये॥२॥

मुनि श्राप जो दीन्हा अति भल कीन्हा परम अनुग्रह मैं माना।

देखेउँ भरि लोचन हरि भवमोचन इहड़ लाभ संकर जाना॥

२१०

  • रामचरितमानस *

बिनती प्रभु मोरी मैं मति भोरी नाथ न मागउँ बर आना ।

पद कमल परागा रस अनुरागा मम मन मधुप करै पाना ॥

मुनिने जो मुझे शाप दिया, सो बहुत ही अच्छा किया। मैं उसे अत्यन्त अनुग्रह मानती हूँ कि जिसके कारण मैंने संसारसे छुड़ानेवाले श्रीहरि (आप) को नेत्र भरकर देखा। इसी (आपके दर्शन) को शंकरजी सबसे बड़ा लाभ समझते हैं। हे प्रभो! मैं बुद्धिकी बड़ी भोली हूँ, मेरी एक विनती है। हे नाथ! मैं और कोई वर नहीं माँगती, केवल यही चाहती हूँ कि मेरा मनरूपी भौरा आपके चरणकमलकी रजके प्रेमरूपी रसका सदा पान करता रहे ॥ ३ ॥

जेहिं पद सुरसरिता परम पुनीता प्रगट भई सिव सीस धरी । सोई पद पंकज जेहि पूजत अज मम सिर धरेउ कृपाल हरी ॥ एहि भाँति सिधारी गौतम नारी बार बार हरि चरण परी । जो अति मन भावा सो बरु पावा गै पतिलोक अनंद भरी ॥

जिन चरणोंसे परमपवित्र देवनदी गङ्गाजी प्रकट हुई, जिन्हें शिवजीने सिरपर धारण किया और जिन चरणकमलोंको ब्रह्माजी पूजते हैं, कृपालु हरि (आप) ने उन्हींको मेरे सिरपर रखा। इस प्रकार [स्तुति करती हुई] बार-बार भगवान्के चरणोंमें गिरकर, जो मनको बहुत ही अच्छा लगा, उस वरको पाकर गौतमकी स्त्री अहल्या आनन्दमें भरी हुई पतिलोकको चली गयी ॥ ४ ॥

दो०—अस प्रभु दीनबंधु हरि कारन रहित दयाल । तुलसिदास सठ तेहि भजु छाड़ि कपट जंजाल ॥ २११ ॥

प्रभु श्रीरामचन्द्रजी ऐसे दीनबन्धु और बिना ही कारण दया करनेवाले हैं। तुलसीदासजी कहते हैं, हे शठ [मन]! तू कपट-जंजाल छोड़कर उन्हींका भजन कर ॥ २११ ॥

मासपारायण, सातवाँ विश्राम

चले राम लछिमन मुनि संग। गए जहाँ जग पावनि गंगा ॥ गाधिसूनु सब कथा सुनाई। जेहि प्रकार सुरसरि महि आई ॥

श्रीरामजी और लक्ष्मणजी मुनिके साथ चले। वे वहाँ गये, जहाँ जगत्को पवित्र करनेवाली गङ्गाजी थीं। महाराज गाधिके पुत्र विश्वामित्रजीने वह सब कथा कह सुनायी जिस प्रकार देवनदी गङ्गाजी पृथ्वीपर आयी थीं ॥ १ ॥

तब प्रभु रिषिन्ह समेत नहाए। बिबिध दान महिदेवन्हि पाए ॥ हरषि चले मुनि बूंद सहाया। बेगि बिदेह नगर निअराया ॥

  • बालकाण्ड *

२११

तब प्रभुने ऋषियोंसहित [गङ्गाजीमें] स्नान किया। ब्राह्मणोंने भाँति-भाँतिके दान पाये। फिर मुनिवृन्दके साथ वे प्रसन्न होकर चले और शीघ्र ही जनकपुरके निकट पहुँच गये ॥ २ ॥

पुर रम्यता राम जब देखी। हरषे अनुज समेत बिसेषी ॥ बापीं कूप सरित सर नाना। सलिल सुधासम मनि सोपाना ॥

श्रीरामजीने जब जनकपुरकी शोभा देखी, तब वे छोटे भाई लक्ष्मणसहित अत्यन्त हर्षित हुए। वहाँ अनेकों बावलियाँ, कुएँ, नदी और तालाब हैं, जिनमें अमृतके समान जल है और मणियोंकी सीढ़ियाँ [बनी हुई] हैं ॥ ३ ॥

