भारतकोश
श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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कृतमेकतरेणापि दम्पत्योरुभयोरपि । पत्यां कुर्यादनर्हायां पतिरेतत् समाहितः ॥१८ विष्णोर्व्रतमिदं बिभ्रन्न विहन्यात् कथञ्चन । विप्रान् स्त्रियो वीरवतीः स्रग्गन्धबलिमण्डनैः । अर्चेदहरहर्भक्त्या देवं नियममास्थितः ॥१९ उद्वास्य देवं स्वे धाम्नि तन्निवेदितमग्रतः । अद्यादात्मविशुद्ध्यर्थं सर्वकामर्द्धये तथा ॥२० एतेन पूजाविधिना मासान् द्वादश हायनम् । नीत्वाथोपचरेत्साध्वी कार्तिके चरमेऽहनि ॥२१ श्वोभूतेऽप उपस्पृश्य कृष्णमभ्यर्च्य पूर्ववत् । पयःशृतेन जुहुयाच्चरुणा सह सर्पिषा । पाकयज्ञविधानेन द्वादशैवाहुतीः पतिः ॥२२ आशिषः शिरसाऽऽदाय द्विजैः प्रीतैः समीरिताः । प्रणम्य शिरसा भक्त्या भुञ्जीत तदनुज्ञया ॥२३

परीक्षित्! इस प्रकार परम वरदानी भगवान् लक्ष्मी-नारायणकी स्तुति करके वहाँसे नैवेद्य हटा दे और आचमन कराके पूजा करे ॥१५॥ तदनन्तर भक्तिभावभरित हृदयसे भगवान्‌की स्तुति करे और यज्ञावशेषको सूँघकर फिर भगवान्‌की पूजा करे ॥१६॥ भगवान्‌की पूजाके बाद अपने पतिको साक्षात् भगवान् समझकर परम प्रेमसे उनकी प्रिय वस्तुएँ सेवामें उपस्थित करे। पतिका भी यह कर्तव्य है कि वह आन्तरिक प्रेमसे अपनी पत्नीके प्रिय पदार्थ ला-लाकर उसे दे और उसके छोटे-बड़े सब प्रकारके काम करता रहे ॥१७॥ परीक्षित्! पति-पत्नीमेंसे एक भी कोई काम करता है, तो उसका फल दोनोंको होता है। इसलिये यदि पत्नी (रजोधर्म आदिके समय) यह व्रत करनेके अयोग्य हो जाय तो बड़ी एकाग्रता और सावधानीसे पतिको ही इसका अनुष्ठान करना चाहिये ॥१८॥ यह भगवान् विष्णुका व्रत है। इसका नियम लेकर बीचमें कभी नहीं छोड़ना चाहिये। जो भी यह नियम ग्रहण करे, वह प्रतिदिन माला, चन्दन, नैवेद्य और आभूषण आदिसे भक्तिपूर्वक ब्राह्मण और सुहागिनी स्त्रियोंका पूजन करे तथा भगवान् विष्णुकी भी पूजा करे ॥१९॥ इसके बाद भगवान्‌को उनके धाममें पधरा दे, विसर्जन कर दे। तदनन्तर आत्म-शुद्धि और समस्त अभिलाषाओंकी पूर्तिके लिये पहलेसे ही उन्हें निवेदित किया हुआ प्रसाद ग्रहण करे ॥२०॥

साध्वी स्त्री इस विधिसे बारह महीनोंतक—पूरे सालभर इस व्रतका आचरण करके मार्गशीर्षकी अमावास्याको उद्यापनसम्बन्धी उपवास और पूजन आदि करे ॥२१॥ उस दिन प्रातःकाल ही स्नान करके पूर्ववत् विष्णुभगवान्‌का पूजन करे और उसका पति पाकयज्ञकी

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