श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनिःश्रेयसे भागवतं पुराणं जातं कुतो योगविदादिसूचकम् ।।५३
सूत उवाच
यदा कृष्णो धरां त्यक्त्वा स्वपदं गन्तुमुद्यतः । एकादशं परिश्रुत्याप्युद्धवो वाक्यमब्रवीत् ।।५४
उद्धव उवाच
त्वं तु यास्यसि गोविन्द भक्तकार्यं विधाय च । मच्चित्ते महती चिन्ता तां श्रुत्वा सुखमावह ।।५५
शौनकजीने पूछा—सूतजी! यह तो आपने बड़े आश्चर्यकी बात कही। अवश्य ही यह भागवतपुराण योगवेत्ता ब्रह्माजीके भी आदिकारण श्रीनारायणका निरूपण करता है; परन्तु यह मोक्षकी प्राप्तिमें ज्ञानादि सभी साधनोंका तिरस्कार करके इस युगमें उनसे भी कैसे बढ़ गया? ।।५३।।
सूतजीने कहा—शौनकजी! जब भगवान् श्रीकृष्ण इस धराधामको छोड़कर अपने नित्यधामको जाने लगे, तब उनके मुखारविन्दसे एकादश स्कन्धका ज्ञानोपदेश सुनकर भी उद्धवजीने पूछा ।।५४।।
उद्धवजी बोले—गोविन्द! अब आप तो अपने भक्तोंका कार्य करके परमधामको पधारना चाहते हैं; किन्तु मेरे मनमें एक बड़ी चिन्ता है। उसे सुनकर आप मुझे शान्त कीजिये ।।५५।। अब घोर कलिकाल आया ही समझिये, इसलिये संसारमें फिर अनेकों दुष्ट प्रकट हो जायँगे; उनके संसर्गसे जब अनेकों सत्पुरुष भी उग्र प्रकृतिके हो जायँगे, तब उनके भारसे दबकर यह गोरूपिणी पृथ्वी किसकी शरणमें जायगी? कमलनयन! मुझे तो आपको छोड़कर इसकी रक्षा करनेवाला कोई दूसरा नहीं दिखायी देता ।।५६-५७।। इसलिये भक्तवत्सल! आप साधुओंपर कृपा करके यहाँसे मत जाइये। भगवन्! आपने निराकार और चिन्मात्र होकर भी भक्तोंके लिये ही तो यह सगुण रूप धारण किया है ।।५८।। फिर भला, आपका वियोग होनेपर वे भक्तजन पृथ्वीपर कैसे रह सकेंगे? निर्गुणोपासनामें तो बड़ा कष्ट है। इसलिये कुछ और विचार कीजिये ।।५९।।
आगतोऽयं कलिर्घोरो भविष्यन्ति पुनः खलाः । तत्सङ्गेनैव सन्तोऽपि गमिष्यन्त्युग्रतां यदा ।।५६ तदा भारवती भूमिर्गोरूपेयं कमाश्रयेत् । अन्यो न दृश्यते त्राता त्वत्तः कमललोचन ।।५७