गुंजत मंजु मत्त रस भूंगा। कूजत कल बहुबरन बिहंगा ॥ बरन बरन बिकसे बनजाता। त्रिबिध समीर सदा सुखदाता ॥

मकरन्द-रससे मतबाले होकर भौर सुन्दर गुंजार कर रहे हैं। रंग-बिरंगे [बहुत-से] पक्षी मधुर शब्द कर रहे हैं। रंग-रंगके कमल खिले हैं। सदा (सब ऋतुओंमें) सुख देनेवाला शीतल, मन्द, सुगन्ध पवन बह रहा है ॥ ४ ॥

दो०— सुमन बाटिका बाग बन बिपुल बिहंग निवास।

फूलत फलत सुपल्लवत सोहत पुर चहुँ पास ॥ २१२ ॥

पुष्पवाटिका (फूलवारी), बाग और वन, जिनमें बहुत-से पक्षियोंका निवास है, फूलते, फलते और सुन्दर पत्तोंसे लदे हुए नगरके चारों ओर सुशोभित हैं ॥ २१२ ॥

बनड़ न बरनत नगर निकार्ई। जहाँ जाड़ मन तहँड़ँ लोभाई ॥ चारु बजारु बिचित्र अँवारी। मनिमय बिधि जनु स्वकर सँवारी ॥

नगरकी सुन्दरताका वर्णन करते नहीं बनता। मन जहाँ जाता है; वहाँ लुभा जाता (रम जाता) है। सुन्दर बाजार है, मणियोंसे बने हुए विचित्र छजे हैं, मानो ब्रह्माने उन्हें अपने हाथोंसे बनाया है ॥ १ ॥

धनिक बनिक बर धनद समाना। बैठे सकल बस्तु लै नाना ॥ चौहट सुंदर गलीं सुहाई। संतत रहहिं सुगंध सिंचाई ॥

कुबेरके समान श्रेष्ठ धनी व्यापारी सब प्रकारकी अनेक वस्तुएँ लेकर [दूकानोंमें] बैठे हैं। सुन्दर चौराहे और सुहावनी गलियाँ सदा सुगन्धसे सिंची रहती हैं ॥ २ ॥

मंगलमय मंदिर सब केरें। चित्रित जनु रतिनाथ चितेरें ॥ पुर नर नारि सुभग सुचि संता। धरमसील ग्यानी गुनवंता ॥

सबके घर मङ्गलमय हैं और उनपर चित्र कढ़े हुए हैं, जिन्हें मानो कामदेवरूपी चित्रकारने अंकित किया है। नगरके [सभी] स्त्री-पुरुष सुन्दर, पवित्र, साधु-स्वभाववाले, धर्मात्मा, ज्ञानी और गुणवान् हैं ॥ ३ ॥

२१२

  • रामचरितमानस *

अति अनूप जहाँ जनक निवासू। बिथकहिं बिबुध बिलोकि बिलासू॥ होत चकित चित कोट बिलोकी। सकल भुवन सोभा जनु रोकी॥

जहाँ जनकजीका अत्यन्त अनुपम (सुन्दर) निवासस्थान (महल) है, वहाँके विलास (ऐश्वर्य)को देखकर देवता भी थकित (स्तिम्भित) हो जाते हैं [मनुष्योंकी तो बात ही क्या!]। कोट (राजमहलके परकोटे) को देखकर चित चकित हो जाता है, [ऐसा मालूम होता है] मानो उसने समस्त लोकोंकी शोभाको रोक (घेर) रखा है ॥ ४ ॥

दो०— धवल धाम मनि पुरट पट सुघटित नाना भाँति।

सिय निवास सुंदर सदन सोभा किमि कहि जाति ॥ २१३ ॥

उज्ज्वल महलोंमें अनेक प्रकारके सुन्दर रीतिसे बने हुए मणिजटित सोनेकी जरीके परदे लगे हैं। सीताजीके रहनेके सुन्दर महलकी शोभाका वर्णन किया ही कैसे जा सकता है ॥ २१३ ॥

सुभग द्वार सब कुलिस कपाटा। भूप भीर नट मागध भाटा॥ बनी बिसाल बाजि गज साला। हय गय रथ संकुल सब काला॥

