भारतकोश
श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1003

अथ द्वादशोऽध्यायः रहूगणका प्रश्न और भरतजीका समाधान

रहूगण उवाच

नमो नमः कारणविग्रहाय स्वरूपतुच्छीकृतविग्रहाय । नमोऽवधूत द्विजबन्धुलिङ्ग- निगूढनित्यानुभवाय तुभ्यम् ।।१

ज्वरामयार्तस्य यथागदं सत् निदाघदग्धस्य यथा हिमाम्भः । कुदेहमानाहिविदष्टदृष्टे- र्ब्रह्मन् वचस्तेऽमृतमौषधं मे ।।२

तस्माद्भवन्तं मम संशयार्थं प्रक्ष्यामि पश्चादधुना सुबोधम् । अध्यात्मयोगग्रथितं तवोक्त- माख्याहि कौतूहलचेतसो मे ।।३

यदाह योगेश्वर दृश्यमानं क्रियाफलं सद्व्यवहारमूलम् । न ह्यञ्जसा तत्त्वविमर्शनाय भवानमुष्मिन् भ्रमते मनो मे ।।४

ब्राह्मण उवाच

अयं जनो नाम चलन् पृथिव्यां यः पार्थिवः पार्थिव कस्य हेतोः । तस्यापि चाङ्‌घ्योरधि गुल्फजङ्घा- जानूरुमध्योरशिरोधरांसाः ।।५

राजा रहूगणने कहा—भगवन्! मैं आपको नमस्कार करता हूँ। आपने जगत्‌का उद्धार करनेके लिये ही यह देह धारण की है। योगेश्वर! अपने परमानन्दमय स्वरूपका अनुभव करके आप इस स्थूलशरीरसे उदासीन हो गये हैं तथा एक जड ब्राह्मणके वेषसे अपने नित्यज्ञानमय स्वरूपको जनसाधारणकी दृष्टिसे ओझल किये हुए हैं। मैं आपको बार-बार

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