भारतकोश
श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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अपने कुण्डलकान्तिमण्डित कमनीय कपोलोंवाले मनोहर मुखारविन्दोंकी मनमोहिनी झाँकी

होती है और उनका मन आनन्दसे भर जाता है ।।४।। अनेकों नागराजोंकी कन्याएँ विविध

कामनाओंसे उनके अंगमण्डलपर चाँदीके खम्भोंके समान सुशोभित उनकी वलयविलसित

लंबी-लंबी श्वेतवर्ण सुन्दर भुजाओंपर अरगजा, चन्दन और कुंकुमपंकका लेप करती हैं। उस

समय अंगस्पर्शसे मथित हुए उनके हृदयमें कामका संचार हो जाता है। तब वे उनके

मदविह्वल सकरुण अरुण नयनकमलोंसे सुशोभित तथा प्रेममदसे मुदित मुखारविन्दकी ओर

मधुर मनोहर मुसकानके साथ सलज्जभावसे निहारने लगती हैं ।।५।। वे अनन्त गुणोंके

सागर आदिदेव भगवान् अनन्त अपने अमर्ष (असहनशीलता) और रोषके वेगको रोके हुए

वहाँ समस्त लोकोंके कल्याणके लिये विराजमान हैं ।।६।।

स एव भगवाननन्तोऽनन्तगुणार्णव आदिदेव उपसंहतामर्षरोषवेगो लोकानां

स्वस्तय आस्ते ।।६।।

ध्यायमानः सुरासुरोरगसिद्धगन्धर्वविद्याधर-

मुनिगणैरनवरतमदमुदितविकृतविह्वललोचनः सुललितमुखरिकामृतेनाप्यायमानः

स्वपार्षद-विबुधयूथपतीनपरम्लानरागनवतुलसिका-मोदमध्वासवेन

माद्यन्मधुकरव्रातमधुरगीतश्रियं वैजयन्तीं स्वां वनमालां नीलवासा एककुण्डलो

हलककुदि कृतसुभगसुन्दरभुजो भगवान्माहेन्द्रो वारणेन्द्र इव काञ्चनीं

कक्षामुदारलीलो बिभर्ति ।।७।।

य एष एवमनुश्रुतो१ ध्यायमानो मुमुक्षू-

णामनादिकालकर्मवासनाग्रथितमविद्यामयं२ हृदयग्रन्थिं सत्त्वरजस्तमोमयमन्तर्हृदयं

गत आशु निर्भिनत्ति तस्यानुभावान्३ भगवान् स्वायम्भुवो नारदः सह तुम्बुरुणा

सभायां ब्रह्मणः संश्लोकयामास ।।८।।

उत्पत्तिस्थितिलयहेतवोऽस्य कल्पाः

सत्त्वाद्याः प्रकृतिगुणा यदीक्षयाऽऽसन् ।

यद्रूपं ध्रुवमकृतं यदेकमात्मन्

नानाधात्कथमु ह वेद तस्य वर्त्म ।।९

देवता, असुर, नाग, सिद्ध, गन्धर्व, विद्याधर और मुनिगण भगवान् अनन्तका ध्यान

किया करते हैं। उनके नेत्र निरन्तर प्रेममदसे मुदित, चंचल और विह्वल रहते हैं। वे सुललित

वचनामृतसे अपने पार्षद और देवयूथपोंको सन्तुष्ट करते रहते हैं। उनके अंगपर नीलाम्बर

और कानोंमें केवल एक कुण्डल जगमगाता रहता है तथा उनका सुभग और सुन्दर हाथ

हलकी मूठपर रखा रहता है। वे उदारलीलामय भगवान् संकर्षण गलेमें वैजयन्ती माला धारण

किये रहते हैं, जो साक्षात् इन्द्रके हाथी ऐरावतके गलेमें पड़ी हुई सुवर्णकी शृंखलाके समान

जान पड़ती है। जिसकी कान्ति कभी फीकी नहीं पड़ती, ऐसी नवीन तुलसीकी गन्ध और

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