राजमहलके सब दरवाजे (फाटक) सुन्दर हैं, जिनमें वज्रके (मजबूत अथवा हीरोके चमकते हुए) किवाड़ लगे हैं। वहाँ [मातहत] राजाओं, नटों, मागधों और भाटोंकी भीड़ लगी रहती है। घोड़ों और हाथियोंके लिये बहुत बड़ी-बड़ी घुड़शालें और गजशालाएँ (फीलखाने) बनी हुई हैं; जो सब समय घोड़े, हाथी और रथोंसे भरी रहती हैं ॥ १ ॥

सूर सचिव सेनप बहुतेरे। नृपगृह सरिस सदन सब केरे॥ पुर बाहेर सर सरित समीपा। उतरे जहाँ तहाँ बिपुल महीपा॥

बहुत-से शूरवीर, मन्त्री और सेनापति हैं। उन सबके घर भी राजमहल-सरीखे ही हैं। नगरके बाहर तालाब और नदीके निकट जहाँ-तहाँ बहुत-से राजालोग उतरे हुए (डेरा डाले हुए) हैं ॥ २ ॥

देखि अनूप एक अँवराई। सब सुपास सब भाँति सुहाई॥ कौसिक कहेउ मोर मनु माना। इहाँ रहिअ रघुबीर सुजाना॥

[वहीं] आमोंका एक अनुपम बाग देखकर, जहाँ सब प्रकारके सुभीते थे और जो सब तरहसे सुहावना था, विश्वामित्रजीने कहा—हे सुजान रघुवीर! मेरा मन कहता है कि यहीं रहा जाय ॥ ३ ॥

भलेहिं नाथ कहि कृपानिकेता। उतरे तहाँ मुनिबुंद समेता॥ बिस्वामित्र महामुनि आए। समाचार मिथिलापति पाए॥

कृपाके धाम श्रीरामचन्द्रजी 'बहुत अच्छा स्वामिन्!' कहकर वहाँ मुनियोंके समूहके साथ ठहर गये। मिथिलापति जनकजीने जब यह समाचार पाया कि महामुनि विश्वामित्र आये हैं, ॥ ४ ॥

  • बालकाण्ड *

२१३

दो०— संग सचिव सुचि भूरि भट भूसुर बर गुर ग्याति।

चले मिलन मुनिनायकहि मुदित राउ एहि भाँति ॥ २१४ ॥

तब उन्होंने पवित्र हृदयके (ईमानदार, स्वामिभक्त) मन्त्री, बहुत-से योद्धा, श्रेष्ठ ब्राह्मण, गुरु (शतानन्दजी) और अपनी जातिके श्रेष्ठ लोगोंको साथ लिया और इस प्रकार प्रसन्नताके साथ राजा मुनियोंके स्वामी विश्वामित्रजीसे मिलने चले ॥ २१४ ॥

कीन्ह प्रनामु चरन धरि माथा । दीन्हि असीस मुदित मुनिनाथा ॥

बिप्रबुंद सब सादर बंदे । जानि भाग्य बड़ राउ अनंदे ॥

राजाने मुनिके चरणोंपर मस्तक रखकर प्रणाम किया। मुनियोंके स्वामी विश्वामित्रजीने प्रसन्न होकर आशीर्वाद दिया। फिर सारी ब्राह्मणमण्डलीको आदरसहित प्रणाम किया और अपना बड़ा भाग्य जानकर राजा आनन्दित हुए ॥ १ ॥

कुसल प्रस्न कहि बारहिं बारा । बिस्वामित्र नृपहि बैठारा ॥

तेहि अवसर आए दोउ भाई । गए रहे देखन फुलवाई ॥

बार-बार कुशलप्रश्न करके विश्वामित्रजीने राजाको बैठाय। उसी समय दोनों भाई आ पहुँचे, जो फुलवाई देखने गये थे ॥ २ ॥

स्याम गौर मृदु बयस किसोरा । लोचन सुखद बिस्व चित चोरा ॥

उठे सकल जब रघुपति आए । बिस्वामित्र निकट बैठए ॥

सुकुमार किशोर अवस्थावाले, श्याम और गौर वर्णके दोनों कुमार नेत्रोंको सुख देनेवाले और सारे विश्वके चित्तको चुरानेवाले हैं। जब रघुनाथजी आये तब सभी [उनके रूप एवं तेजसे प्रभावित होकर] उठकर खड़े हो गये। विश्वामित्रजीने उनको अपने पास बैठा लिया ॥ ३ ॥

