भारतकोश
श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 119

संततेः सगरो दुःखमवापाङ्गः पुरा तथा । रे मुञ्चाद्य कुटुम्बाशां संन्यासे सर्वथा सुखम् ।।३६

ब्राह्मण उवाच

विवेकेन भवेत्किं मे पुत्रं देहि बलादपि । नो चेत्त्यजाम्यहं प्राणांस्त्वदग्रे शोकमूर्च्छितः ।।३७ पुत्रादिसुखहीनोऽयं संन्यासः शुष्क एव हि । गृहस्थः सरसो लोके पुत्रपौत्रसमन्वितः ।।३८ इति विप्राग्रहं दृष्ट्वा प्राब्रवीत्स तपोधनः । चित्रकेतुर्गतः कष्टं विधिलेखविमार्जनात् ।।३९ न यास्यसि सुखं पुत्रादघा दैवहतोद्यमः । अतो हठेन युक्तोऽसि ह्यर्थिनं किं वदाम्यहम् ।।४०

मैं जिस गायको पालता हूँ, वह भी सर्वथा बाँझ हो जाती है; जो पेड़ लगाता हूँ, उसपर भी फल-फूल नहीं लगते ।।३०।। मेरे घरमें जो फल आता है, वह भी बहुत जल्दी सड़ जाता है। जब मैं ऐसा अभागा और पुत्रहीन हूँ, तब फिर इस जीवनको ही रखकर मुझे क्या करना है ।।३१।। यों कहकर वह ब्राह्मण दुःखसे व्याकुल हो उन संन्यासी महात्माके पास फूट-फूटकर रोने लगा। तब उन यतिवरके हृदयमें बड़ी करुणा उत्पन्न हुई ।।३२।। वे योगनिष्ठ थे; उन्होंने उसके ललाटकी रेखाएँ देखकर सारा वृत्तान्त जान लिया और फिर उसे विस्तारपूर्वक कहने लगे ।।३३।।

संन्यासीने कहा—ब्राह्मणदेवता! इस प्रजाप्राप्तिका मोह त्याग दो। कर्मकी गति प्रबल है, विवेकका आश्रय लेकर संसारकी वासना छोड़ दो ।।३४।। विप्रवर! सुनो; मैंने इस समय तुम्हारा प्रारब्ध देखकर निश्चय किया है कि सात जन्मतक तुम्हारे कोई सन्तान किसी प्रकार नहीं हो सकती ।।३५।। पूर्वकालमें राजा सगर एवं अंगको सन्तानके कारण दुःख भोगना पड़ा था। ब्राह्मण! अब तुम कुटुम्बकी आशा छोड़ दो। संन्यासमें ही सब प्रकारका सुख है ।।३६।।

ब्राह्मणने कहा—महात्माजी! विवेकसे मेरा क्या होगा। मुझे तो बलपूर्वक पुत्र दीजिये; नहीं तो मैं आपके सामने ही शोकमूर्च्छित होकर अपने प्राण त्यागता हूँ ।।३७।। जिसमें पुत्र-स्त्री आदिका सुख नहीं है, ऐसा संन्यास तो सर्वथा नीरस ही है। लोकमें सरस तो पुत्र-पौत्रादिसे भरा-पूरा गृहस्थाश्रम ही है ।।३८।।

ब्राह्मणका ऐसा आग्रह देखकर उन तपोधनने कहा, 'विधाताके लेखको मिटानेका हठ करनेसे राजा चित्रकेतुको बड़ा कष्ट उठाना पड़ा था ।।३९।। इसलिये दैव जिसके उद्योगको कुचल देता है, उस पुरुषके समान तुम्हें भी पुत्रसे सुख नहीं मिल सकेगा। तुमने तो बड़ा हठ

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