श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपकड़ रखा है और अर्थीके रूपमें तुम मेरे सामने उपस्थित हो; ऐसी दशामें मैं तुमसे क्या कहूँ' ।।४०।। तस्याग्रहं समालोक्य फलमेकं स दत्तवान् । इदं भक्षय पत्न्या त्वं ततः पुत्रो भविष्यति ।।४१ सत्यं शौचं दया दानमेकभक्तं तु भोजनम् । वर्षावधि स्त्रिया कार्यं तेन पुत्रोऽतिनिर्मलः ।।४२ एवमुक्त्वा ययौ योगी विप्रस्तु गृहमागतः । पत्न्याः पाणौ फलं दत्त्वा स्वयं यातस्तु कुत्रचित् ।।४३ तरुणी कुटिला तस्य सख्यग्रे च रुरोद ह । अहो चिन्ता ममोत्पन्ना फलं चाहं न भक्षये ।।४४ फलभक्षेण गर्भः स्याद्गर्भेणोदरवृद्धिता । स्वल्पभक्षं ततोऽशक्तिर्गृहकार्यं कथं भवेत् ।।४५ दैवादधाटी व्रजेद्ग्रामे पलायेद्गर्भिणी कथम् । शुकवन्निवसेद्गर्भस्तं कुक्षेः कथमुत्सृजेत् ।।४६ तिर्यक्छेदागतो गर्भस्तदा मे मरणं भवेत् । प्रसूतौ दारुणं दुःखं सुकुमारी कथं सहे ।।४७ मन्दायां मयि सर्वस्वं ननान्दा संहरेत्तदा । सत्यशौचादिनियमो दुराराध्यः स दृश्यते ।।४८ लालने पालने दुःखं प्रसूतायाश्च वर्तते । वन्ध्या वा विधवा नारी सुखिनी चेति मे मतिः ।।४९ एवं कुतर्कयोगेन तत्फलं नैव भक्षितम् । पत्या पृष्टं फलं भुक्तं भुक्तं चेति तयेरितम् ।।५०
जब महात्माजीने देखा कि यह किसी प्रकार अपना आग्रह नहीं छोड़ता, तब उन्होंने उसे एक फल देकर कहा—'इसे तुम अपनी पत्नीको खिला देना, इससे उसके एक पुत्र होगा ।।४१।। तुम्हारी स्त्रीको एक सालतक सत्य, शौच, दया, दान और एक समय एक ही अन्न खानेका नियम रखना चाहिये। यदि वह ऐसा करेगी तो बालक बहुत शुद्ध स्वभाववाला होगा' ।।४२।। यों कहकर वे योगिराज चले गये और ब्राह्मण अपने घर लौट आया। वहाँ आकर उसने वह फल अपनी स्त्रीके हाथमें दे दिया और स्वयं कहीं चला गया ।।४३।। उसकी स्त्री तो कुटिल स्वभावकी थी ही, वह रो-रोकर अपनी एक सखीसे कहने लगी—'सखी! मुझे तो बड़ी चिन्ता हो गयी, मैं तो यह फल नहीं खाऊँगी ।।४४।। फल खानेसे गर्भ रहेगा और गर्भसे
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