भए सब सुखी देखि दोउ भ्राता । बारि बिलोचन पुलकित गाता ॥

मूरति मधुर मनोहर देखी । भयउ बिदेहु बिदेहु बिसेषी ॥

दोनों भाइयोंको देखकर सभी सुखी हुए। सबके नेत्रोंमें जल भर आया (आनन्द और प्रेमके आँसू उमड़ पड़े) और शरीर रोमाञ्चित हो उठे। रामजीकी मधुर मनोहर मूर्तिको देखकर विदेह (जनक) विशेषरूपसे विदेह (देहकी सुध-बुधसे रहित) हो गये ॥ ४ ॥

दो०— प्रेम मगन मनु जानि नृपु करि बिबेकु धरि धीर।

बोलेउ मुनि पद नाइ सिरु गदगद गिरा गभीर ॥ २१५ ॥

मनको प्रेममें मग्न जान राजा जनकने विवेकका आश्रय लेकर धीरज धारण किया और मुनिके चरणोंमें सिर नवाकर गद्द (प्रेमभरी) गम्भीर वाणीसे कहा— ॥ २१५ ॥

२१४

  • रामचरितमानस *

कहहु नाथ सुंदर दोउ बालक । मुनिकुल तिलक कि नृपकुलपालक ॥ ब्रह्म जो निगम नेति कहि गावा । उभय बेष धरि की सोड़ आवा ॥

हे नाथ! कहिये, ये दोनों सुन्दर बालक मुनिकुलके आभूषण हैं या किसी राजवंशके पालक? अथवा जिसका वेदोंने 'नेति' कहकर गान किया है कहीं वह ब्रह्म तो युगलरूप धरकर नहीं आया है? ॥ १ ॥

सहज बिरागरूप मनु मोरा । थकित होत जिमि चंद चकोरा ॥ ताते प्रभु पूछउँ सतिभाऊ । कहहु नाथ जनि करहु दुराऊ ॥

मेरा मन जो स्वभावसे ही वैराग्यरूप [बना हुआ] है, [इन्हें देखकर] इस तरह मुग्ध हो रहा है जैसे चन्द्रमाको देखकर चकोर। हे प्रभो! इसलिये मैं आपसे सत्य (निश्छल) भावसे पूछता हूँ। हे नाथ! बताइये, छिपाव न कीजिये ॥ २ ॥

इन्हहि बिलोकत अति अनुरागा । बरबस ब्रह्मसुखहि मन त्यागा ॥ कह मुनि बिहसि कहेहु नृप नीका । बचन तुम्हार न होड़ अलीका ॥

इनको देखते ही अत्यन्त प्रेमके वश होकर मेरे मनने जबर्दस्ती ब्रह्मसुखको त्याग दिया है। मुनिने हँसकर कहा—हे राजन्! आपने ठीक (यथार्थ ही) कहा। आपका वचन मिथ्या नहीं हो सकता ॥ ३ ॥

ये प्रिय सबहि जहाँ लगि प्रानी । मन मुसुकाहिं रामु सुनि बानी ॥ रघुकुल मनि दसरथ के जाए । मम हित लागि नरेस पठाए ॥

जगत्में जहाँतक (जितने भी) प्राणी हैं, ये सभीको प्रिय हैं। मुनिकी [रहस्यभरी] वाणी सुनकर श्रीरामजी मन-ही-मन मुसकराते हैं (हँसकर मानो संकेत करते हैं कि रहस्य खोलिये नहीं)। [तब मुनिने कहा—] ये रघुकुलमणि महाराज दशरथके पुत्र हैं। मेरे हितके लिये राजाने इन्हें मेरे साथ भेजा है ॥ ४ ॥

दो०— रामु लखनु दोउ बंधुबर रूप सील बल धाम ।

मख राखेउ सबु साखि जगु जिते असुर संग्राम ॥ २१६ ॥

ये राम और लक्ष्मण दोनों श्रेष्ठ भाई रूप, शील और बलके धाम हैं। सारा जगत् [इस बातका] साक्षी है कि इन्होंने युद्धमें असुरोंको जीतकर मेरे यज्ञकी रक्षा की है ॥ २१६ ॥

