श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीशुकदेवजीने कहा—परीक्षित्! यह पुंसवनव्रत समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाला है। स्त्रीको चाहिये कि वह अपने पतिदेवकी आज्ञा लेकर मार्गशीर्ष शुक्ल प्रतिपदासे इसका आरम्भ करे ।।२।। पहले मरुद्गणके जन्मकी कथा सुनकर ब्राह्मणोंसे आज्ञा ले। फिर प्रतिदिन सबेरे दाँतुन आदिसे दाँत साफ करके स्नान करे, दो श्वेत वस्त्र धारण करे और आभूषण भी पहन ले। प्रातःकाल कुछ भी खानेसे पहले ही भगवान् लक्ष्मी-नारायणकी पूजा करे ।।३।। (इस प्रकार प्रार्थना करे—) 'प्रभो! आप पूर्णकाम हैं। अतएव आपको किसीसे भी कुछ लेना-देना नहीं है। आप समस्त विभूतियोंके स्वामी और सकल-सिद्धिस্বরূপ हैं। मैं आपको बार-बार नमस्कार करती हूँ ।।४।। मेरे आराध्यदेव! आप कृपा, विभूति, तेज, महिमा और वीर्य आदि समस्त गुणोंसे नित्ययुक्त हैं। इन्हीं भगों—ऐश्वर्योंसे नित्ययुक्त रहनेके कारण आपको भगवान् कहते हैं। आप सर्वशक्तिमान् हैं ।।५।। माता लक्ष्मीजी! आप भगवान्की अर्द्धांगिनी और महामाया-स्वरूपिणी हैं। भगवान्के सारे गुण आपमें निवास करते हैं। महाभाग्यवती जगन्माता! आप मुझपर प्रसन्न हों। मैं आपको नमस्कार करती हूँ' ।।६।। परीक्षित्! इस प्रकार स्तुति करके एकाग्रचित्तसे ‘ॐ नमो भगवते महापुरुषाय महानुभावाय महाविभूतिपतये सह महाविभूतिभिर्बलिमुपहराणि ।’ ‘ओंकारस्वरूप, महानुभाव, समस्त महाविभूतियोंके स्वामी भगवान् पुरुषोत्तमको और उनकी महाविभूतियोंको मैं नमस्कार करती हूँ और उन्हें पूजोपहारकी सामग्री समर्पण करती हूँ’—इस मन्त्रके द्वारा प्रतिदिन स्थिर चित्तसे विष्णुभगवान्का आवाहन, अर्घ्य, पाद्य, आचमन, स्नान, वस्त्र, यज्ञोपवीत, आभूषण, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य आदि निवेदन करके पूजन करे ।।७।।
हविःशेषं तु जुहुयादनले द्वादशाहुतीः । ॐ नमो भगवते महापुरुषाय महाविभूतिपतये स्वाहेति ।।८
श्रियं विष्णुं च वरदावाशिषां प्रभवावुभौ । भक्त्या सम्पूजयेन्नित्यं यदीच्छेत्सर्वसम्पदः ।।९
प्रणमेद्दण्डवद्भूभौ भक्तिप्रह्वेण चेतसा । दशवारं जपेन्मन्त्रं ततः स्तोत्रमुदीरयेत् ।।१०
युवां तु विश्वस्य विभू जगतः कारणं परम् । इयं हि प्रकृतिः सूक्ष्मा मायाशक्तिर्दुरत्यया ।।११
तस्या अधीश्वरः साक्षात्त्वमेव पुरुषः परः । त्वं सर्वयज्ञ इज्येयं क्रियेयं फलभुग्भवान् ।।१२
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