श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतयेन्द्रः समासहत तापं निर्वृतिर्नामुमाविशत् । ह्रीमन्तं वाच्यतां प्राप्तं सुखयन्त्यपि नो गुणाः ।।११
तां ददर्शानुधावन्तीं चाण्डालीमिव रूपिणीम् । जराया वेपमानाङ्गीं यक्ष्मग्रस्तामसृक्पटाम् ।।१२
विकीर्य पलितान् केशांस्तिष्ठ तिष्ठेति भाषिणीम् । मीनगन्ध्यसुगन्धेन कुर्वतीं मार्गदूषणम् ।।१३
नभो गतो दिशः सर्वाः सहस्राक्षो विशाम्पते । प्रागुदीचीं दिशं तूर्णं प्रविष्टो नृप मानसम् ।।१४
स आवसत्पुष्करनालतन्तू- नलब्धभोगो यदिहाग्निदूतः । वर्षाणि साहस्रमलक्षितोऽन्तः स चिन्तयन् ब्रह्मवधाद् विमोक्षम् ।।१५
तावत्त्रिणाकं नहुषः शशास विद्यातपोयोगबलानुभावः ।
हमलोग 'अश्वमेध' नामक महायज्ञका अनुष्ठान करेंगे। उसके द्वारा श्रद्धापूर्वक भगवान्की आराधना करके तुम ब्रह्मापर्यन्त समस्त चराचर जगत्की हत्याके भी पापसे लिप्त नहीं होगे। फिर इस दुष्टको दण्ड देनेके पापसे छूटनेकी तो बात ही क्या है ।।९।।
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! इस प्रकार ब्राह्मणोंसे प्रेरणा प्राप्त करके देवराज इन्द्रने वृत्रासुरका वध किया था। अब उसके मारे जानेपर ब्रह्महत्या इन्द्रके पास आयी ।।१०।। उसके कारण इन्द्रको बड़ा क्लेश, बड़ी जलन सहनी पड़ी। उन्हें एक क्षणके लिये भी चैन नहीं पड़ता था। सच है, जब किसी संकोची सज्जनपर कलंक लग जाता है, तब उसके धैर्य आदि गुण भी उसे सुखी नहीं कर पाते ।।११।। देवराज इन्द्रने देखा कि ब्रह्महत्या साक्षात् चाण्डालीके समान उनके पीछे-पीछे दौड़ी आ रही है। बुढ़ापेके कारण उसके सारे अंग काँप रहे हैं और क्षयरोग उसे सता रहा है। उसके सारे वस्त्र खूनसे लथपथ हो रहे हैं ।।१२।। वह अपने सफेद-सफेद बालोंको बिखेरे 'ठहर जा! ठहर जा!!' इस प्रकार चिल्लाती आ रही है। उसके श्वासके साथ मछलीकी-सी दुर्गन्ध आ रही है, जिसके कारण मार्ग भी दूषित होता जा रहा है ।।१३।। राजन्! देवराज इन्द्र उसके भयसे दिशाओं और आकाशमें भागते फिरे। अन्तमें कहीं भी शरण न मिलनेके कारण उन्होंने पूर्व और उत्तरके कोनेमें स्थित मानसरोवरमें शीघ्रतासे प्रवेश किया ।।१४।। देवराज इन्द्र मानसरोवरके
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