श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंधिक्जीवितं प्रजाहीनं धिग्गृहं च प्रजां विना । धिग्धनं चानपत्यस्य धिक्कुलं संततिं विना ।।२९
एक दिन वह ब्राह्मणदेवता बहुत दुःखी होकर घरसे निकलकर वनको चल दिया। दोपहरके समय उसे प्यास लगी, इसलिये वह एक तालाबपर आया ।।२३।। सन्तानके अभावके दुःखने उसके शरीरको बहुत सुखा दिया था, इसलिये थक जानेके कारण जल पीकर वह वहीं बैठ गया। दो घड़ी बीतनेपर वहाँ एक संन्यासी महात्मा आये ।।२४।। जब ब्राह्मणदेवताने देखा कि वे जल पी चुके हैं, तब वह उनके पास गया और चरणोंमें नमस्कार करनेके बाद सामने खड़े होकर लंबी-लंबी साँसें लेने लगा ।।२५।।
संन्यासीने पूछा—कहो, ब्राह्मणदेवता! रोते क्यों हो? ऐसी तुम्हें क्या भारी चिन्ता है? तुम जल्दी ही मुझे अपने दुःखका कारण बताओ ।।२६।।
ब्राह्मणने कहा—महाराज! मैं अपने पूर्वजन्मके पापोंसे संचित दुःखका क्या वर्णन करूँ? अब मेरे पितर मेरे द्वारा दी हुई जलांजलिके जलको अपनी चिन्ताजनित साँससे कुछ गरम करके पीते हैं ।।२७।। देवता और ब्राह्मण मेरा दिया हुआ प्रसन्न मनसे स्वीकार नहीं करते। सन्तानके लिये मैं इतना दुःखी हो गया हूँ कि मुझे सब सूना-ही-सूना दिखायी देता है। मैं प्राण त्यागनेके लिये यहाँ आया हूँ ।।२८।। सन्तानहीन जीवनको धिक्कार है, सन्तानहीन गृहको धिक्कार है! सन्तानहीन धनको धिक्कार है और सन्तानहीन कुलको धिक्कार है!! ।।२९।।
पाल्यते या मया धेनुः सा वन्ध्या सर्वथा भवेत् । यो मया रोपितो वृक्षः सोऽपि वन्ध्यत्वमाश्रयेत् ।।३० यत्फलं मद्गृहायातं तच्च शीघ्रं विनश्यति । निर्भाग्यस्यानपत्यस्य किमतो जीवितेन मे ।।३१ इत्युक्त्वा स रुरोदोच्चैस्तत्पार्श्वे दुःखपीडितः । तदा तस्य यतेश्चित्ते करुणाभूद्गरीयसी ।।३२ तद्भालाक्षरमालां च वाचयामास योगवान् । सर्वं ज्ञात्वा यतिः पश्चाद्विप्रमूचे सविस्तरम् ।।३३
यतिरुवाच
मुञ्चाज्ञानं प्रजारूपं बलिष्ठा कर्मणो गतिः । विवेकं तु समासाद्य त्यज संसारवासनाम् ।।३४ शृणु विप्र मया तेऽद्य प्रारब्धं तु विलोकितम् । सप्तजन्मावधि तव पुत्रो नैव च नैव च ।।३५
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