भारतकोश
श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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अतः सत्सु दयां कृत्वा भक्तवत्सल मा व्रज । भक्तार्थं सगुणो जातो निराकारोऽपि चिन्मयः ॥५८ त्वद्वियोगेन ते भक्ताः कथं स्थास्यन्ति भूतले । निर्गुणोपासने कष्टमतः किञ्चिद्विचारय ॥५९ इत्युद्धववचः श्रुत्वा प्रभासेऽचिन्तयद्धरिः । भक्तावलम्बनार्थाय किं विधेयं मयेति च ॥६० स्वकीयं यद्भवेत्तेजस्तच्च भागवतेऽदधात् । तिरोधाय प्रविष्टोऽयं श्रीमद्भागवतार्णवम् ॥६१ तेनेयं वाङ्मयी मूर्तिः प्रत्यक्षा वर्तते हरेः । सेवनाच्छ्रवणात्पाठाद्दर्शनात्पापनाशिनी ॥६२ सप्ताहश्रवणं तेन सर्वेभ्योऽप्यधिकं कृतम् । साधनानि तिरस्कृत्य कलौ धर्मोऽयमीरितः ॥६३ दुःखदारिद्रयदौर्भाग्यपापप्रक्षालनाय च । कामक्रोधजयार्थं हि कलौ धर्मोऽयमीरितः ॥६४ अन्यथा वैष्णवी माया देवैरपि सुदुस्त्यजा । कथं त्याज्या भवेत्पुम्भिः सप्ताहोऽतः प्रकीर्तितः ॥६५

सूत उवाच

एवं नगाहश्रवणोरुधर्मे प्रकाश्यमाने ऋषिभिः सभायाम् । आश्चर्यमेकं समभूत्तदानीं तदुच्यते संशृणु शौनक त्वम् ॥६६

प्रभासक्षेत्रमें उद्धवजीके ये वचन सुनकर भगवान् सोचने लगे कि भक्तोंके अवलम्बके लिये मुझे क्या व्यवस्था करनी चाहिये ॥६०॥ शौनकजी! तब भगवान्‌ने अपनी सारी शक्ति भागवतमें रख दी; वे अन्तर्धान होकर इस भागवतसमुद्रमें प्रवेश कर गये ॥६१॥ इसलिये यह भगवान्‌की साक्षात् शब्दमयी मूर्ति है। इसके सेवन, श्रवण, पाठ अथवा दर्शनसे ही मनुष्यके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं ॥६२॥ इसीसे इसका सप्ताहश्रवण सबसे बढ़कर माना गया है और कलियुगमें तो अन्य सब साधनोंको छोड़कर यही प्रधान धर्म बताया गया है ॥६३॥ कलिकालमें यही ऐसा धर्म है, जो दुःख, दरिद्रता, दुर्भाग्य और पापोंकी सफाई कर देता है तथा काम-क्रोधादि शत्रुओंपर विजय दिलाता है ॥६४॥ अन्यथा, भगवान्‌की इस मायासे पीछा छुड़ाना देवताओंके लिये भी कठिन है, मनुष्य तो इसे छोड़ ही कैसे सकते हैं। अतः

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