मुनि तव चरन देखि कह राऊ । कहि न सकउँ निज पुन्य प्रभाऊ ॥

सुंदर स्याम गौर दोउ भ्राता । आनंदहू के आनंद दाता ॥

राजाने कहा—हे मुनि! आपके चरणोंके दर्शन कर मैं अपना पुण्य-प्रभाव कह नहीं सकता। ये सुन्दर श्याम और गौर वर्णके दोनों भाई आनन्दको भी आनन्द देनेवाले हैं ॥ १ ॥

  • बालकाण्ड *

२१५

इन्ह कै प्रीति परसपर पावनि। कहि न जाइ मन भाव सुहावनि॥ सुनहु नाथ कह मुदित बिदेहू। ब्रह्म जीव इव सहज सनेहू॥

इनकी आपसकी प्रीति बड़ी पवित्र और सुहावनी है, वह मनको बहुत भाती है, पर [वाणीसे] कही नहीं जा सकती। विदेह (जनकजी) आनन्दित होकर कहते हैं—हे नाथ! सुनिये, ब्रह्म और जीवकी तरह इनमें स्वाभाविक प्रेम है ॥ २ ॥

पुनि पुनि प्रभुहि चितव नरनाहू। पुलक गात उर अधिक उछाहू॥ मुनिहि प्रसंसि नाइ पद सीसू। चलेउ लवाइ नगर अवनीसू॥

राजा बार-बार प्रभुको देखते हैं (दृष्टि वहाँसे हटना ही नहीं चाहती)। [प्रेमसे] शरीर पुलकित हो रहा है और हृदयमें बड़ा उत्साह है। [फिर] मुनिकी प्रशंसा करके और उनके चरणोंमें सिर नवाकर राजा उन्हें नगरमें लिवा चले ॥ ३ ॥

सुंदर सदनु सुखद सब काला। तहाँ बासु लै दीन्ह भुआला॥ करि पूजा सब बिधि सेवकाई। गयउ राउ गृह बिदा कराई॥

एक सुन्दर महल जो सब समय (सभी ऋतुओंमें) सुखदायक था, वहाँ राजाने उन्हें ले जाकर ठहराया। तदनन्तर सब प्रकारसे पूजा और सेवा करके राजा विदा माँगकर अपने घर गये ॥ ४ ॥

दो०—रिषय संग रघुबंस मनि करि भोजनु बिश्रामु।

बैठे प्रभु भ्राता सहित दिवसु रहा भरि जामु॥ २१७॥

रघुकुलके शिरोमणि प्रभु श्रीरामचन्द्रजी ऋषियोंके साथ भोजन और विश्राम करके भाई लक्ष्मणसमेत बैठे। उस समय पहरभर दिन रह गया था ॥ २१७ ॥

लखन हृदयँ लालसा बिसेषी। जाइ जनकपुर आइअ देखी॥ प्रभु भय बहुरि मुनिहि सकुचाहीं। प्रगट न कहहिं मनहिं मुसुकाहीं॥

लक्ष्मणजीके हृदयमें विशेष लालसा है कि जाकर जनकपुर देख आवें। परन्तु प्रभु श्रीरामचन्द्रजीका डर है और फिर मुनिसे भी सकुचाते हैं। इसलिये प्रकटमें कुछ नहीं कहते; मन-ही-मन मुसकरा रहे हैं ॥ १ ॥

राम अनुज मन की गति जानी। भगत बछलता हियँ हुलसानी॥ परम बिनीत सकुचि मुसुकाई। बोले गुर अनुसासन पाई॥

[अन्तर्यामी] श्रीरामचन्द्रजीने छोटे भाईके मनकी दशा जान ली, [तब] उनके हृदयमें भक्तवत्सलता उमड़ आयी। वे गुरुकी आज्ञा पाकर बहुत ही विनयके साथ सकुचाते हुए मुसकराकर बोले— ॥ २ ॥

२१६

  • रामचरितमानस *

नाथ लखनु पुरु देखन चहहीं । प्रभु सकोच डर प्रगट न कहहीं ॥ जौं राउर आयसु मैं पावौं । नगर देखाइ तुरत लै आवौं ॥

हे नाथ! लक्ष्मण नगर देखना चाहते हैं, किन्तु प्रभु (आप) के डर और संकोचके कारण स्पष्ट नहीं कहते। यदि आपकी आज्ञा पाऊँ, तो मैं इनको नगर दिखलाकर तुरंत ही [वापस] ले आऊँ ॥ ३ ॥

