भारतकोश
श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,617 पृष्ठ

पृष्ठ 1212, कुल 1617 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1212

कमलनालके तन्तुओंमें एक हजार वर्षोंतक छिपकर निवास करते रहे और सोचते रहे कि ब्रह्महत्यासे मेरा छुटकारा कैसे होगा। इतने दिनोंतक उन्हें भोजनके लिये किसी प्रकारकी सामग्री न मिल सकी। क्योंकि वे अग्निदेवताके मुखसे भोजन करते हैं और अग्निदेवता जलके भीतर कमलतन्तुओंमें जा नहीं सकते थे ।।१५।।

जबतक देवराज इन्द्र कमलतन्तुओंमें रहे, तबतक अपनी विद्या, तपस्या और योगबलके प्रभावसे राजा नहुष स्वर्गका शासन करते रहे। परन्तु जब उन्होंने सम्पत्ति और ऐश्वर्यके मदसे अंधे होकर इन्द्रपत्नी शचीके साथ अनाचार करना चाहा, तब शचीने उनसे ऋषियोंका अपराध करवाकर उन्हें शाप दिला दिया—जिससे वे साँप हो गये ।।१६।। तदनन्तर जब सत्यके परम पोषक भगवान्‌का ध्यान करनेसे इन्द्रके पाप नष्टप्राय हो गये, तब ब्राह्मणोंके बुलवानेपर वे पुनः स्वर्गलोकमें गये। कमलवनविहारिणी विष्णुपत्नी लक्ष्मीजी इन्द्रकी रक्षा कर रही थीं और पूर्वोत्तर दिशाके अधिपति रुद्रने पापको पहले ही निस्तेज कर दिया था, जिससे वह इन्द्रपर आक्रमण नहीं कर सका ।।१७।।

स सम्पदैश्वर्यमदान्धबुद्धि- र्नीतस्तिरश्चां गतिमिन्द्रपत्नया ।।१६

ततो गतो ब्रह्मगिरोपहूत ऋतम्भरध्याननिवारिताघः । पापस्तु दिग्देवतया हतौजा- स्तं नाभ्यभूदवितं विष्णुपत्न्या ।।१७

तं च ब्रह्मर्षयोऽभ्येत्य हयमेधेन भारत । यथावद्दीक्षयाञ्चक्रुः पुरुषाराधनेन ह।।१८

अथेज्यमाने पुरुषे सर्वदेवमयात्मनि । अश्वमेधे महेन्द्रेण वितते ब्रह्मवादिभिः ।।१९

स वै त्वाष्ट्रवधो भूयानपि पापचयो नृप । नीतस्तेनैव शून्याय नीहार इव भानुना ।।२०

स वाजिमेधेन यथोदितेन वितायमानेन मरीचिमिश्रैः । इष्ट्वाधियज्ञं पुरुषं पुराण- मिन्द्रो महानास विधूतपापः ।।२१

इदं महाख्यानमशेषपाप्मनां प्रक्षालनं तीर्थपदानुकीर्तनम् । भक्त्युच्छ्रयं भक्तजनानुवर्णनं महेन्द्रमोक्षं विजयं मरुत्वतः ।।२२

पठेयुराख्यानमिदं सदा बुधाः

ebook converter DEMO Watermarks*