भारतकोश
श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,617 पृष्ठ

पृष्ठ 1085, कुल 1617 में से

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पृष्ठ 1085

अथ पञ्चविंशोऽध्यायः श्रीसङ्कर्षणदेवका विवरण और स्तुति

श्रीशुक उवाच

तस्य मूलदेशे त्रिंशद्योजनसहस्रान्तर आस्ते या वै कला भगवतस्तामसी समाख्या- तानन्त इति सात्वतीया द्रष्टृदृश्ययोः सङ्कर्षणमहमित्यभिमानलक्षणं यं सङ्कर्षण- मित्याचक्षते ॥१॥

यस्येदं क्षितिमण्डलं भगवतोऽनन्तमूर्तेः सहस्रशिरस एकस्मिन्नेव शीर्षणि ध्रियमाणं सिद्धार्थ इव लक्ष्यते ॥२॥ यस्य ह वा इदं कालेनोपसंजिहीर्षतोऽमर्षविरचितरुचिर-भ्रमद्भ्रुवोरन्तरेण साङ्कर्षणो नाम रुद्र एकादशव्यूहस्त्र्यक्षस्त्रिशिखं शूलमुत्तम्भयन् उदतिष्ठत् ॥३॥

यस्याङ्घ्रिकमलयुगलारुण-विशदनखमणिषण्डमण्डलेष्वहिपतयः सह सात्वतर्षभैरेकान्तभक्तियोगेनावनमन्तः स्व-वदनानि परिस्फुरत्कुण्डलप्रभामण्डित- गण्डस्थलान्यतिमनोहराणि प्रमुदितमनसः खलु विलोकयन्ति ॥४॥

यस्यैव हि नागराजकुमार्य आशिष आशासाना-श्चार्वाङ्गवलयविलसितविशदविपुलधवल- सुभगरुचिरभुजरजतस्तम्भेष्वगुरुचन्दनकुङ्कुम- पङ्कानुलेपेनावलिम्पमानास्तदभिमर्शनोन्मथित हृदयमकरध्वजावेशरुचिरललितस्मितास्तद- नुरागमदमुदितमदविघूर्णितारुणकरुणावलोक-नयनवदनारविन्दं सव्रीडं किल विलोकयन्ति ॥५॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—राजन्! पाताललोकके नीचे तीस हजार योजनकी दूरीपर अनन्त नामसे विख्यात भगवान्‌की तामसी नित्य कला है। यह अहंकाररूपा होनेसे द्रष्टा और दृश्यको खींचकर एक कर देती है, इसलिये पांचरात्र आगमके अनुयायी भक्तजन इसे ‘संकर्षण’ कहते हैं ॥१॥

इन भगवान् अनन्तके एक हजार मस्तक हैं। उनमेंसे एकपर रखा हुआ यह सारा भूमण्डल सरसोंके दानेके समान दिखायी देता है ॥२॥

प्रलयकाल उपस्थित होनेपर जब इन्हें इस विश्वका उपसंहार करनेकी इच्छा होती है, तब इनकी क्रोधवश घूमती हुई मनोहर भ्रुकुटियोंके मध्यभागसे संकर्षण नामक रुद्र प्रकट होते हैं। उनकी व्यूहसंख्या ग्यारह है। वे सभी तीन नेत्रोंवाले होते हैं और हाथमें तीन नोकोंवाले शूल लिये रहते हैं ॥३॥ भगवान् संकर्षणके चरणकमलोंके गोल-गोल स्वच्छ और अरुणवर्ण नख मणियोंकी पंक्तिके समान देदीप्यमान हैं। जब अन्य प्रधान-प्रधान भक्तोंके सहित अनेकों नागराज अनन्य भक्तिभावसे उन्हें प्रणाम करते हैं, तब उन्हें उन नखमणियोंमें

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श्रीमद्भागवत महापुराण · पृष्ठ 1085, कुल 1617 में से · BharatKosha