सुनि मुनीसु कह बचन सप्रौती । कस न राम तुम्ह राखहु नीती ॥ धरम सेतु पालक तुम्ह ताता । प्रेम बिबस सेवक सुखदाता ॥

यह सुनकर मुनीश्वर विश्वामित्रजीने प्रेमसहित वचन कहे—हे राम! तुम नीतिकी रक्षा कैसे न करोगे; हे तात! तुम धर्मकी मर्यादाका पालन करनेवाले और प्रेमके वशीभूत होकर सेवकोंको सुख देनेवाले हो ॥ ४ ॥

दो०—जाइ देखि आवहु नगरु सुख निधान दोउ भाइ।

करहु सुफल सब के नयन सुंदर बदन देखाइ ॥ २१८ ॥

सुखके निधान दोनों भाई जाकर नगर देख आओ। अपने सुन्दर मुख दिखलाकर सब [नगर-निवासियों] के नेत्रोंको सफल करो ॥ २१८ ॥

मुनि पद कमल बंदि दोउ भ्राता । चले लोक लोचन सुख दाता ॥ बालक बृंद देखि अति सोभा । लगे संग लोचन मनु लोभा ॥

सब लोकोंके नेत्रोंको सुख देनेवाले दोनों भाई मुनिके चरणकमलोंकी वन्दना करके चले। बालकोंके झुंड इन [के सौन्दर्य] की अत्यन्त शोभा देखकर साथ लग गये। उनके नेत्र और मन [इनकी माधुरीपर] लुभा गये ॥ १ ॥

पीत बसन परिकर कटि भाथा । चारु चाप सर सोहत हाथा ॥ तन अनुहरत सुचंदन खोरी । स्यामल गौर मनोहर जोरी ॥

[दोनों भाइयोंके] पीले रंगके वस्त्र हैं, कमरके [पीले] दुपट्टोंमें तरकस बँधे हैं। हाथोंमें सुन्दर धनुष-बाण सुशोभित हैं। [श्याम और गौर वर्णके] शरीरोंके अनुकूल (अर्थात् जिसपर जिस रंगका चन्दन अधिक फबे उसपर उसी रंगके) सुन्दर चन्दनकी खौर लगी है। साँवरे और गोरे [रंग] की मनोहर जोड़ी है ॥ २ ॥

केहरि कंधर बाहु बिसाला । उर अति रुचिर नागमनि माला ॥ सुभग सोन सरसीरुह लोचन । बदन मयंक तापत्रय मोचन ॥

सिंहके समान (पुष्ट) गर्दन (गलेका पिछला भाग) है; विशाल भुजाएँ हैं। [चौड़ी] छातीपर अत्यन्त सुन्दर गजमुकाकी माला है। सुन्दर लाल कमलके समान नेत्र हैं। तीनों तापोंसे छुड़ानेवाला चन्द्रमाके समान मुख है ॥ ३ ॥

  • बालकाण्ड *

२१७

कानन्हि कनक फूल छबि देहीं । चितवत चितहि चोरि जनु लेहीं ॥ चितवनि चारु भूकृटि बर बाँकी । तिलक रेख सोभा जनु चाँकी ॥

कानोंमें सोनेके कर्णफूल [अत्यन्त] शोभा दे रहे हैं और देखते ही [देखनेवालेके] चितको मानो चुरा लेते हैं। उनकी चितवन (दृष्टि) बड़ी मनोहर है और भीहें तिरछी एवं सुन्दर हैं। [माथेपर] तिलककी रेखाएँ ऐसी सुन्दर हैं मानो [मूर्तिमती] शोभापर मुहर लगा दी गयी हैं ॥ ४ ॥

दो०— रुचिर चौतनीं सुभग सिर मेचक कुंचित केस।

नख सिख सुंदर बंधु दोउ सोभा सकल सुदेस ॥ २१९ ॥

सिरपर सुन्दर चौकोनी टोपियाँ [दिये] हैं, काले और घुँघराले बाल हैं। दोनों भाई नखसे लेकर शिखातक (एडीसे चौटीतक) सुन्दर हैं और सारी शोभा जहाँ जैसी चाहिये वैसी ही है ॥ २१९ ॥

देखन नगर भूपसुत आए। समाचार पुरबासिन्ह पाए ॥ धाए धाम काम सब त्यागी। मनहुँ रंक निधि लूटन लागी ॥

