श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसम्बन्धाद् वृष्णयः स्नेहाद् यूयं भक्त्या वयं विभो ॥३०
कतमोऽपि न वेनः स्यात्पञ्चानां पुरुषं प्रति । तस्मात् केनाप्युपायेन मनः कृष्णे निवेशयेत् ॥३१
जिस शरीरमें अभिमान हो जाता है कि 'यह मैं हूँ', उस शरीरके वधसे प्राणियोंको अपना वध जान पड़ता है। किन्तु भगवान्में तो जीवोंके समान ऐसा अभिमान है नहीं; क्योंकि वे सर्वात्मा हैं, अद्वितीय हैं। वे जो दूसरोंको दण्ड देते हैं—वह भी उनके कल्याणके लिये ही, क्रोधवश अथवा द्वेषवश नहीं। तब भगवान्के सम्बन्धमें हिंसाकी कल्पना तो की ही कैसे जा सकती है ॥२४॥ इसलिये चाहे सुदृढ़ वैरभावसे या वैरहीन भक्तिभावसे, भयसे, स्नेहसे अथवा कामनासे—कैसे भी हो, भगवान्में अपना मन पूर्णरूपसे लगा देना चाहिये। भगवान्की दृष्टिसे इन भावोंमें कोई भेद नहीं है ॥२५॥
युधिष्ठिर! मेरा तो ऐसा दृढ़ निश्चय है कि मनुष्य वैरभावसे भगवान्में जितना तन्मय हो जाता है, उतना भक्तियोगसे नहीं होता ॥२६॥ भृंगी कीड़ेको लाकर भीतपर अपने छिद्रमें बंद कर देता है और वह भय तथा उद्वेगसे भृंगीका चिन्तन करते-करते उसके-जैसा ही हो जाता है ॥२७॥ यही बात भगवान् श्रीकृष्णके सम्बन्धमें भी है। लीलाके द्वारा मनुष्य मालूम पड़ते हुए ये सर्वशक्तिमान् भगवान् ही तो हैं। इनसे वैर करनेवाले भी इनका चिन्तन करते-करते पापरहित होकर इन्हींको प्राप्त हो गये ॥२८॥ एक नहीं, अनेकों मनुष्य कामसे, द्वेषसे, भयसे और स्नेहसे अपने मनको भगवान्में लगाकर एवं अपने सारे पाप धोकर उसी प्रकार भगवान्को प्राप्त हुए हैं, जैसे भक्त भक्तिसे ॥२९॥ महाराज! गोपियोंने भगवान्से मिलनके तीव्र काम अर्थात् प्रेमसे, कंसने भयसे, शिशुपाल-दन्तवक्त्र आदि राजाओंने द्वेषसे, यदुवंशियोंने परिवारके सम्बन्धसे, तुमलोगोंने स्नेहसे और हमलोगोंने भक्तिसे अपने मनको भगवान्में लगाया है ॥३०॥ भक्तोंके अतिरिक्त जो पाँच प्रकारके भगवान्का चिन्तन करनेवाले हैं, उनमेंसे राजा वेनकी तो किसीमें भी गणना नहीं होती (क्योंकि उसने किसी भी प्रकारसे भगवान्में मन नहीं लगाया था)। सारांश यह कि चाहे जैसे हो, अपना मन भगवान् श्रीकृष्णमें तन्मय कर देना चाहिये ॥३१॥
मातृष्वसेयो वैश्वैद्यो दन्तवक्त्रश्च पाण्डव । पार्षदप्रवरौ विष्णोर्विप्रशापात्पदाच्च्युतौ ॥३२
युधिष्ठिर उवाच
कीदृशः कस्य वा शापो हरिदासाभिमर्शनः । अश्रद्धेय इवाभाति हरेरेकान्तिनां भवः ॥३३
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