श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइससे छूटनेके लिये भी सप्ताहश्रवणका विधान किया गया है ॥६५॥
सूतजी कहते हैं—शौनकजी! जिस समय सनकादि मुनीश्वर इस प्रकार सप्ताहश्रवणकी महिमाका बखान कर रहे थे, उस सभामें एक बड़ा आश्चर्य हुआ; उसे मैं तुम्हें बतलाता हूँ, सुनो ॥६६॥ वहाँ तरुणावस्थाको प्राप्त हुए अपने दोनों पुत्रोंको साथ लिये विशुद्ध प्रेमरूपा भक्ति बार-बार ‘श्रीकृष्ण! गोविन्द! हरे! मुरारे! हे नाथ! नारायण! वासुदेव!’ आदि भगवन्नामोंका उच्चारण करती हुई अकस्मात् प्रकट हो गयीं ॥६७॥ सभी सदस्योंने देखा कि परम सुन्दरी भक्तिरानी भागवतके अर्थोंका आभूषण पहने वहाँ पधारीं। मुनियोंकी उस सभामें सभी यह तर्क-वितर्क करने लगे कि ये यहाँ कैसे आयीं, कैसे प्रविष्ट हुईं ॥६८॥ तब सनकादिने कहा—‘ये भक्तिदेवी अभी-अभी कथाके अर्थसे निकली हैं।’ उनके ये वचन सुनकर भक्तिने अपने पुत्रोंसमेत अत्यन्त विनम्र होकर सनत्कुमारजीसे कहा ॥६९॥
भक्तिः सुतौ तौ तरुणौ गृहीत्वा प्रेमैकरूपा सहसाऽऽविरासीत् । श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे नाथेति नामानि मुहुर्वदन्ती ॥६७
तां चागतां भागवतार्थभूषां सुचारुवेषां ददृशुः सदस्याः । कथं प्रविष्टा कथमागतेयं मध्ये मुनीनामिति तर्कयन्तः ॥६८
ऊचुः कुमारा वचनं तदानीं कथार्थतो निष्पतिताधुनेयम् । एवं गिरः सा ससुता निशम्य सनत्कुमारं निजगाद नम्रा ॥६९
भक्तिरुवाच
भवद्भिरद्यैव कृतास्मि पुष्टा कलिप्रणष्टापि कथारसेन । क्वाहं तु तिष्ठाम्यधुना ब्रुवन्तु ब्राह्मा इदं तां गिरमूचिरे ते ॥७०
भक्तेषु गोविन्दस्वरूपकर्त्री प्रेमैकधर्त्री भवरोगहन्त्री । सा त्वं च तिष्ठस्व सुधैर्यसंश्रया निरन्तरं वैष्णवमानसानि ॥७१
ततोऽपि दोषाः कलिजा इमे त्वां