जब पुरवासियोंने यह समाचार पाया कि दोनों राजकुमार नगर देखनेके लिये आये हैं, तब वे सब घर-बार और सब काम-काज छोड़कर ऐसे दौड़े मानो दरिद्री [धनका] खजाना लूटने दौड़े हों ॥ १ ॥

निरखि सहज सुंदर दोउ भाई। होहिं सुखी लोचन फल पाई ॥ जुबतीं भवन झरोखन्हि लागीं। निरखहिं राम रूप अनुरागीं ॥

स्वभावहीसे सुन्दर दोनों भाइयोंको देखकर वे लोग नेत्रोंका फल पाकर सुखी हो रहे हैं। युवती स्त्रियाँ घरके झरोखोंसे लगी हुई प्रेमसहित श्रीरामचन्द्रजीके रूपको देख रही हैं ॥ २ ॥

कहहिं परसपर बचन सप्रीती। सखि इन्ह कोटि काम छबि जीती ॥ सुर नर असुर नाग मुनि माहीं। सोभा असि कहुँ सुनिअति नाहीं ॥

वे आपसमें बड़े प्रेमसे बातें कर रही हैं—हे सखी! इन्होंने करोड़ों कामदेवोंकी छबिको जीत लिया है। देवता, मनुष्य, असुर, नाग और मुनियोंमें ऐसी शोभा तो कहीं सुननेमें भी नहीं आती ॥ ३ ॥

बिष्णु चारि भुज बिधि मुख चारी। बिकट बेष मुख पंच पुरारी ॥ अपर देउ अस कोउ न आही। यह छबि सखी पटतरिअ जाही ॥

भगवान् विष्णुके चार भुजाएँ हैं, ब्रह्माजीके चार मुख हैं, शिवजीका विकट (भयानक) वेष है और उनके पाँच मुँह हैं। हे सखी! दूसरा देवता भी कोई ऐसा नहीं है जिसके साथ इस छबिकी उपमा दी जाय ॥ ४ ॥

२१८

  • रामचरितमानस *

दो०—बय किसोर सुषमा सदन स्याम गौर सुख धाम।

अंग अंग पर वारिअहिं कोटि कोटि सत काम ॥ २२० ॥

इनकी किशोर अवस्था है, ये सुन्दरताके घर, साँवले और गोरे रंगके तथा सुखके धाम हैं। इनके अङ्ग-अङ्गपर करोड़ों-अरबों कामदेवोंको निछावर कर देना चाहिये ॥ २२० ॥

कहहु सखी अस को तनुधारी । जो न मोह यह रूप निहारी ॥ कोउ सप्रेम बोली मृदु बानी । जो मैं सुना सो सुनहु सयानी ॥

हे सखी! [भला] कहो तो ऐसा कौन शरीरधारी होगा जो इस रूपको देखकर मोहित न हो जाय (अर्थात् यह रूप जड़-चेतन सबको मोहित करनेवाला है)। [तब] कोई दूसरी सखी प्रेमसहित कोमल वाणीसे बोली—हे सयानी! मैंने जो सुना है उसे सुनो—॥ १ ॥

ए दोऊ दसरथ के ढोटा । बाल मरालन्हि के कल जोटा ॥ मुनि कौसिक मख के रखवारे । जिन्ह रन अजिर निसाचर मारे ॥

ये दोनों [राजकुमार] महाराज दशरथजीके पुत्र हैं। बाल राजहंसोंका-सा सुन्दर जोड़ा है। ये मुनि विश्वामित्रके यज्ञकी रक्षा करनेवाले हैं, इन्होंने युद्धके मैदानमें राक्षसोंको मारा है ॥ २ ॥

स्याम गात कल कंज बिलोचन । जो मारीच सुभुज मदु मोचन ॥ कौसल्या सुत सो सुख खानी । नामु रामु धनु सायक पानी ॥

जिनका श्याम शरीर और सुन्दर कमल-जैसे नेत्र हैं, जो मारीच और सुबाहुके मदको चूर करनेवाले और सुखकी खान हैं और जो हाथमें धनुष-बाण लिये हुए हैं, वे कौसल्याजीके पुत्र हैं; इनका नाम राम है ॥ ३ ॥

गौर किसोर बेषु बर काछें । कर सर चाप राम के पाछें ॥ लछिमनु नामु राम लघु भ्राता । सुनु सखि तासु सुमित्रा माता ॥

