भारतकोश
श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1268

गुणव्यक्तिरियं देवी व्यञ्जको गुणभुग्भवान् । त्वं हि सर्वशरीर्यात्मा श्रीः शरीरेन्द्रियाशया । नामरूपे भगवती प्रत्ययस्त्वमपाश्रयः ॥१३

यथा युवां त्रिलोकस्य वरदौ परमेष्ठिनौ । तथा म उत्तमश्लोक सन्तु सत्या महाशिषः ॥१४

जो नैवेद्य बच रहे, उससे ‘ॐ नमो भगवते महापुरुषाय महाविभूतिपतये स्वाहा ।’ ‘महान् ऐश्वर्योंके अधिपति भगवान् पुरुषोत्तमको नमस्कार है। मैं उन्हींके लिये इस हविष्यका हवन कर रही हूँ।’—यह मन्त्र बोलकर अग्निमें बारह आहुतियाँ दे ॥८॥

परीक्षित्! जो सब प्रकारकी सम्पत्तियोंको प्राप्त करना चाहता हो, उसे चाहिये कि प्रतिदिन भक्तिभावसे भगवान् लक्ष्मीनारायणकी पूजा करे; क्योंकि वे ही दोनों समस्त अभिलाषाओंके पूर्ण करनेवाले एवं श्रेष्ठ वरदानी हैं ॥९॥

इसके बाद भक्तिभावसे भरकर बड़ी नम्रतासे भगवान्को साष्टांग दण्डवत् करे। दस बार पूर्वोक्त मन्त्रका जप करे और फिर इस स्तोत्रका पाठ करे— ॥१०॥

‘हे लक्ष्मीनारायण! आप दोनों सर्वव्यापक और सम्पूर्ण चराचर जगत्के अन्तिम कारण हैं—आपका और कोई कारण नहीं है। भगवन्! माता लक्ष्मीजी आपकी मायाशक्ति हैं। ये ही स्वयं अव्यक्त प्रकृति भी हैं। इनका पार पाना अत्यन्त कठिन है ॥११॥

प्रभो! आप ही इन महामायाके अधीश्वर हैं और आप ही स्वयं परमपुरुष हैं। आप समस्त यज्ञ हैं और ये हैं यज्ञ-क्रिया। आप फलके भोक्ता हैं और ये हैं उसको उत्पन्न करनेवाली क्रिया ॥१२॥

माता लक्ष्मीजी तीनों गुणोंकी अभिव्यक्ति हैं और आप उन्हें व्यक्त करनेवाले और उनके भोक्ता हैं। आप समस्त प्राणियोंके आत्मा हैं और लक्ष्मीजी शरीर, इन्द्रिय और अन्तःकरण हैं। माता लक्ष्मीजी नाम एवं रूप हैं और आप नाम-रूप दोनोंके प्रकाशक तथा आधार हैं ॥१३॥

प्रभो! आपकी कीर्ति पवित्र है। आप दोनों ही त्रिलोकीके वरदानी परमेश्वर हैं। अतः मेरी बड़ी-बड़ी आशा-अभिलाषाएँ आपकी कृपासे पूर्ण हों’ ॥१४॥

इत्यभिष्टूय वरदं श्रीनिवासं श्रिया सह । तन्निःसार्योपहरणं दत्त्वाऽऽचमनमर्चयेत् ॥१५ ततः स्तुवीत स्तोत्रेण भक्तिप्रह्वेण चेतसा । यज्ञोच्छिष्टमवघ्राय पुनरभ्यर्चयेद्धरिम् ॥१६ पतिं च परया भक्त्या महापुरुषचेतसा । प्रियैस्तैस्तैरुपनमेत् प्रेमशीलः स्वयं पतिः । बिभृयात् सर्वकर्माणि पत्न्या उच्चावचानि च ॥१७