भारतकोश
श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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शस्त्र काटकर एक प्रकारसे मुझे परास्त कर दिया है, फिर भी मैं तुम्हारे प्राण लेनेके लिये यथाशक्ति प्रयत्न कर ही रहा हूँ ।।१६।। यह युद्ध क्या है, एक जूएका खेल। इसमें प्राणकी बाजी लगती है, बाणोंके पासे डाले जाते हैं और वाहन ही चौसर हैं। इसमें पहलेसे यह बात नहीं मालूम होती कि कौन जीतेगा और कौन हारेगा ।।१७।।

श्रीशुक उवाच

इन्द्रो वृत्रवचः श्रुत्वा गतालीकमपूजयत् । गृहीतवज्रः प्रहसंस्तमाह गतविस्मयः ।।१८

इन्द्र उवाच

अहो दानव सिद्धोऽसि यस्य ते मतिरीदृशी । भक्तः सर्वात्मनाऽऽत्मानं सुहृदं जगदीश्वरम् ।।१९

भवानतार्षीन्मायां वै वैष्णवीं जनमोहिनीम् । यद् विहायासुरं भावं महापुरुषतां गतः ।।२०

खल्विदं महदाश्चर्यं यद् रजःप्रकृतेस्तव । वासुदेवे भगवति सत्त्वात्मनि दृढा मतिः ।।२१

यस्य भक्तिर्भगवति हरौ निःश्रेयसेश्वरे । विक्रीडतोऽमृताम्भोधौ किं क्षुद्रैः खातकोदकैः ।।२२

श्रीशुक उवाच

इति ब्रुवाणावन्योन्यं धर्मजिज्ञासया नृप । युयुधाते महावीर्याविन्द्रवृत्रौ युधाम्पती ।।२३

आविध्य परिघं वृत्रः कार्ष्णायसमरिन्दमः । इन्द्राय प्राहिणोद् घोरं वामहस्तेन मारिष ।।२४

स तु वृत्रस्य परिघं करं च करभोपमम् । चिच्छेद युगपद् देवो वज्रेण शतपर्वणा ।।२५

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