जिनका रंग गौरा और किशोर अवस्था है और जो सुन्दर वेष बनाये और हाथमें धनुष-बाण लिये श्रीरामजीके पीछे-पीछे चल रहे हैं, वे इनके छोटे भाई हैं; उनका नाम लक्ष्मण है। हे सखी! सुनो, उनकी माता सुमित्रा हैं ॥ ४ ॥

दो०—बिप्रकाजु करि बंधु दोउ मग मुनिबधू उधारि।

आए देखन चापमख मुनि हरषीं सब नारि ॥ २२१ ॥

दोनों भाई ब्राह्मण विश्वामित्रका काम करके और रास्तेमें मुनि गौतमकी स्त्री अहल्याका उद्धार करके यहाँ धनुषयज्ञ देखने आये हैं। यह सुनकर सब स्त्रियाँ प्रसन्न हुईं ॥ २२१ ॥

  • बालकाण्ड *

२१९

देखि राम छबि कोउ एक कहई। जोगु जानकिहि यह बरु अहई॥ जौँ सखि इन्हहि देख नरनाहू। पन परिहरि हठि करइ बिबाहू॥

श्रीरामचन्द्रजीकी छबि देखकर कोई एक (दूसरी सखी) कहने लगी—यह वर जानकीके योग्य है। हे सखी! यदि कहीं राजा इन्हें देख ले, तो प्रतिज्ञा छोड़कर हठपूर्वक इन्हींसे विवाह कर देगा ॥ १ ॥

कोउ कह ए भूपति पहिचाने। मुनि समेत सादर सनमाने॥ सखि परंतु पनु राउ न तजई। बिधि बस हठि अबिबेकहि भजई॥

किसीने कहा—राजाने इन्हें पहचान लिया है और मुनिके सहित इनका आदरपूर्वक सम्मान किया है। परन्तु हे सखी! राजा अपना प्रण नहीं छोड़ता। वह होनहारके वशीभूत होकर हठपूर्वक अविवेकका ही आश्रय लिये हुए है (प्रणपर अड़े रहनेकी मूर्खता नहीं छोड़ता) ॥ २ ॥

कोउ कह जौँ भल अहड़ बिधाता। सब कहँ सुनिअ उचित फलदाता॥ तौ जानकिहि मिलिहि बरु एहू। नाहिन आलि इहाँ संदेहू॥

कोई कहती है—यदि विधाता भले हैं और सुना जाता है कि वे सबको उचित फल देते हैं, तो जानकीजीको यही वर मिलेगा। हे सखी! इसमें सन्देह नहीं है ॥ ३ ॥

जौँ बिधि बस अस बने सँजोगू। तौ कृतकृत्य होइ सब लोगू॥ सखि हमरें आरति अति तातें। कबहुँक ए आवहिँ एहि नातें॥

जो दैवयोगसे ऐसा संयोग बन जाय, तो हम सब लोग कृतार्थ हो जायें। हे सखी! मेरे तो इसीसे इतनी अधिक आतुरता हो रही है कि इसी नाते कभी ये यहाँ आवेंगे ॥ ४ ॥

दो०—नाहिं त हम कहँ सुनहु सखि इन्ह कर दरसनु दूरि। यह संघटु तब होइ जब पुन्य पुराकृत भूरि॥ २२२॥

नहीं तो (विवाह न हुआ तो) हे सखी! सुनो, हमको इनके दर्शन दुर्लभ हैं। यह संयोग तभी हो सकता है जब हमारे पूर्वजन्मोंके बहुत पुण्य हों ॥ २२२ ॥

बोली अपर कहेहु सखि नीका। एहिं बिआह अति हित सबही का॥ कोउ कह संकर चाप कठोरा। ए स्यामल मृदु गात किसोरा॥

दूसरीने कहा—हे सखी! तुमने बहुत अच्छा कहा। इस विवाहसे सभीका परम हित है। किसीने कहा—शङ्करजीका धनुष कठोर है और ये साँवले राजकुमार कोमल शरीरके बालक हैं ॥ १ ॥

सबु असमंजस अहड़ सयानी। यह सुनि अपर कहड़ मृदु बानी॥ सखि इन्ह कहँ कोउ कोउ अस कहहीं। बड़ प्रभाउ देखत लघु अहहीं॥