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श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1083

महाभोगिनो महामर्षा४ निवसन्ति येषामु ह वै पञ्चसप्तदशशतसहस्रशीर्षाणां फणासु

विरचिता महामणयो रोचिष्णवः पातालविवरतिमिरनिकरं स्वरोचिषा

विधमन्ति ।।३१।।

उसके नीचे महातलमें कद्रूसे उत्पन्न हुए अनेक सिरोंवाले सर्पोंका क्रोधवश नामक एक

समुदाय रहता है। उनमें कुहक, तक्षक, कालिय और सुषेण आदि प्रधान हैं। उनके बड़े-बड़े

फन हैं। वे सदा भगवान्‌के वाहन पक्षिराज गरुडजीसे डरते रहते हैं; तो भी कभी-कभी अपने

स्त्री, पुत्र, मित्र और कुटुम्बके संगसे प्रमत्त होकर विहार करने लगते हैं ।।२९।।

उसके नीचे रसातलमें पणि नामके दैत्य और दानव रहते हैं। ये निवातकवच, कालेय

और हिरण्यपुरवासी भी कहलाते हैं। इनका देवताओंसे विरोध है। ये जन्मसे ही बड़े बलवान्

और महान् साहसी होते हैं। किन्तु जिनका प्रभाव सम्पूर्ण लोकोंमें फैला हुआ है, उन श्रीहरिके

तेजसे बलाभिमान चूर्ण हो जानेके कारण ये सर्पोंके समान लुक-छिपकर रहते हैं तथा इन्द्रकी

दूती सरमाके कहे हुए मन्त्रवर्णरूप* वाक्यके कारण सर्वदा इन्द्रसे डरते रहते हैं ।।३०।।

रसातलके नीचे पाताल है। वहाँ शंख, कुलिक, महाशंख, श्वेत, धनंजय, धृतराष्ट्र,

शंखचूड़, कम्बल, अश्वतर और देवदत्त आदि बड़े क्रोधी और बड़े-बड़े फनोंवाले नाग रहते हैं।

इनमें वासुकि प्रधान हैं। उनमेंसे किसीके पाँच, किसीके सात, किसीके दस, किसीके सौ और

किसीके हजार सिर हैं। उनके फनोंकी चमकती हुई मणियाँ अपने प्रकाशसे पाताल-लोकका

सारा अन्धकार नष्ट कर देती हैं ।।३१।।

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे

राह्वादिस्थितिबिल्स्वर्गमर्यादा निरूपणं नाम चतुर्विंशोऽध्यायः ।।२४।।

१. प्रा० पा०—पारिषदभू०। २. प्रा० पा०—भूय। ३. प्रा० पा०—तयोर्वीर्येण ।

  • ‘आचतुर्थाद्भवेत्स्रावः पात: पंचमषष्ठयोः’ अर्थात् चौथे मासतक जो गर्भ गिरता है,

उसे ‘गर्भस्राव’ कहते हैं तथा पाँचवें और छठे मासमें गिरनेसे वह ‘गर्भपात’ कहलाता है।

१. प्रा० पा०—परिक्षिप्तस्वर्लोकतयो। २. प्रा० पा०—यद्योतत्साक्षात्कारो। ३. प्रा० पा०

—ऽन्यथेवेहोप०।

१. प्रा० पा०—मन्त्राय एकान्ततो वृतो बृह०। २. प्रा० पा०—हायोपेन्द्रेणात्मान् माशिषो

नो एव तदनुदास्यमति०। ३. प्रा० पा०—ग्रहमुपजि०। ४. प्रा० पा०—मुत्तरस्माद्विस्तरिष्यते

यद्भगवान्। ५. प्रा० पा०—त्रिपुरारिणा त्रिलोक्यर्थं। ६. प्रा० पा०—मायानामाचार्यो।

१. प्रा० पा०—मुद्विग्नमनसा स्वक० ।

२. प्रा० पा०—हरेरिव ।

३. प्रा० पा०—हतावलेपा बिलशया इव वसन्ति ये वै सुरमये० ।

४. प्रा० पा०—मर्षाः सन्ति ।

  • एक कथा आती है कि जब पणि नामक दैत्योंने पृथ्वीको रसातलमें छिपा लिया, तब

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