श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनमस्कार करता हूँ ॥१॥ ब्रह्मन्! जिस प्रकार ज्वरसे पीड़ित रोगीके लिये मीठी ओषधि और धूपसे तपे हुए पुरुषके लिये शीतल जल अमृततुल्य होता है, उसी प्रकार मेरे लिये, जिसकी विवेकबुद्धिको देहाभिमानरूप विषैले सर्पने डस लिया है, आपके वचन अमृतमय ओषधिके समान हैं ॥२॥ देव! मैं आपसे अपने संशयोंकी निवृत्ति तो पीछे कराऊँगा। पहले तो इस समय आपने जो अध्यात्म-योगमय उपदेश दिया है, उसीको सरल करके समझाइये, उसे समझनेकी मुझे बड़ी उत्कण्ठा है ॥३॥
योगेश्वर! आपने जो यह कहा कि भार उठानेकी क्रिया तथा उससे जो श्रमरूप फल होता है, वे दोनों ही प्रत्यक्ष होनेपर भी केवल व्यवहारमूलके ही हैं, वास्तवमें सत्य नहीं है—वे तत्त्वविचारके सामने कुछ भी नहीं ठहरते—सो इस विषयमें मेरा मन चक्कर खा रहा है, आपके इस कथनका मर्म मेरी समझमें नहीं आ रहा है ॥४॥
जड़भरतने कहा—पृथ्वीपते! यह देह पृथ्वीका विकार है, पाषाणादिसे इसका क्या भेद है? जब यह किसी कारणसे पृथ्वीपर चलने लगता है, तब इसके भारवाही आदि नाम पड़ जाते हैं। इसके दो चरण हैं; उनके ऊपर क्रमशः टखने, पिंडली, घुटने, जाँघ, कमर, वक्षःस्थल, गर्दन और कंधे आदि अंग हैं ॥५॥
अंसेऽधि दार्वी शिबिका च यस्यां सौवीरराजेत्यपदेश आस्ते । यस्मिन् भवान् रूढनिजाभिमानो राजास्मि सिन्धुष्विति दुर्मदान्धः ॥६
शोच्यानिमांस्त्वमधिकष्टदीनान् विष्ट्या निगृह्णन्निरनुग्रहोऽसि । जनस्य गोप्तास्मि विकत्थमानो न शोभसे वृद्धसभासु धृष्टः ॥७
यदा क्षितावेव चराचरस्य विदाम निष्ठां प्रभवं च नित्यम् । तन्नामतोऽन्यद् व्यवहारमूलं निरूप्यतां सत् क्रिययानुमेयम् ॥८
एवं निरुक्तं क्षितिशब्दवृत्त- मसन्निधानात्परमाणवो ये । अविद्यया मनसा कल्पितास्ते येषां समूहेन कृतो विशेषः ॥९
एवं कृशं स्थूलमणुर्बृहद्यद् असच्च सज्जीवमजीवमन्यत् । द्रव्यस्वभावाशयकालकर्म
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