श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1204, कुल 1617 में से
संदर्भ में पढ़ेंभूतैः सृजति भूतानि ग्रसते तानि तैः स्वयम् ।।१२
आयुः श्रीः कीर्तिरैश्वर्यमाशिषः पुरुषस्य याः । भवन्त्येव हि तत्काले यथानिच्छोर्विपर्ययाः ।।१३
तस्मादकीर्तियशसोर्जयापजययोरपि । समः स्यात् सुखदुःखाभ्यां मृत्युजीवितयोस्तथा ।।१४
सत्त्वं रजस्तम इति प्रकृतेर्नात्मनो गुणाः । तत्र साक्षिणमात्मानं यो वेद न स बध्यते ।।१५
पश्य मां निर्जितं शक्र वृक्णायुधभुजं मृधे । घटमानं यथाशक्ति तव प्राणजिहीर्षया ।।१६
प्राणगल्होऽयं समर इष्वक्षो वाहनासनः । अत्र न ज्ञायतेऽमुष्य जयोऽमुष्य पराजयः ।।१७
ये सब लोक और लोकपाल जालमें फँसे हुए पक्षियोंकी भाँति जिसकी अधीनतामें विवश होकर चेष्टा करते हैं, वह काल ही सबकी जय-पराजयका कारण है ।।८।। वही काल मनुष्यके मनोबल, इन्द्रियबल, शरीरबल, प्राण, जीवन और मृत्युके रूपमें स्थित है। मनुष्य उसे न जानकर जड़ शरीरको ही जय-पराजय आदिका कारण समझता है ।।९।। इन्द्र! जैसे काठकी पुतली और यन्त्रका हरिण नचानेवालेके हाथमें होते हैं, वैसे ही तुम समस्त प्राणियोंको भगवान्के अधीन समझो ।।१०।।
भगवान्के कृपा-प्रसादके बिना पुरुष, प्रकृति, महत्तत्त्व, अहंकार, पंचभूत, इन्द्रियाँ और अन्तःकरण-चतुष्टय—ये कोई भी इस विश्वकी उत्पत्ति आदि करनेमें समर्थ नहीं हो सकते ।।११।। जिसे इस बातका पता नहीं है कि भगवान् ही सबका नियन्त्रण करते हैं, वही इस परतन्त्र जीवको स्वतन्त्र कर्ता-भोक्ता मान बैठता है। वस्तुतः स्वयं भगवान् ही प्राणियोंके द्वारा प्राणियोंकी रचना और उन्हींके द्वारा उनका संहार करते हैं ।।१२।। जिस प्रकार इच्छा न होनेपर भी समय विपरीत होनेसे मनुष्यको मृत्यु और अपयश आदि प्राप्त होते हैं—वैसे ही समयकी अनुकूलता होनेपर इच्छा न होनेपर भी उसे आयु, लक्ष्मी, यश और ऐश्वर्य आदि भोग भी मिल जाते हैं ।।१३।। इसलिये यश-अपयश, जय-पराजय, सुख-दुःख, जीवन-मरण—इनमेंसे किसी एककी इच्छा-अनिच्छा न रखकर सभी परिस्थितियोंमें समभावसे रहना चाहिये—हर्ष-शोकके वशीभूत नहीं होना चाहिये ।।१४।। सत्त्व, रज और तम—ये तीनों गुण प्रकृतिके हैं, आत्माके नहीं; अतः जो पुरुष आत्माको उनका साक्षीमात्र जानता है, वह उनके गुण-दोषसे लिप्त नहीं होता ।।१५।। देवराज इन्द्र! मुझे भी तो देखो; तुमने मेरा हाथ और
ebook converter DEMO Watermarks*